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ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है - यह कथन बिल्कुल सत्य है। हम अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हैं तभी ताली बजा सकते हैं। हाँ, एक हाथ से मेज थपथपाकर अपनी सहमति अथवा प्रसन्नता अवश्य ही प्रदर्शित कर सकते हैं। घर, परिवार अथवा समाज में लोगों के व्यवहार को देखते-परखते हुए ही हम इसका अनुभव कर सकते हैं।भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों अथवा संबंधियों आदि में यदि मनमुटाव या झगड़ा होता है तब हम एक-दूसरे को दोष देकर अपना-अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। यदि दोनों पक्षों की बात निष्पक्ष होकर सुन ली जाए तो पता चलता है कि गलती दोनों की होती है। यह तो हो ही नहीं सकता कि किसी एक की गलती के कारण झगड़ा हो जाए या वैमन्स्य हो। जब तक दोनों पक्ष आपस में न टकराएँ तब तक दुश्मनी की नौबत नहीं आ सकती। इसलिए सावधानी रखनी आवश्यक है। यदि एक व्यक्ति चुप लगा जाए तो दूसरा कब तक बकझक करेगा। आखिर वह भी यह कहकर चुप हो जाएगा कि यह तो कुछ बोलता नहीं, कौन दीवारों से सिर फोड़े? समस्या तभी बढ़ती है जब दोनों ही बराबर की टक्कर दें। कोई भी व्यक्ति अपने आपको छोटा कहलाना पसंद नहीं करता। इसलिए कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं होता। सब एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देते हैं। तभी ऐसी कटु स्थिति बनती है। इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में भी आपसी कटुता के कारण ही बास व कर्मचारियों के बीच मनमुटाव बढ़ता रहता है। इस कारण वहाँ कामबंदी, तालाबंदी अथवा धरने-प्रदर्शनों आदि की नौबत आती है। रिश्तों में भी अलगाव की स्थिति के लिए भी दोनों ही व्यक्ति जिम्मेदार होते हैं। एक का पक्ष लेकर दूसरे पर दोषारोपण करना अनुचित होता है। सभी समझदार लोगों को जागरूक रहना चाहिए और दूसरों को भी सचेत करना चाहिए। रिश्तों में यदि झूठे अहं को छोड़कर दोनों थोड़ा-सा गम खा लें तो बिखराव के कारण होने वाली बिनबुलाई समस्याओं से बचा जा सकता है। यह तो हो सकता है कि किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड़ जाती है। पर कमोबेश स्थिति यही होती है कि दोष दोनों का ही होता है। यह चर्चा हमारे भौतिक संबंधों की है। प्रकृति को हम दोष देते नहीं थकते कि वह हम पर अत्याचार करती है। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी भूकम्प आ जाते हैं, कभी अतिवृष्टि होती है, कभी अनावृष्टि होती है, बीमारियाँ फैल रही हैं, हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है आदि। परन्तु क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखा है कि इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने स्वयं ही इन सब मुसीबतों को न्यौता दिया है। प्रकृति से हम स्वयं छेड़छाड़ करते हैं। हम खुद को बहुत विद्वान मानते हैं। तभी प्राकृतिक संसाधनों का हम आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं। जब हम अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएँगे तो उसका दण्ड किसी दूसरा को नहीं हमें स्वयं को ही तो भोगना पड़ेगा। आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि फिर हम इतनी हाय तौबा क्योंकर करते हैं। प्रयास यही करना चाहिए कि जीवन में छोटी-मोटी कटुताओं को अनदेखा कर दिया जाए। उन्हें अनावश्यक तूल देकर आपसी संबंधों की बलि न चढ़ाई जाए। संबंधों को तोड़ने के लिए ताली को दोनों हाथों से न बजाएँ बल्कि उनमें मधुरता लाने का यथासंभव यत्न करें। चन्द्र प्रभा सूद Email : cprabas59@gmail.com Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html Twitter : http//tco/86whejp

मरो या मारो का अब यही एक नारा होगा लहोर कारांची छोड़ो पूरा पाक हमारा होगा तुम तो मारोगे अट्ठारह को हम तो अडतीस ले जाएंगे लहोर, कारांची, रावलपिंडी में तिरंगा फहराएंगे जो हमको रोकने आएगा बर्बाद उसे हम कर देंगे पल भर में तेरी हस्ती को हम आज मिटा कर रख देंगे अपनी गौरी गज़नी से तू हमें डरा नहीं पाएगा कश्मीर के चक्कर में अपना लहोर गवां कर जाएगा तेरी गौरी गज़नी को ब्रह्मोस से मिटा कर रख देंगे अबकी बार के युद्ध में तुझे नक्शे से हटा कर रख देंगे ये कुत्तों की आदत छोड़ो और खुली जंग में आ जाओ कितनी है दम तुममे आकर ये हमको रण में दिखलाओ हो जाने दो एक और युद्ध रण में कटार खिंच जाने दो वीरों को वीरों से और आयुधों से टकराने दो होने के बाद एक और युद्ध अंतिम फैसला हो जाएगा दिल्ली पर पाकिस्तान नहीं, कारांची पर भारत छा जाएगा (Dharm)

गाँव के मिट्टी की खुशबू अब पुरानी हो गयी नीम के वो पेड़ पीपल पगडण्डी कहानी हो गयी सर्द मौसम में भुने आलू और रस गन्ने का जो था आज बर्गर और पिज्जा की रवानी हो गयी, लोरिया माँ की और दादा की कहानी अब नही घर में लोगो का वो मिलना अब जुबानी हो गयी! कुमार शिवम् "शिवानंद"(१६/९/२०१७) 9794936021

इस शीर्षक पर लेख मिल सकता है मुझे इस विषय पर कुछ जानकारी चाहिए

जो नहीं है हमारे पास वो “ख्वाब” हैं . पर जो है हमारे पास वो “लाजवाब” हैं..

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वर्तमान में शोर भारत मे बहुत भयंकर स्तर तक पहुंच चुका है कैसे इसको नियंत्रित करें?