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हे हंस वाहिनी बुद्धि दायिनी स्वर अमृत भरदे मईया स्वर अमृत भरदे। ज्ञान हीन अज्ञानी माता आये शरण तिहारे कर कृपा मुझ दास पर जीवन धन्य हो जाये स्वर कोकील सा करदे मईया राग रंग भरदे मईया स्वर अमृत कर दे। त्याग तपस्या का वर दो बढे पुण्य प्रताप हमारा तुझ बीन कौन सहारा मईया बालक हूँ मै तिहारा राग द्वेश का नाश करो अनुराग दया भरदे मईया स्वर अमृत करदे। ®©पं.सचिन शुक्ल

आतंकी को ठौर नहीं ********************* घाटी जलती है जलने दो तुम आतंकी को मरने दो मौतों की गणना करो नहीं सेना को अविचल लड़ने दो। सेना का तुम गुणगान करो सहिद का मान- सम्मान करो ये रक्षक हैं कुछ औऱ नहीं अब आतंकी को ठौर नहीं। यें आतंकी एक तक्षक हैं यें मानवता के भक्षक हैं इनको क्यों आश्रय देते हो तुम भी तो हिन्द के बेटे हो। क्या तेरा कोई फर्ज नहीं इस राष्ट्र का तुझपे कर्ज नहीं? है कायरता कुछ औऱ नहीं अब आत्मसमर्पण और नहीं। ऐ आतंकी तड़पायेंगे तुझे वंश सहित खाजायेंगे इनपे ना अश्रू बहाओ तुम नहीं इनका मान बढ़ाओ तुम। जो मानवता के भक्षक हैं वो तेरे कैसे रक्षक हैं इनका यूं ना गुणगान करो नहीं राष्ट्र द्रोह का कार्य करो। कब तक यूँ हीं शरमाओगे आतंक से तुम घबराओगे आओ आतंक का नाश करे। अब राष्ट्र धर्म का ध्यान करें। ©®पं.सचिन शुक्ल "संजीव"

मेरा गाँव गाँव शब्द सुनते ही हम अपने अन्त:करण मेँ एक छवी बना लेते हैँ कमर पे मटका लिए हुए पानी भर कर आती महिलाएँ, कांधे पे हल लिए बैले के साथ खेतोँ की जूताई क]रने जाता किसान, बाहर मैदान या खाली पड़े खेत खलिहानोँ मेँ गिल्ली डंडा खेलते बच्चे, घर के आँगन से चूल्हे के धूँऐ की आती सोँधी खुशबू, किसी बच्चे को गरीब राजा की या अमीर चरवाहे की कहानियाँ सुनाती दादी माँ (ईया) या फिर दूर किसी खेत से आती ट्यूबवेल की चलने की आवाज! हम भी अगर किसी महानगर मेँ पैदा हुए होते तो सायद हमारे मन मेँ भी गाँव की यहीँ छवी होती, और ये अच्छा भी होता आखिर कभी हमारा गाँव भी तो ऐसा ही रहा होगा । मेरे गाँव का नाम मुसहरवा है, यह बिहार राज्य के पश्चिम चम्पारण जिले मेँ स्थीत. एक छोटा मगर संपन्न गाँव है, यहाँ की आबादी तकरीबन तीन से चार हजार के बीच है इस मेँ बच्चो की संख्या भी लगभग एक सवा हजार है यह गाँव आधुनिकी करण की ओर अपना कदम बढा चूका है, शहर या कस्बा तो नहीँ कह सकते परन्तु उपर की तस्वीर के अनुसार अब इसे गाँव भी नहीँ कह सकते । गाँव से बाहर जाने के लिए पक्की सड़क टेलीफोन एवं बिजली के खम्भे, हैन्डपम्प, क्रिकेट फुटबाँल बालीबाँल खेलते बच्चे और गाँव मेँ स्थीत शिव मंदीर के प्राङ्गण मेँ राजनितीक विषयोँ पर बहस करते किसान। बीच बीच मेँ किसी न किसी घर से मोबाईल की रिंग भी सुनाई दे जाती है। हमारे गाँव मेँ एक भब्य शिव मंदीर, एक माँ काली का मंदीर, एक माँ दुर्गा का लुअठहा माई स्थान, एक रेलवे हाल्ट मुसहरवा हाल्ट, एक ब्ययाम शाला दो तालाब , गाँव के भीतर एवं बाहर से गुजरती नहरेँ , बच्चो के शिक्षार्थ दो बिद्यालय इसके सम्पन्ता की कहानी खुद ब खुद बया करते है। अब ना ओ परमेश्वर सरीखे पंच रहे और ना हीँ उन्हे परमेश्वर मानने वाले लोग फिर भी गाँव का कोई भी झगड़ा आज भी सिधा थाने या न्यायालय नहीँ जाता, पहले गाँव के ही कुछ माने हुए सम्मानित लोग फैसला देते है अगर मामला सुलझा नहीँ तभी थाना - पुलिस या कोर्ट - कचहरी होता है अब इक्का - दुक्का जिन्स टी सर्ट पहने लड़कीयाँ भी दिख जायेँगी परन्तु हाव भाव वही सलवार समीज वाला। हल बैल की जगह ट्रेक्टर ने ले ली है कभी कभी ऐस प्रतीत होता है कि विकास की किम्मत हमने ज्यादा ही चुकाया है या चूका रहे है जो मिठास पुराने कुयेँ की पानी मेँ था वो आज के हैँडपंप मेँ कहाँ है जो मजा एक घंटे के तांगे की सवारी मेँ थी वो मजा अब के जीप बस या मोटर कार मेँ कहाँ। साईकिल से किये गये सफर का मजा मोटरसाईकिल मेँ कहाँ परिधानो मेँ भी अब बहुत बदलाव आया है धोती की जगह पैँट ने ले ली और कुर्ते की जगह सर्ट ने आज ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम अपनी पहचान अपनी महक अपना अस्तित्व खोते जा रहे है इस बदलाओन्मुख समय मेँ भी कुछ जीझेँ आज भी नहीँ बदली है ग्रामीणोँ का आपसी प्रेम, भाईचारा, बच्चोँ का अपने बड़े बुजुरगोँ के प्रति आदर सम्मान, अपने खेतोँ की ताजी सब्जीयोँ का स्वाद, सर्दियोँ मे पुआल या गोइठा (उपला) जलाकर तापने की प्रथा, छत के उपर या द्वार पे गरमीयोँ मे टिमटीमाते तारे को देख कर सोने का मजा जो मन को शान्ति प्रदान करता है कभी कभी गाँव मेँ तेजी से होते बदलाओँ से मन क्षुब्ध हो उठता है पर पता नहीँ क्योँ गाँव के प्रति लगाव दिनो दिन बढता ही जाता है। शायद गुजरते फिसलते पलोँ को समेट लेने, जी लेने की ख्वाहिश और आने वाले वक्त के प्रति मन मेँ छुपे भय के कारण ऐसा है संजीव शुक्ल "सचिन" मुसहरवा प. चम्पारण -


जाली गोदनामा और वसीयतनामा सामान्य पेपर पर लिख जो की कही रजिस्टर्ड नहीं है और विपक्ष का दूर दूर तक हमारे वंशावली से उस गोदनामा और वसीयतनामा में मृतक व्यक्ति का जाली हस्त्ताक्षर किया गया है |इन सभी जानकारी के बाद नायब तहसीलदार चुनार के द्वारा प्रार्थी के नामांतरण हुए पैतृक सम्पति को गोपनीय तरीके से दकतक पुत्री के पर विपक्ष के नाम पर कर दिया गया है | जाली गोदनामा और वसीयतनामा को चैलेंज की कोर्ट में करे और क्या प्रक्रिया होगी कृपया पूरी जानकारी देने की कोशिश करे प्रार्थी मिर्ज़ापुर उत्तरप्रदेश का रहने वाला है चुनार तहसील है।

वेद प्रकाश का अर्थ 

आकाश गिल
आकाश  
संतोष वर्मा
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क्या कश्मीर भारत में नही है ? वहां पर GST क्यों नही ? फिर पूरा भारत एक कर कैसे ?