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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

मंज़िल

मंज़िल पर पहुँच कर, देखा जो मुड़करसाथी कोई दिखा नहीं किस मोड़ पर छूटा साथ इल्म इस बात का था नहीं खड़ा हूँ अकेला शिखर परआसमान छूने की तमन्ना हो गयी पूरीज़मीन से नाता, मगर टूट गया है इस जीत का जश्न मनाऊँ या शोक पता नहीं २७ मई २०१७जिनेवा


बुजदिल – शिशिर मधुकर

तेरी सांसो की महक सांसो में मेरी शामिल हैतेरे बिना सफ़र जिन्दगी का बहुत मुश्किल हैतेरे हर अंग में मेरी मुहब्बत का पाक मंदिर हैये दिल यादों में सदा जिसकी हुआ गाफिल हैचाहत इंसानों की जहाँ हद से गुजर जाती हैऐसे रिश्तों को यहाँ मिलती ना कोई मंजिल हैतन्हा रहता है दर्द सहता है और मुस्कुराता हैहर इंसान अब


रिश्तों की पौध – शिशिर मधुकर

साफ दिल के साथी से जब नज़रें मिलाओगेवो हँसती हुई खुद की छवि तुम देख पाओगेप्रेम और विश्वास संग जो तुम घर बनाओगेसुख दुःख के हर मौसम में बस मुस्कुराओगेतुम और मैं हम ना हुए तो


मेरी मनमानियाँ

करूँ मैं बात अब किससे ना मेरा कोई साथी हैजले अब लौं भी ये कैसे सूखे दीपक में बाती है यहाँ मौसम बदलने से हवा का रुख बदलता हैकभी देती थी जो ठंडक वही अब घर जलाती है जिसे अपना समझ मैंने हर इक राज बांटा थामुझे गैरों के जैसा मान वो सब कुछ छुपाती हैजमाने ने कहा मुझसे मैं उसकी बात भी सुन लूँमेरी मनमानियाँ ल


बस एक दाल रोटी का सवाल है – शिशिर मधुकर

बच्चे से मैं प्रौढ़ हो गया जाना जीवन जंजाल हैइंसानी फितरत में देखा बस एक दाल रोटी का सवाल है कोई भी चैनल खोलो तो बेमतलब के सुर ताल हैंपत्रकारों की भीड़ का भी बस एक दाल रोटी का सवाल है नेता नित देश की सेवा करते देश मगर बदहाल हैइसमें में भी तो आखिर उनकी बस एक दाल रोटी का सवाल है अरबों के इस देश में केवल


अच्छा लगता है

अच्छा लगता हैकवि: शिवदत्त श्रोत्रियकभी-कभी खुद से बातें करना अच्छा लगता हैचलते चलते फिर योहीं ठहरना अच्छा लगता है ||जानता हूँ अब खिड़की पर तुम दिखोगी नहींफिर भी तेरी गली से गुजरना अच्छा लगता है ||शाख पर रहेगा तो कुछ दिन खिलेगा तू गुलतेरा टूटकर खुशबू में बिखरना अच्छा लगता है ||आईने तेरी जद से गुजरे हु


पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं

काम और उम्र के बोझ से झुकने लगा हूँ मैंअनायास ही चलते-चलते अब रुकने लगा हूँ मैंकितनी भी करू कोशिश खुद को छिपाने कीसच ही तो है, पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं ||


होंठ मुस्कुरा रहे हैं

होंठ मुस्कुरा रहे हैं आँखें मगर रिस रही हैं तुझे भूल गया हूँ फिर भी तू याद हैपरछाईं में अपनी तेरा अक़्स ढूँढता हूँ किया बहुत कुछ हासिल मुफ़लिसी फिर भी छाई है पूरे किए सपने सभी ज़िंदगी मगर अधूरी है होंठ हँस रहे हैं मगर २६ मई २०१७जिनेवा


दर्पण

बोले टूटकर बिखरा दर्पण , कितना किया कितनों को अर्पण,बेरंगों में रंग बिखेरा, गुनहगारों को किया समर्पण।देखा जैसा, उसको वैसा, उसका रूप दिखाया,रूप-कुरूप बने छैल-छवीले, सबको मैंने सिखाया,घर आया, दीवार सजाया, पर विधना की माया,पड़ूँ फर्श पर टुकड़े होकर, किस्मत में ये लिखाया।च


हस्ती ....जिसके कदम पर ज़माना पड़ा

कुर्सियां,मेज और मोटर साइकिल नजर आती हैं हर तरफ और चलती फिरती जिंदगी मात्र भागती हुई जमानत के लिए निषेधाज्ञा के लिए तारीख के लिए मतलब हक के लिए! ये आता यहां जिंदगी का सफर, है मंदिर ये कहता न्याय का हर कोई, मगर नारी कदमों को देख यहां लगाता है लांछन बढ हर कोई. है व


प्यारी माँ

काश तुम थोड़ा और ठहर जातीकाश मैं कुछ पहले समझ पातीकाश न निभाई होती फ़िज़ूल की सामाजिक रस्में मैंने और काश तुमने भी हर बार न समझ करमेरी परिस्तिथी को, थोड़ा ज़िद करमुझें बुलाया होता,तुम तो बड़ी थी पता तो होगा तुमकोकी तुम्हारे बाद तुम्हारा ख्याल जब जबआएगा न जाने कितनें खोएं लम


तेरी ख़ुशी से ही नहीं ...!


कम्बख्त,इश्क़ में लग गए

"मोहल्ले के लौंडों का प्यार अक्सर इंजीनियर डॉक्टर उठा कर ले जाते हैं।"रांझना फिल्म का ये डॉयलोग तो आपके जेहन में होगा ही।practical life में यानी की असल जिन्दगी में प्यार काफी हद तक ऐसा ही होता है।अब हर लव स्टोरी तो srk की फिल्मों की तरह होती नहीं कि पलट बोला और लड़की पलट ग


वक़्त

हर चीज़ की कीमत तय कर दी, उन लम्हों की कीमत क्या होगी !जो साथ हँसे, जो साथ जिए, उन रिश्तों की कीमत क्या होगी !!क्यूँ भूल गये उस बचपन को, उन नन्ही आँखो के सपनो को !वो कैसे तुम अब पाओगे, जिसकी कोई कीमत ही नहीं !क्यूँ भूल गये उन कसमो को, उन छोटी छोटी सी रस्मो को !वो कैसे तु


वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के

वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के, वो पल कहाँ राहत के !अब इंतेज़ार है और ख़्वाहिश है, वो निशान कहाँ हसरत के !!कभी सबको साथ लेकर चलने की आदत थी दोस्तो !अब ख़बर नहीं कहाँ है, वो फसाने लड़कपन के !!कभी चाहत पे दुनिया का हर जर्रा जर्रा कायम था !मुद्दत हुई


तेरा रंग अभी तक बाकी है

अश्क तो हैं तेरी यादों के, मेरे लिए काफ़ी हैं !कुछ गुज़रे दिन इनके सहारे, गुजर जाएँगे जो बाकी हैं !!तेरी तस्वीर थी जो आँखों में, इसमे अब पानी का रंग शामिल है !ये धुंधली सी हो गयी है, बस अब थोडा सा रंग बाकी है !!म


क़लम

वो क़लम नहीं हो सकती है जो बिकती हो बाज़ारों में ! क़लम वही है जिसकी स्याही, ना फीकी पड़े नादिया की धारों में !! क़लम वो है जो बनती है, संघर्ष के तूफान से ! लिखती है तो बस सिर्फ़ मानवता क़ी ज़ुबान से !! क़लम चाकू नहीं खंज़र नहीं, क़लम तलवार है ! सत्यमेव ज्यते ही इस


1. मेरी एक कविता : फागुन में आया चुनाव

1. फागुन में आया चुनावफागुन में आया चुनावभजो रे मन हरे हरेकौए करें काँव काँवभजो रे मन हरे हरे.पाँच साल पर साजन आयेगेंद फूल गले लटकायेइनके गजब हावभावभजो रे मन हरे हरे.मुंह उठाये भटक रहे हैंहर दर माथा पटक रहे हैंसूज गए मुंह पाँवभजो रे मन हरे हरे.बालम वादे बाँट रहे हैं


भारतीय

मिट गयीं वो हस्तियाँ,और उनकी बस्तियाजो मिटाने के लिए, हमे आई हैंथम गयीं वो आँधियाँ,बुझ गयीं वो बातियाजो जलाने के लिए, हमे आई हैंकट गये वो कर,झुक गये वो सरजो झुकने के लिए, हमे आए हैं– कुँवर दीपक रावत


बदनाम

कुछ खत मेरे नाम, बेनाम चले आएहम आज तेरी महफ़िल से, गुमनाम चले आएकुछ वक़्त तेरे साथ, कुछ लम्हे तेरे नामतेरी दोस्ती की गफलत में, हर शाम चले आएनाचीज़ समझते हो, बड़े शौक से समझोफिर भी मेरे नाम, कुछ इल्ज़ाम चले आए


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