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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

कैसी दीपावली

अब कहाँ रौशनी कैसी परछाईंयाँबस अंधेरों के मेले हैं तनहाइयाँ ...!खोए नग़मे सा अब ढूँढता हूँ तुम्हेंछोड़कर यूँ मुझे गुम हुए तुम कहाँ ...!तुम बिना है अधूरा सा संसार सबख़ाली ख़ाली सा है ज़िन्दगी का मकाँ ...!है तुम्हारे बिना हर तरफ़ तीरगी कैसी दीपावली कैसा रौशन जहाँ ...!सोचता हूँ फ़क़त देखकर ये चमकजल उठे काश फ़ि



इस शतक को शून्य कर दो...!

शून्य से सौ बनानासफलता पर इतरानाकाबिलियत का अपनेबेसाख्ता जश्न मनाना...जो कोई पूछ दे अगरसूरमां हो बहुत तुम गरबस ये करके दिखा दोचक्रव्यूह में घुसे शान सेजरा निकल कर दिखा दोये जो शतक लगाया हैउसे फिर से शून्य बना दो...इतना चले हैं हम सबकि रास्ते चिढ़ गयें हैंइतने हासिल किये मुकम्मलमंजिलें बेनूर हो चली है



क्या है अस्तित्व मेरा



वंदना

हे जग जननी आस तुम्हाराशब्दों को देती तुम धारावाणी को स्वर मिलता तुमसेकण-कण में है वास तुम्हारा |दिनकर का है ओज तुम्ही सेशशि की शीतलता है तुमसेनभ गंगा की रजत धार मेंझिलमिल करता सार तुम्हारा |सिर पर रख दो वरद हस्त माँलिखती रहूँ अनवरत मैं माँहर पन्ने पर अंतर्मन केलिखती हूँ उपकार तुम्हारा || मीना धर



मगर, फिर भी...

बहुत बोलती थी वो...बोलती भी क्या थीमुट्ठी में सच तौलती थीतसव्वुर में अफसानों पर हकीकत के रंग उडेलती थीअल्हड़ थी वो नामुरादअरमानों से लुकाछिपी खेलती थीछू के मुझको सांसों सेअहसासों के मायने पूछती थीगुम हो कर यूं ही अक्सरअपनी आमद बुलंद करती



शख्सियत पर शख्सियत को , लुटा कर देख ले?

शख्सियत पर शख्सियत को , क्यों न लुटा कर देख ले?फ़िर बने रौनक- ए- ज़िंदगी, तेरे लिए मेरे लिए।सोचता क्या फिर रहा तू ?, व्यर्थ कर यहाँ से वहाँ ।मरना है एक दिन सभी को, और फ़िर जाना कहाँ?कुछ साथ है,-कुछ छूट जाते, डगर पर डगर चलते हुए।पर न कर गुरूर खुद पर, साथ चल और हौसला देते हुए।इंसानियत ही इंसानियत हो, और



कोई मजहब नहीं होता

कवि: शिवदत्त श्रोत्रियतुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिरजो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते हैबेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ थाहम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसमउनका चर्चा भी अब ह



अहम् ब्रह्मास्मि...

मेरा ईश्वर, मेरे सामने खड़ा,मेरा ही विराट रूप तो है,मेरी अपनी ही क्षमताओं के,क्षितिज के उस पार खड़ा, खुद मैं ही ‘परमात्मा’ तो हूं,... अहम् ब्रह्मास्मि, इति सत्यम,मैं अपनी ही राह का मंजिल,अपनी संभावनाओं का भक्त,पूर्णता की ईश्वरता का आध्य,मैं ही साधन, मैं ही साध्य,मैं ही पूजा, मैं आराधन,मैं स्वयं अपना



क्या तुमको तकलीफ़ नहीं होती होगी

सच सच बतलाओ...क्या तुमको तकलीफ़ नहीं होती होगी ...है याद तुम्हें या भूल गयी हो बीती उन स्मृतियों कोया भूल गयी हो मेरी उन आश्वस्ति भरी उम्मीदों कोतुम कहती थीं ना क्या हम जग के तूफ़ाँ में बह जायेंगेया मर्यादा के सागर में बहते बहते खो जायेंगेफ़िर वो बातें जो चुप तुमको मुझको घायल कर जाती थींऔर हर मंज़िल माँ



दिल की बात दिल में ही रह गयी

हाले दिल पूँछा,ना तुमने, ना हमनेऔर, दिल की बातें दिल में ही रह गयींनज़रें, ना तुमने पढ़ीं, ना हमनेऔर, दिल की बातें दिल में ही रह गयींइशारे, ना तुमने समझे, ना हमनेऔर, दिल की बातें दिल में ही रह गयींज़स्बातों का इज़हार,ना तुमने किया, ना हमनेऔर, दिल की बातें दिल में ही रह गयींप्यार करते हैं बेइंतहा तुम



देश की राजनीति

गुजरात में विकास पागल अमेठीमें विकास गायब राहुल का ढफली संग डांस योगी शाह ईरानी की मंच से हुंकार एकतरफकांग्रेस का बंटाधार



करवा चौथ

कार्तिक-कृष्णपक्ष चौथ का चाँद देखती हैं सुहागिनें आटा छलनी से.... उर्ध्व-क्षैतिज तारों के जाल से दिखता चाँद सुनाता है दो दिलों का अंतर्नाद। सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प होता नहीं जिसका विकल्प एक ही अक्स समाया रहता आँख से ह्रदय तक जीवनसाथी को समर्पित निर्जला व्रत चंद्रोदय तक। छलनी से छनकर आती



मिट्टी के दीये

हर अंगना हर द्वार - द्वार हर हिये !ज्योर्तिमय हो जग में मिट्टी के दीये !अमावस्या के श्यामपट्ट पर फैलायें !ज्योतिकलश बन जो सारा तम पियें !आशाओं के अगनित स्वरों को लियें !हर दिशा में प्रकाशमान मिट्टी के दीये !वायु के विप्लव वेग से न भयभीत हो !प्रखर प्रज्वलित ज्योति बन जो जलें !निर्भीक निडर नि:छल कितने



परिचय

मेरा इश्क़ मेरा दर्द मेरा रोग लिखता हूँज़ीवन के सारे अनुभवों का योग लिखता हूँसंयोग से संयोग हुआ इस कदर मेराक़ि बिछड़न में अब तलक मैं वियोग लिखता हूँ



उसको पर्दानशीं ही रहने दें...

लुत्फ कुछ बेनकाब हों,कोई बात नहीं, होने दें,चाहतें हया से उठ जायें,चलिये, होती हैं, होने दें,मिज़ाज़ को क्या जे़ब आये,कौन जाने, होती है, होने दें,चालाकी जवां होके इठलाये,रवानी है, होता है, बहकने दें,गुस्सा आग है, सबा भी है ही,राख सुलगती है, खैर, सुलगने दें,दीद को अंधेरे से कब ईश्क रहा,उजालों को आदतन भ



कब नीर बहेगा आँखों में

सागर कब सीमित होगाफिर से वो जीवित होगाआग जलेगी जब उसके अंदरप्रकाश फिर अपरिमित होगा ||सूरज से आँख मिलाएगाकब तक झूमेगा रातों में ?कब नीर बहेगा आँखों में ?छिपा कहाँ आक्रोश रहेगादेखो कब तक खामोश रहेगाज्वार किसी दिन उमड़ेगा सीमाएं सारी तोड़ेगावो सच तुमको बतलायेगाबातों से आग लगायेगाएक धनुष बनेगा बातों काबात



।। बुझ गए सब दिए ।।

।।बुझ गए सब दिए।।- (द्वारा-:©कुमार मनीष)-- (8418056591)--- बुझ गए सब दिए ,--- निराश चहरे हो गए;--- आस में जब उठे,--- कदमों पे पहरे हो गए।--- बुझ गए सब दिए,--- निराश चहरे हो गए।--- रात है गहरी घनी कि,--- धीरे बहता रक्त है।--- हर दिशा चुप सी बैठी,--- और ठहरा वक्त है।--



तुम नहीं हो

इश्क़ है अभिव्यंजना है, तुम नहीं हो दर्द है आलिंगना है, तुम नहीं हो ! कब तलक मैं अश्क़ से गम को कुरेदूँशब्द है संवेदना है, तुम नहीं हो ! मैं वही सबकुछ वही फ़िर क्या है बदला क्यों हृदय में वेदना है, तुम नहीं हो ! आज़ डूबा हूँ समन्दर के सफ़ऱ



अभावों के होते हैं ख़ूबसूरत स्वभाव

आज एक चित्र देखा मासूम फटेहाल भाई-बहन किसी आसन्न आशंका से डरे हुए हैं और बहन अपने भाई की गोद में उसके चीथड़े



तन्हाई

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई हैतेरे साथ तेरी याद आई; क्या तू सचमुच आई हैशायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझिल होने कामुझको देखते ही जब उनकी अंगड़ाई शरमाई हैउस दिन पहली बार हुआ था मुझ को इस बात का एहसासजब उसके मज़बून की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई हैहमको और तो कुछ



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