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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

खुद को तोड़ ताड़ के

कब तक चलेगा काम खुद को जोड़ जाड केहर रात रख देता हूँ मैं, खुद को तोड़ ताड़ के ||तन्हाइयों में भी वो मुझे तन्हा नहीं होने देता जाऊं भी तो कहाँ मैं खुद को छोड़ छाड़ के ||हर बार जादू उस ख़त का बढ़ता जाता हैजिसको रखा है हिफ़ाजत से मोड़ माड़ के ||वैसे ये भी कुछ नुक़सान का सौदा तो नहींसँ



सृजन फिर से नया होगा

अँधेरे जब कभी इंसान के जीवन में आते हैं तभी तो चाँद दिखता है ये तारे टिमटिमाते हैंसरद रातें हुईं लम्बी तो ग़म किस बात का प्यारे सुबह की आस में फिर से चलो दीपक जलाते हैंघना कोहरा है राहों में नज़र कुछ भी नहीं आता चलो फिर से मुहब्बत की घनी बारिश कराते हैंपात शाखों से झरते हैं रवि मायूस रहता है सृजन फि



आखरी बात

ना जाने कौन सी मुलाक़ात हो आख़िरीइसलिए हर मुलाक़ात को स्मरणीय बना लेता हूँना जाने कौन से बात हो आख़िरीइसलिए हर बात को खास बना लेता हूँना जाने कौन सा पल हो आख़िरीइसलिए हर पल को ख़ुशगँवार बना लेता हूँना जाने कौन सा सफ़र हो आख़िरीइसलिए हर सफ़र को यादगार बना लेता हूँना जाने कौन से छंद हो आख़िरीइसलिए हर



तेरी महर के बिन

घिरे हैं आज कांटों में और ना कहीं फूल खिलते हैंसमय तेरी महर के बिन कभी हमदम ना मिलते हैंघाव कुछ इस कदर पाएं है हमने खास अपनों सेदर्द से बिलबिलाते होंठ हम अक्सर ही सिलते हैंबड़ा रूखा सा मौसम है कहीं ना कोई हलचल हैघने पेड़ों की शाखों पे भी तो ये पत्ते ना हिलते हैंराह जो



जहर पीना पड़ा

खुश रहे वो ,इसलिए ये दर्द भी सहना पड़ा,मन न था ,फिर भी मुझे ,उसे अलविदा कहना पड़ा,थी नहीं हसरत कभी जीना पड़े उसके बिना,उसके लिए हर वक़्त ही मरते हुए जीना पड़ा, एक उसके बिन अकेला इस कदर मैं हो गया,हर जख्म तनहा अकेले खुद मुझे सीना पड़ा,उसकी ख्वाहिस थी की मैं जिन्दा रहू,मेरा नाम हो,बस इसलिए ही जिन्दगी का ये



वो केवल मुस्कुराते हैं

मुहब्बत करके जो मझधार में संग छोड़ जाते हैंलाख चाहा किया भूलें वो फिर भी याद आते हैं अगर बनता है हर इंसान केवल एक मिट्टी सेकहो जज़्बात अपने दिल के वो कैसे छुपाते हैं हरे हैं घाव सीने के मगर उनकी ये फितरत हैभूल के सारी पीड़ा को वो केवल मुस्कुराते हैं भले ही सामने सबके मैं पत्थर सा कहूँ खुद कोमगर तन्ह



चलो अब चाँद से मिलने ....

चलो अब चाँद से मिलनेछत पर चाँदनी शरमा रही है ख़्वाबों के सुंदर नगर में रात पूनम की बारात यादों की ला रही है। चाँद की ज़ेबाई सुकूं-ए-दिल लाई रंग-रूप बदलकर आ गयी बैरन तन्हाई रूठने-मनाने पलकों की गली से एक शोख़



सर्द इश्क़

गरम थे रुख़ बहुत अबतक महीना सर्द है साहबज़मी है धूल चेहरे पर या शीशा गर्द है साहब ...करूँ अल्फ़ाज़ में कैसेे बयाँ चाहत का नज़रानाभले मुस्कान है लब पर बहुत पर दर्द है साहब ........💔.....



जब भी

जब भी मौसम ज़मीं पे अपनी फितरत को बदलते हैंमिलन की आस में यारां दिल के अरमान मचलते हैं किसी तपते बदन को जब जब फुहारें ठण्ड देती हैंये बंधन प्यार के एक दूजे की बाहों में फिसलते हैं अब तो सूरज हुआ मद्धिम और रातें भी ठिठुरती हैंउनके आगोश की गर्मी से अब हम ना निकलते हैं जब खिले फूल बगिया में और मौसम भी



नई शुरुआत करते हैं

भले ही मुद्दतों से हम ना तुमसे बात करते हैंतेरे ख़्वाबों में ही लेकिन बसर दिन रात करते हैंये माना बाग़ उजड़ा है बहारें अब ना आती हैंउम्मीदें मन में रख मेघा फिर भी बरसात करते हैंजिन्हें इस ज़िन्दगी में प्यार में भगवान दिखता हैहदें सब तोड़ कर वो फिर से मुलाक़ात करते हैंभूल कुछ हो गईं तुमसे चूक मैंने भ



मुझे चाँद चाहिए

तोड़ लूँ,... उस नक्षत्र को जिस ओर कोई इंगित करे, मुझे वो उड़ान चाहिए,हाँ - हाँ मुझे चाँद चाहिए | नीले क्षितिज पे टंगी छिद्रों वाली,उस काली चादर का



कविता - आ लिपट गले

चप्पा चप्पा हर सडक सडककरता मेरा दिल धडक धडकतुझसे मिलने की चाहत मेंन रहता दिल मेरा राहत मेंहै तू गई कहाँ मेरी बंजारनआ लिपट गले जा मनहारन. तेरी झीनी उस खुशबू मेंखोता रहता क्यों मजनू मैंलाली गुलाब सी होंठ खूबनरमाई जैसे हो घास दूबअब लौट के आजा मनभावनआ गले लिपट जा मनहारन. उन सख्त गर्म दोपहरी मेंउन नर्म अ



गर तन्हा कहीं नजर आये

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इस शतक को शून्य कर दो...!

शून्य से सौ बनानासफलता पर इतरानाकाबिलियत का अपनेबेसाख्ता जश्न मनाना...जो कोई पूछ दे अगरसूरमां हो बहुत तुम गरबस ये करके दिखा दोचक्रव्यूह में घुसे शान सेजरा निकल कर दिखा दोये जो शतक लगाया हैउसे फिर से शून्य बना दो...इतना चले हैं हम सबकि रास्ते चिढ़ गयें हैंइतने हासिल किये मुकम्मलमंजिलें बेनूर हो चली है



डाकिया

डाकिया अब भी आता है बस्तियों में थैले में नीरस डाक लेकर, पहले आता था जज़्बातों से लबालब थैले में आशावान सरस डाक लेकर। गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे क़ायदे भरपूर लिखते थे बड़ों को प्रणाम छो



कुछ फायदा नहीं

कुछ फायदा नहींमैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिनमगर, कुछ फायदा नहीं ||तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब होकिसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशुमैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुमक्योकि कुछ फायदा नहींतुम पूछती मुझसे तो



निशां तो फिर भी रहते हैं

भले ही घाव भर जाएं निशां तो फिर भी रहते हैंमुहब्बत के गमों को आज हम तन्हा ही सहते हैंवो पत्थर हैं ज़माने से कभी कुछ भी नहीं बोलामगर हम उनसे लिपटे आज भी झरने से बहते हैंबड़ी चिंता है दुनिया को कहीं वो बात ना कर लेंतभी जज्बात मन के आज वो नज़रों से कहते हैंकटेगी ज़िन्दगी खुशहाल हो बस साथ में उनकेमहल पर



याद आज भी है

वो मंज़र याद आज भी हैजब देखा था तुझे पहली बारवो ज़माना याद आज भी हैजब चाहा था किसी को पहली बारवो लम्हे याद आज भी हैंजो गुज़रे थे तेरे साथ पहली बारवो बातें याद आज भी हैंजो कि थीं तुम से पहली बारउन ख़तों का मज़मून याद आज भी हैजो लिखे थे तुझे पहली बारवो प्यार रहेगा साथ मेरे ज़िंदगी भरजो हुआ था तुम तुमस



वंदना

हे जग जननी आस तुम्हाराशब्दों को देती तुम धारावाणी को स्वर मिलता तुमसेकण-कण में है वास तुम्हारा |दिनकर का है ओज तुम्ही सेशशि की शीतलता है तुमसेनभ गंगा की रजत धार मेंझिलमिल करता सार तुम्हारा |सिर पर रख दो वरद हस्त माँलिखती रहूँ अनवरत मैं माँहर पन्ने पर अंतर्मन केलिखती हूँ उपकार तुम्हारा || मीना धर



दोहे

हे भगवन ! वर दीजिए, रहे सुखी संसार |घर परिवार समाज पर, बरसे कृपा अपार ||दीन दुखी कोई न हो, औ सूखे की मार |अम्बर बरसे प्रेम से, भरे अन्न भण्डार ||कृपा करो हे शारदे, बढ़े कलम की धार |अक्षर चमके दूर से, शब्द मिले भरमार ||बेटी सदन की लक्ष्मी, मिले उसे सम्मान |रोती जिस घर में बहू, होती विपत निधान ||मीना



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