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कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

धरती की गुहार अम्बर से

प्यासी धरती आस लगाये देख रही अम्बर को |दहक रही हूँ सूर्य ताप से शीतल कर दो मुझको ||पात-पात सब सूख गये हैं, सूख गया है सब जलकलमेरी गोदी जो खेल रहे थे, नदियाँ, जलाशय, पेड़-पल्लवपशु पक्षी सब भूखे प्यासे, हो गये हैं जर्जरभटक रहे दर-दर वो, दूँ मै दोष बताओ किसकोप्यासी धरती आस लगाए, देख रही अम्बर को |इक की



गृहणी हूँ ना !

गृहणी हूँ ना ! नही आता तुकान्त – अतुकान्तमैं नही जानती छन्द-अलंकार लिखती हूँ मै, भागते दौड़ते, बच्चों को स्कूल भेजते ऑफिस जाते पति को टिफिन पकड़ातेआटा सने हाथों से बालों को चेहरे से हटाते ब्लाउंज की आस्तीन से पसीना सुखातेअपनी भावनाओं को दिल में छुपाते,मुस्कुराते, सारे दिन की थकन लिए रात में आते-आते बि



नेमतें बाहम रहें...

ऐसी कोई ख्वाहिश न थी,न ही इम्कां रखते थे कोई,कि वो समझेंगे जो कहेंगे हम।मुख्तसर सी ये गुजारिश कि,बैठें, रूबरू रहें, संग चलें,कि हमसायगी की कोई शक्ल बने।आसनाई मंसूब हो, फिर ये होगा,दरमियां कुछ सुर साझा हो चलेंगे,राग मुक्तिलिफ होंगे, लुत्फ का एका होगा।फर्क है भी नहीं



कुछ पत्रकारों से

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बंगलादेश के राष्ट्रगान में मातृवन्दना

उत्तर प्रदेश के योगी सरकार के सभी मदरसों में स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रगीत गाने के आदेश के खिलाफ कई मुश्लिम संगठन और इस्लामिक धर्मगुरुओं ने आवाज़ बुलंद की है / खबर है की भारतवर्ष के राष्ट्रगान वन्दे मातरम को गैर इश्लामिक करार देते हुए कई मदरसों में इसे गाने नह



पहचानो स्वयं को

पहचानोस्वयं कोमन चाहताहै समय को थाम लू मैं पर वह निकलताही चला जाता है। मन करता हैसमय-चक्रको थाम लूँ हर प्रयासविफल हो जाता है दिनरात, रातदिन गुजरते गये।सप्ताहमहीनों मे बदलते गये।कबदशक गये,बच्चेसे युवा हुए। कबभविष्य,भूतमें बदल गया,समय चक्रतो पूरा घूम गया।बस इस पर नकिसी का र



जय हिंद, जय हिंदी

जयहिंद,जयहिंदीअबहिंदीभाषामेंकार्यआरम्भकरनाचाहिये,प्रशासनकेसारेकार्यहिंदीमेहोनेचाहिये|भारतकाहरबच्चा-बच्चा,नर,नारीहरभारतीययहीकहता,यहीसोचता,भाषाहिंदीहोनीचाहिये|| [1]हिंद,हिंदी,हिंदुस्तान,भारत,भारतीय,भारती,हरदेशभक्तकीपुकार,भाषाहिंदीहिंदुस्तानकी|स्वदेशमेहिंदीभाषीकोक्योंअपमानसह



मेरा गाँव, मेरा देश

मेरा गाँव, मेरा देशएक दिन अचानकमिल गयेरामू काका शहर में,“ सब ठीक तो है गाँव में ” ?......पूछा मैने……… अचम्भे से जन्मजात शहर – विरोधी - रामू काकाकैसे टहलते शहर में ?“ क्या बतायें बेटा ”,कहने लगे दबी जुबान में....... बच्चों से न रहा जाता अब गाँव मेंनिरर्थक आकर्षण शहर का ही अर्थपूर्ण उनके लिये !अस्वस



इकहत्तरवां स्वाधीनता-दिवस

अँग्रेज़ी हुक़ूमत केग़ुलाम थे हम15 अगस्त 1947 से पूर्वअपनी नागरिकताब्रिटिश-इंडियनलिखते थे हम आज़ादी से पूर्व।ऋष



किसकी कितनी आज़ादी है

किसकी कितनी आजादी हैधोती कुरता खादी हैजय बोलो महात्मा गाँधी हैडंडे में लटका एक झंडा हैउसके ऊपर एक फंदा हैजिससे डोरी लटक रही हैहवाएँ किसको झटक रही हैंखूनी पंजो में सिसक रही हैआज़ादी क्यों झिझक रही हैजगह है जिनकी कारागारों मेंसंसद को हथियाये बैठे हैअपने दुर्दम पैरों सेजनमत को लतियाये बैठे है भूखी जन



चाहे दरमियाँ दरारें सही! (इश्क़ बकलोल उपन्यास से)

कल देवेन पाण्डेय जी की नॉवेल इश्क़ बकलोल की प्रति मिली। :) किताब का अमेज़न हार्डकॉपी लिंक जल्द ही एक्टिव होगा। उपन्यास शुरू होने से पहले किताब के 2 पन्नो पर मेरी कलम है….दरिया में तैरती बोतल में बंद खतों की,पलकों से लड़ी बेहिसाब रातों की,नम हिना की नदियों में बह रहे हाथों की,फिर कभी सुनेंगे हालातों की



नैन पर फिर भी मिल गए

छुपाया बहुत खुद को नैन पर फिर भी मिल गएअसर ऐसा हुआ दिल पे फूल खुशियों के खिल गएखौफ ने इस कदर घोला है ज़हर फ़िज़ा में शहर कीलाख जज़्बात हैं दिल में मगर लब कब के सिल गए ज़लज़ला लाने वालों ने तो कमी कोई भी ना छोड़ीजड़े जिनकी गहरी थीं दरख़्त वो सब भी हिल गए फूल पाने की कोशिशें ना मेरी परवान चढ़ सकींफूल



आवारगी भी कभी सोशलिस्ट हुआ करती थी...

चेतनाएं आवारा हो चली हैं,शब्द तो कंगाल हुए जाते हैं...लम्हों को इश्के-आफताब नसीब नहीं,खुशबु-ए-बज्म में वो जायका भी नहीं,मंटो मर गया तो तांगेवाला उदास हुआ,शहरों में अब ऐसे कोई वजहात् नहीं...!तकल्लुफ तलाक पा चुकी अख़लाक से,बेपर्दा तहजीब को यारों की कमी भी नहीं...।आवारगी भी कभी सोशलिस्ट हुआ करती थी,मनच



गुफतगूं ठुमरी सा बयां चाहती हैं...

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09 अगस्त 2017

इश्क़

इश्क़ का रोग लगवाकर वो आज हमसे कह गए " दूर रहो इससे"!जो जिंदगी में आकर, जिंदगी बन गए, आज वो ही , बिन उनके , जिंदगी जीने का नुस्खा दे गए!



राखी का दिन

रक्षाबंधन का दिनभाई-बहिन के प्यार कादिन आयारक्षाबंधन के त्योहार का दिन आयाभाई की कलाई पे बहिन बांधे रखी जिस दिन वो दिन आयासावन में घड़ी में सजे जबभाई बहिन के प्रेम की झांकीवो दिन आयाराखी, रूमाल के व्यापार का दिन आयारक्षाबंधन के त्योहार का दिन आयाबहिन का रक्षा का प्रण लेजब भाईवो दिन आयाजब बहिन भाई को



चुप न रहो, कहते रहो...

मुझसे कहता है वो,क्या कहा, फिर से कहो,हम नहीं सुनते तेरी...चुप न रहो, कहते रहो,सुकूं है, अच्छा लगता है,पर जिद न करो सुनाने की...तुम्हारे साथ भी तन्हा हूं,तुम तो न समझोगे मगर,साथ रहो, चुप न रहो, कहते रहो...कठिन तो है यह राहगुजर,शजर का कोई साया भी नहीं,थोड़ी दूर मगर साथ चलो...भीड़ बहुत है, लोग कातिल हैं



प्रेम धागे का बंधन

तेरे बिन दिन नहीं कटते तुझे कैसे बताएं हमतू ही जब पास ना आए तुझे कैसे सताएं हम तेरा वो रूठ जाना और मनाना याद आता हैसमझ आए न अब कैसे करें सारी खताएं हमदेख कर तेरी मुस्कानें फूल बागों में खिलते थेतेरे बिन देखते हैं अब तो बस सूखी लताएं हमसभी लोगों ने अक्सर रूप मेरा सख्त देखा हैचोट अन्दर जो लगती है उसे



दस्ते दुआ

गली में कुत्ते बहुत भोंकते हैं,बाजार में कोई हाथी भी नहीं...शोर का कुलजमा मसला क्या है,कुछ मुकम्मल पता भी नहीं...चीखना भी शायद कोई मर्ज हो,चारागर को इसकी इत्तला भी नहीं...मता-ए-कूचा कब का लुट चुका है,शहर के लुच्चों को भरोसा ही नहीं...दो घड़ी बैठ कर रास्ता कोई निकले,मर्दानगी को ये हुनर आता ही नहीं...य



गुजर गया अब के ये सावन

गुजर गया अब के ये सावन बिना कोई बरसात हुएसब शिकवे हमने कह डाले बिन तेरी मेरी बात हुए प्यार लुटा के बैरी होना सबके बसकी बात नहींदिल की हालत वो ही जाने जिसपे ये आघात हुए मुझे शिकायत है उस रब से जिसने तुमको भेज दियाप्यासे को नदिया जल जैसे तुम भी मेरी सौगात हुए हाथ पकड़ क



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