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लेख

लेख से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

वो "अशुभ" दिन जब मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ फिर से जी उठी

6 साल पहलेमैंने मुंशी प्रेमचंद जी की लघुकथाओं का संग्रह ख़रीदा था। कथा संग्रह २ भागों में था परपढने का कभी समय ही नही मिला। करीब 2.5 वर्ष पहलेजब मेरी माँ का देहांत हुआ तब मन बड़ा ही व्यथित था। जीवन से मन उचट सा गया था। तब मैंने वो कथासंग्रह पढना शुरू किया पर 10-12 कथाओं के बाद पढने की हिम्मत ही न रही।



... और वो सुकून से मर गये...!

बात बहुत छोटी सी है... पता नहीं, कहनी भी चाहिये या नहीं...!दरअसल, कहना-सुनना एक खास परिवेश एवं माहौल में ही अच्छा होता है। क्यूं...?इसलिए कि विद्वानों ने कहा है, ‘शब्द मूलतः सारे फसाद की जड़ है’...मगर, मामला तो यह भी है कि खामोशी भी कम फसाद नहीं करती...!चलिये, कह ही दे



जीवन का मर्म बस इतना है कि दाल में नमक कितना है...

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... ताकि, हर ताजमहल अपूर्व-अनुपम बने...!

एक कहानी है, शायद आप सबको पता हो। बादशाह शाहजहां ताजमहल बनवाने को लेकर बेहद इमोशनल थे और उनके पास अथाह पैसा था इसलिए वे चाहते थे कि ताजमहल रातों-रात बन कर तैयार हो जाये। उनका जो मुख्य कारीगर था, उसने ताजमहल की जमीं तैयार कर ली और बादशाह से कहा कि उसे दो दिन के लिए अपने घर जाने की छुट्टी चाहिये। शाहज



अब छोड़ दिया...!

बहुत साल पहले, एक फिल्म त्रिशूल देख कर आए मेरे चचा बेहद बेहद खफा थे। बस शुरू हो गये – हद है, तहजीब गयी तेल बेचने, अब तो सिनेमा देखना ही छोड़ दूंगा।हिम्मत जुटा कर मैंने उनसे पूछा, किस बात से नाराज हैं?कहने लगे, सिनेमा में कभी भी गलत बात नही दिखानी चाहिए, सिनेमा हमारे समाज की तहजीब का हिस्सा है। समझाया



कैराना -मोदी-योगी को घुसने का मौका

पलायन मुद्दे के शोर ने कैराना को एकाएक चर्चा में ला दिया ,सब ओर पलायन मुद्दे के कारण कैराना की बात करना एक रुचिकर विषय बन गया था ,कहीं चले जाओ जहाँ आपने कैराना से जुड़े होने की बात कही नहीं वहीं आपसे बातचीत करने को और सही हालात जानने को लोग एकजुट होने



अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन -राजस्थान --हिंदी साहित्य को बंधन मुक्त करें

देश में १ अक्टूबर से १२ अक्टूबर तक राजस्थान में १५ वां अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन चल रहा है . लेखन कार्य में लगी हूँ तो ऐसे सम्मलेन का कौन लेखक होगा जो हिस्सा नहीं



एक कलाकार जिसका कद समय के साथ ऊंचा ही होता गया

फिल्मों का शौक शुरू से रहा हैं पर गोविंदा वाली पीढ़ी में जन्म लेने के कारण कभी भी मनमोहन देसाई के ज़माने की फिल्में देखना अच्छा नही लगा। गुरुदत्त, राज कपूर की फिल्में तो जैसे किसी और ही दुनियां की लगती थी। राजेन्द्र कुमार, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, जितेंद्र, विनोद खन्ना, शत्रुघन सिन्हा, धर्मेंद्र, विन



पटाखों की भ्रूण हत्या

1992 में एक फ़िल्म आई थी, नाम था यलगार। फ़िल्म के एक सीन में 53 वर्षीय पुलिस इंस्पेक्टर फ़िरोज़ खान, जो फ़िल्म के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एडिटर और ज़ाहिर हैं कि लीड हीरो भी थे, अपने 34 वर्षीय पिता कमिश्नर मुकेश खन्ना को फ़ोन पर कहते हैं कि जब आपको पता हैं कि दुनियां का सबसे खतरनाक कॉन्ट्रैक्ट किलर, कार्लोस,



मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट ''पारिवारिक निपटान के ज्ञापन '' का महत्व

संपत्ति का विभाजन हमेशा से ही लोगों के लिए सरदर्द रहा है और कलह,खून-खराबे का भी इसीलिए घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा से इसी कोशिश में रहे हैं कि यह दुखदायी कार्य हमारे सामने ही हो जाये .इस सबमेँ करार का बहुत महत्व रहा है .करार पहले लोग मौखिक भी कर लेते थे और कुछ समझदार लोग वकीलों से सलाह लेकर लिखि



संस्कृति रक्षक केवल नारी

. यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से , बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा . कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी , सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा . भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यम



सुरों की मुकम्मलियत...!

हमारे एक चचा जान हमारी रोज बढ़ती औकात से हमेशा दो मुट्ठी ज्यादा ही रहे। इसलिए, भले ही कई मुद्दों पर उनसे हमारी मुखालफत रही पर उनकी बात का वजन हमने हमेशा ही सोलहो आने सच ही रक्खा।वो हमेशा कहते, जो भी करो, सुर में करो, बेसुरापन इंसानियत का सबसे बड़ा गुनाह है। लोग गरीब इसल



अवलम्ब

अष्टमी का दिन... सुबह के नौ-सवा नौ का वक्त... वो मिली मुझे...!अम्मा को पूजा के फूल चाहिये थे सो सीधा पड़ोस के मंदिर पहुंचा।पहले भी तो कई दफे आ चुका हूं मगर वो पहली बार दिखी मुझे...तिबत्ती थी वो... छोटी सी... बहुत संुदर... देवतुल्य...!उजले सफेद बाल, लाल रंग की मुड़ी-तुड़ी पोशाक... बामुश्किल उसकी छोटी-छो



कन्या पूजन !

आ गई फिर से शारदीय नौरात्र ! चारों तरफ धूम मचीहै, माँ के स्वागत की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही हैं | अब घर-घर माँ की स्थापनाहोगी, उनकी पूजा अर्चना में कोई भी कोई कसर नही उठा रखेगा | हरकोई आपने-अपने स्तर पर माँ को प्रसन्न करने का हर सम्भव प्रयास करेगा | फूल, फल,मेवा, वस्त्र, धूप, दीप, नावैद्य आदि अर



बदलना आसान काम नहीं: लाइफ का गोलडेन रूल है इवाल्व-अपग्रेड होते रहना, अनलर्न करना...

शब्दों का अपने-आप में कोई खास महत्व नही। चारों ओर शब्द ही शब्द हैं। मगर, फिर भी उनका किसी पर असर हो, इसके लिए शब्दों की अच्च्छाई और उपयोगिता तभी बन पाती है जब शब्दों को बेहद उम्दा और ढेर सारे प्यार, आस्था और अपनेपन से स्वीकार किया जाए।शब्द तभी कामयाब और असरदार होते हैं जब उनको सुनने वाले की कहने वाल



महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की कुछ विशेष बातें

ईश्वरचंद्र विद्यासागर जानते थे की बालिकाओ की शिक्षा से ही समाज में फैली रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास और कुरुतियाँ दूर की जा सकती है.देश को समृद्ध , समर्थ और योग्य नागरिक प्रदान करने के लिए बालिकाओ की शिक्षा जरुरी है. उन्होंने बंगाल में ऐसे 35 स्कूल खोले जिसमे बालिकाओ की शि



वेद और संगठन के मूल तत्‍व

वेद और संगठन के मूल तत्‍व आज की वीडियो में ऋग्‍वेद के एक मन्‍त्र की चर्चा करके यह बताने का प्रयास करेंगे कि संगठन के मूल तत्‍व क्‍या हैं।यदि अभी तक आपने हमारे चैनल को सबस्‍क्राईब नहीं किया है तो अवश्‍य करें और नयी ज्ञानवर्धक, प्रेरणास्‍पद् और मनोरंजक वीडियो की जानकारी प



तो इसलिए लोग इश्क को बला, आफते-जां कहते हैं...?

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किस प्रकार का भोजन लाभदायक होता है

किस प्रकार का भोजन लाभदायक होता है आज की वीडियो में यह बताएंगे कि किस प्रकार का भोजन लाभदायक होता है।यदि अभी तक आपने हमारे चैनल को सबस्‍क्राईब नहीं किया है तो अवश्‍य करें और नयी ज्ञानवर्धक, प्रेरणास्‍पद् और मनोरंजक वीडियो की जानकारी पाएं।Share, Support, Subscribe!!!Subs



वर्तमान सुधारें कल सुधरेगा

वर्तमान सुधारें कल सुधरेगाआज सोमवार है और प्रत्‍येक सोमवार को सकारात्‍मक सोच की चर्चा करते हैं। आज की वीडियो में ऐसी सकारात्‍मक चर्चा करेंगे जिससे आप यह जान सकेंगे कि वर्तमान सुधारने से कल कैसे सुधरेगा। यदि अभी तक आपने हमारे चैनल को सबस्‍क्राईब नहीं किया है तो अवश्‍य करें



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