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किस्सा

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अजीब किस्सा है ज़िंदगी अजीब किस्सा है ज़िंदगी,ना जाने किसका हिस्सा है ज़िंदगी?हमेशा नहीं रहती साथ फिर भी सभी की आरज़ू है ज़िंदगी। अजीब किस्सा है ज़िंदगी।खोने को नहीं कुछ बाक़ीजो है पास वह भी च

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प्रमोशन हुई तो पहाड़ की एक ब्रांच में पोस्टिंग हो गई. पैकिंग की, बस पकड़ी और कोटद्वार पहुँच गए. वहां से जीप में सामान डाला और दुगड्डा पहुंचे. यहाँ से पैदल यात्रा शुरू हुई पहले दाएं, फिर बाएं, फिर ऊपर और फिर नीचे! तीन किमी का पथरीला रास्ता तीस किमी लगने लगा. सांसों में अनुलो

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बड़े बैंक की बड़ी ब्रांच में कुछ ना कुछ होता रहता है. बड़ी ब्रांच की लोकेशन बहुत अच्छी थी, मेन रोड पर. ब्रांच के बाएँ हाथ पर एक पेट्रोल पंप था और दूसरी तरफ पोस्ट ऑफिस. इसलिए चहल रहती थी और बसें भी आसानी से मिल जाती थी. आने जाने की सुविधा थी. बिल्डिंग के पहले माले पर याने ब्

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बैंक में ऑडिट बहुत होता है. जितनी ज्यादा बिज़नेस होगा उतनी बड़ी ब्रांच होगी और उतने ही ज्यादा ऑडिटर आएँगे. एक तो घरेलू या इंटरनल ऑडिटर होते हैं ये साल में एक बार आते हैं. एक और इंटरनल ऑडिटर भी हैं जिन्हें कनकरंट ऑडिटर कहते हैं. ये बड़ी ब्रांच में बारहों महीने बैठे रहते हैं औ

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गाँव में बैंक की ब्रांच चलाना आसान काम नहीं है वो भी जब ब्रांच हो झुमरी तल्लैय्या की. कई बार गाँव के कस्टमर को अपनी बात समझानी मुश्किल हो जाती है और कई बार गाँव वाले की बात समझनी मुश्किल हो जाती है. इसका कारण कुछ तो अशिक्षा है और कुछ दोनों तरफ के पूर्वाग्रह. बैंकिंग की जर

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बॉल पॉइंट पेन बैंक में प्रमोशन मिली तो उसके बाद दो साल के लिए किसी गाँव में जा कर नौकरी करनी जरूरी थी. चिट्ठी ले कर दिल्ली से पहुंचे मेरठ रीजनल ऑफिस. बॉस से मुलाकात हुई, - दिल्ली के नज़दीक ब्रांच दे रहा हूँ क्यूंकि दिल्ली वालों की नाक दिल्ली की तरफ ही रहती है. दिल्ली मत भ

आन्ध्र प्रदेश के शहर विजयवाड़ा के प्रसाद जब इंजिनियर बन गए तो उन्होंने नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी. इराक़ की एक तेल कंपनी में नौकरी मिल गई. दो साल बाद छलांग मार कर 2016 में कज़ाख़स्तान की तेल कंपनी में नई नौकरी करने पहुँच गए. वहां प्रसाद को मिस शाखिस्ता मिली. दोनों में प्यार हो ग

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फेसबुक से बड़ा तीर्थस्थल कोई नहीं है. यहां से ज्यादा गॉड कहीं नहीं मिलते. गॉड को धर्मानुसार ट्रांसलेट कर लें ये शिकायत न करें कि उनके धर्म के गॉडों को कुछ नहीं कहा गया. हमें कहा गया.ऐसे ही टहलते हुए. शनिदेव की एक फोटो देखी. लिखा था. ‘देखते ही लिखो जय शनिदेव. 100 सेकंड में कुछ अच्छा होगा.’ मैंने लिखा

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बैंक की एक छोटी सी ब्रांच है जी म्हारे गाँव में और गाँव का नाम है जी घोपला. ना जी नाम घपला ना है घोपला है जी. भगवान भली करे गांव के नाम तो नूं ही होते हैं जैसे की घोपले से पांच चार मील आगे है जी कंकर खेड़ा और उसते भी आगे है जी कसेरू खेड़ा.ब

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बैंक का बिज़नेस बढ़ने के कारण झुमरी तलैय्या के रीजनल मैनेजर गोयल साहब की काफी वाह वाही हुई. गोयल साब की नाक ऊंची हो गई और कालर खड़े हो गए. पर बड़े अधिकारियों ने कुछ और ही सोच रखा था. उन्होंने रीजन को बाँट कर दो ह

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मैनेजर साब ग़ुस्से और बेचैनी में बार बार घड़ी देख रहे थे. 10.20 हो चुके थे और हरेंदर कैशियर का अतापता ही नहीं था. इधर कैश कांउटर पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. मैनेजर साब भुनभुना रहे थे,- आज अगर आया तो इसकी छुट्टी कर दूंगा. सुसरा समझाने से समझता ही

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घर में सन्डे के दिन आम तौर पर शान्ति रहती है पर आज थोड़ी हलचल है. आज तीन बजे राजेश ने अपने साथ मम्मी पापा को लेकर मोती बाग जाना है लड़की देखने. राजेश की बड़ी दीदी अपने घर से सीधे वहीँ पहुँच जाएगी. जीजा के पास का

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जबलपुर कैंट में हमें तीन कमरे का क्वार्टर मिला हुआ था. जैसा की आम तौर पर छावनी में होता है ऐसे चार क्वार्टरों की एक लम्बी सी बैरक थी. इस बैरक का लम्बा कॉमन बरांडा था जो बच्चों के खेल ने के काम आता था. बरांडे के आगे चार बगीचे थे जिनमें सब्ज

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साइकिल थी तो धीरे धीरे मजे मजे में चलाते थे. गांव से शहर तक जाने में एक घंटा लग जाता था. अगर शहर की तरफ जाते जाते शहर से वापिस आता हुआ हरेंदर मिलता तो हम पैडल रोक लेते और बायां पैर सड़क पर टिका कर खड़े हो जाते थे. वो भी सड़क के दूसरी तरफ बाय

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हमारे दोस्त नरुला साब आजकल बड़े हलके फुल्के और खुश नज़र आते हैं. पिछले साल से बेटे के पास जाने का प्रोग्राम बन रहा है और अब तो टिकट भी आने वाला है. नरूला साब तैयारी में हैं की इस बार गया तो फिर वहीँ रहूँगा. फिलहाल जिस फ्लैट में वो रहते हैं उस

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मंदिर से निकल कर मिसेज़ मेहता ने मिसेज़ गुप्ता से बोली,- अच्छा जी चलती हूँ मैं. बहू के आने का टाइम हो गया है.- आपका ख्याल रखती है कि नहीं ? हमारी तो बिचारी सुबह सुबह निकल जाती है रात को आती है. अपना ही ख्याल नहीं रख पाती उल्टा हमें ही उसका ध्

कायदे से तो रंगरूटों से, अनाड़ियों से और नीम हकीम ों से बच के रहना चाहिए. अगर कोई नौसिखिया L लिख कर गाड़ी चला रहा हो तो तुरंत वो रास्ता छोड़ दीजिये. अगर कोई ट्रेनी होटल में आपकी सेवा कर रहा हो और आपने वेज आर्डर किया हो तो वो शायद नॉन-वेज ही

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सरकारी नौकरी का अपना ही मज़ा है. एक ही दफ़्तर में एक ही कुर्सी टेबल पर १० बजे से ५ बजे तक फ़ाइलें उलट पलट करते रहिये. बीच बीच में टी ब्रेक, लंच ब्रेक, गप्प ब्रेक, तफरी ब्रेक और बॉस-सेवा ब्रेक करते रहिये. बॉस की तबीयत बहली रहेगी तो उसी ऑफिस में कुर्सी बनी रहेगी. वैसे भी तब

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प्रमोशन होने के बाद पहली पोस्टिंग मिली नजफ़ गढ़ ब्रांच में. वहां जाकर इच्छा हुई कि नजफ़ गढ़ का गढ़ कहाँ है देखा जाए और इसका इतिहास क्या है पता लगाया जाय. पर ज्यादातर जानकारी ब्रांच के एक चपड़ासी नफे सिंह ने ही दे दी.उन्हीं दिनों शायद इस इलाके म

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बिज्जू का इंटरव्यू अच्छा हो गया था और अब बस इंटर कॉलेज में नौकरी पक्की ही थी. घरवाले भी खुश और बिज्जू भी. घरवालों को अब लड़की ढूँढने की कसमसाहट होने लगी और उनका बस चलता तो बिज्जू की नौकरी जिस दिन लगती उसी दिन बिज्जू को घोड़ी पर भी चढ़ा दे

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