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प्रश्नों पर प्रतिक्रिया दीजिये
ashfaqkhan   |   08 दिसम्बर 2017

भला हुआ के कभी कोई हादसा न हुआ दुबारा ज़िन्दगी में उस से सामना न हुआ हरेक मोड़ पे गुमराही का अंदेशा था खुदा का शुक्र मिरा दोस्त रहनुमा न हुआ मैं टूटने के बहुत ही करीब था लेकिन खुदा के फज़्लो करम से मैं आईना न हुआ ये ज़िंदगी का सफर खत्म हो गया यूं ही न आप मेरे हुए , मैं भी आपका न हुआ गुनाह कुछ तिरा है ,कुछ गुनाह मेरा है तू बेवफा तो हुआ, पर मैं बावफा न हुआ अशफाक़ ख़ान"जबल"

नादनु संधान की अवस्थाए बताये.और हठयोग और राज योग का सम्बन्ध स्पस्ट करे

यह की सब भलीभांती जानते हैं कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है। पर बिडम्वना यह है कि हमारी तरफ से कोई सार्थक प्रयास नजर नहीं आ रहा।ऐसा नहीं कि कौई भी गंभीर नहीं परन्तु जो महानुभाव सक्रिय हैं उनका भी स्वागत करने कौई खास उत्सुकुता नहीं देखने मिलती। एक संकल्प के साभ आगे बडने का उत्साह हम को अपने स्नायु में घोलना होगा। आगे भी लिखा है। अगर आप लोग उत्साह बढाऐगें तो अवशय अगला विस्तारित लेख आपको उपलब्ध कराऊंगा लाइक करें और कमेंट में विचार रखें। धन्यवाद्

SB Singh   |   03 दिसम्बर 2017

मेरे भाईयो अगर कीसी के पास विशेन वँश (मझौली राज) के बारे मे जानकारी हो तो बताये ?

sarita prasad   |   03 दिसम्बर 2017

saritpravahkriti.blogspot.com

Ravindra Kumar
मकतततकक
nidhi   |   10 सितम्बर 2017

जैसे जैसे उम्र गुज़र रही है, मुझमें मैं कम हो रही हूंँ, माँ तू बढ़ रही है । सुबह सवेरे बालों की अब, चोटी बनाना भूल गई हूंँ, तेरी ही तरह अधखुला जूड़ा बनाए, बच्चों के पीछे दौड़ रही हूंँ। मेरे चेहरे पर तुम्हारे चेहरे की लकीरें उभरने लगी हैं, मेरी आंखें भी बिल्कुल तुम्हारी आंखो जैसी, दिखने लगी हैं, कभी अचानक जब, यूँही शीशा दिख जाता चौंक उठती हूंँ मैं, माँ, तेरा अक्स़ नज़र आता है। दो अंगुलियों पर गालों को टिकाए, ना जाने कहां टकटकी लगाए, अक्सर खो जाती हूँ, बिल्कुल जैसे तुम बैठी हो, फिर तुम ही आती हो कहीं से, मुझे हिलाकर ये पूछने, कि ऐसे क्यों बैठी हो? क्या सोच रही हो? सम्हल जाती हूंँ अंगुलियों को हटाते हुए, मुकर जाती हूँ सिर को हिलाते हुए, कि जैसे मैं तुम नहीं हूँ! कि जैसे मैं तुम नहीं हूँ! लेकिन, सच तो यही है कि, जैसे- जैसे उम्र गुज़र रही है, मुझमें मैं कम हो रही हूँ, माँ, तू बढ़ रही है, माँ,तू बढ़ रही है।

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निहाल पाठक
बहुत ही अच्छी कविता है
निहाल पाठक
लड़ाई नहीं हुयी सर। एलीफैंट ड्रैगन के सामने अड़ा रहा और उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। पर समस्या अभी भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुयी है। भाविष्य में भारत चीन के बॉर्डर पर ऐसे टेंशन की सम्भावना आगे भी बरक़रार है। इस खतरे से निपटने के लिए अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और आसियान के देशों के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं।

कृपया सलाह दे कि क्या सही है परिपेक्ष या परिपेक्ष्य

निहाल पाठक
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