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मित्रों ! सादर प्रणाम | सपनों में आकर करते हैं पिता सदा संवाद । अपनों में अपनापन ढूँढ़ो छोड़ो वाद विवाद || इस मिट्टी में पले बढ़े सब हाड़-मांस के पुतले | जाति-धर्म के पैमाने पर क्यों कैसा परिवाद || राजनीति की चौड़ी गलियों के हैं सँकरे सोच | सड़ी व्यवस्था देख रहा हूँ जिससे रिसे मवाद || जीवन ऐसे जियो सँभाले रखना तुम मकरंद | ऐसा कुछ मत करो लगे जीवन तुमको बेस्वाद || चुप रह लेना,कम खा लेना,दम भी रखना खूब | संयम है आचार-संहिता , टूटे नहीं फ़वाद || नोट : फ़वाद (फारसी शब्द ) = दिल ||©ब्रह्मदेव शर्मा ||

मैंने एक लेख लिखा है ,' पत्नी को खुश रखने के 101 नियम ' मैं इसे किसी को बेचना चाहता हु कैसे

mahesh singh bisht
इस लेख लेखिका को आपको किसी पेज पर किसी side पर लिखनी चाहिए. जिससे आपके विचार लोगो तक जा पहुचे

मेरी समझ में व्यंग्य – जब मैं कहता हूँ ‘मेरी समझ में व्यंग्य’ तो इसे दो भागों में बांटा जा सकता है-पहला –‘मेरी समझ’ और दूसरा –‘व्यंग्य’ .जब मैं अपनी समझ के बारे में सोचता हूँ तो हंसी आती है .मुझे समझदार कोई और तो खैर क्या मानेगा मैं खुद ही नहीं मानता .अपने अब तक के किये पर नजर दौड़ता हूँ तो समझदारी से किया हुआ एक आधा काम भी नजर नहीं आता फिर वह लिखाई-पढाई हो ,नौकरी हो, प्रेम हो या फिर रोज के झगड़े- टंटे, सबके सब नासमझी का दस्तावेज़ ही नजर आते हैं .पहले कविता लिखना और पढना भी नासमझी में ही किया और अब ये व्यंग्य लेखन भी नासमझी में ही हो रहा है या यूँ कहें मैं कुछ और करने लायक हूँ ही नहीं इसलिए लेखन कर लेता हूँ .अत: मोटे तौर पर ‘मेरी समझ का ’ अर्थ हुआ ‘नासमझी’ अब व्यंग्य पर आते हैं .जब ये आलेख जो मेरी समझ में व्यंग्य हैं (अपनी समझ के बारे में अपनी राय का खुलासा ऊपर की पंक्तियों में कर ही चुका हूँ अत: जहाँ जहाँ मेरी समझ या हमारी समझ का ज़िक्र हो उसे ‘नासमझी ‘ समझा जाये ) इनके बारे में दो शब्द लिखने कहने के लिए एक जाने माने व्यंग्यकार से दरख्वास्त की तो उन्होंने हमारी समझदारी का संज्ञान लेते हुए सुझाव दे दिया कि बेहतर हो आपके व्यंग्यों पर कोई और राय ज़ाहिर करे ‘व्यंग्य ‘ पर आप अपनी राय ज़ाहिर कर दो .अब राय बनाने के लिए समझ होना भी ज़रूरी है इसलिए मैंने भी ‘मेरी समझ में व्यंग्य’ लिखने का मन बना लिया .मुआमला कविता या कहानी का होता तो राय रेडीमेड होती पर व्यंग्य में राय ज़ाहिर करने से पहले व्यंग्य की समझ भी होनी चाहिए .लीजिये फिर बात ‘समझ’ पे आकर टिक गयी अब परसाई जी तो कहते हैं ---“व्यंग्य जीवन की आलोचना करना है .जीवन के प्रति व्यंग्यकार की उतनी ही निष्ठां होती है ,जितनी कि गम्भीर रचनाकार की .बल्कि ज्यादा ही .इसमें खालिस हंसना या खालिस रोना जैसी कोई चीज़ नहीं होती .”--परसाई जी के इस कथन के पहले भाग से यही ध्वनित होता है कि आमतौर पर पढ़े लिखे लोगों के लिए व्यंग्य गम्भीर चीज़ है नहीं पर इसे गम्भीर से भी गम्भीर चीज़ माना जाना चाहिए .मुझे परसाई जी की बात से इत्तेफाक ना रखने की कोई वज़ह नज़र नहीं आती .एक वक्त था जब मैं व्यंग्य को गम्भीरता से नहीं लेता था और बॉस से लेकर पप्पू पान वाले तक पर गाहे- बगाहे व्यंग्य कर लेता था पर मेरी व्यंग्यबाज़ी का असर ये हुआ कि कार्यालय से लेकर मुहल्ले तक हर कोई सतर्क रहने लगा कि कहीं भूल से भी माइक मेरे हाथ में ना आने पाए .पहले तो मैंने इसे संयोग समझ के नज़रंदाज़ किया पर जब हर जगह से बार बार पत्ता कटने लगा तो समझ में आया कि ये तो मेरे भीतर छिपे व्यंग्यकार का कमाल है .किसी ने कहा है कि सबसे खतरनाक और साहसी व्यक्ति वह होता है जिसके पास खोने केलिए कुछ नहीं होता .अब व्यंग्य की बदौलत अपने पास खोने को तो कुछ है नहीं इसलिए आज की तारीख में मुझसे खतरनाक और साहसी कलम घिस्सू भी शायद ही कोई दूसरा हो .व्यंग्य की आंच को स्वयं झुलसकर महसूसने के बाद व्यंग्य को गम्भीर विधा ना मानने की अगर कहीं कोई गुंजायश रही भी होगी तो वह भी समाप्त हो गयी .फिर जीवन की दाल और तरकारी में नमक की तरह शामिल व्यंग्य से परहेज़ भोजन रुपी जीवन को बेस्वाद भी तो बना सकता है .पति-पत्नी की नोक –झोंक ,मित्रो के साथ चक्कलस ,बॉस के तुगलकी फरमानों के मुकाबले को व्यंग्य की कटार ही काम आती है जो सामने वाले की जान भले ही ना ले पर प्रतिद्वंद्वी की मारकता का एहसास जरुर कराती है .मेरी समझ में व्यंग्य बात कहने की विशिष्ट शैली है ,जिसमे शिष्ट रहना कतई जरूरी नहीं. अब कौन इस शैली का कितनी नफासत और नजाकत से इस्तेमाल करता है ये इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है.व्यंग्य के साथ एक दिक्कत और है –और वो है इस्तेमाल करने वाले के साथ साथ जिस पर इस हथियार का इस्तेमाल किया गया है उसे भी व्यंग्य की समझ होना .वरना व्यंग्य का वार रेत के बोरे पर बंदूक की गोली चलाने जैसा बेअसर सिद्ध होता है . व्यंग्य की पुरातनता तो कबीर के –‘कंकर पत्थर जोरिके मस्जिद लई बनाय’ से तुलसी के –“ विन्ध्य के वासी उदासी महा बिनु नारी दुखारे –“ तक जाती है .भक्तिकालीन साहित्य की गंगोत्री से निकली व्यंग्य की भागीरथी में आधुनिक काल के साहित्यक हरिद्वार तक आते आते विविध रसों और रसायनों का विशेष कर हास –उपहास और परिहास का मिश्रिण हुआ.इस मिश्रण के पश्चात यह भागीरथी बेशक गंगा हो गयी हो पर इस मिश्रण से व्यंग्य विधा दूषित भी हुयी है इसे नकारा नहीं जा सकता .व्यंग्य में हास्य स्वाभाविक रूप से आये तो किसे आपत्ति हो सकती है, पर व्यंग्य को ‘हास्य –व्यंग्य ‘ कहना तो किरायेदार का खुद को जबरिया ‘मकान मालिक’ घोषित करना है ,अनैतिक है . व्यंग्य तो लगती हुई बात है, अब लगती हुयी बात को हंसकर कहने के चक्कर में बात की धार ही कुंद कर दी जाये इसका औचित्य मेरी समझ से परे है . मेरे व्यंग्य कैसे हैं ?वे व्यंग्य हैं भी या नहीं इसका फतवा तो व्यंग्य के मदरसों के मौलाना और इमाम जब देंगे तब देंगे पर साल सवा साल पहले एक जमे-जमाये व्यंग्यकार ने मेरे आलेखों में व्यन्ग्याणुओं के होने की तस्दीक करते हुए एक फतवा दे डाला था –“ बरखुदार व्यंग्य तो है इनमे पर इन्हें कोई छापेगा नहीं ?”अब अपन की ऊपर की साँस ऊपर तो नीचे की नीचे अटक गयी डरते डरते पूछा—“ हुजुर ऐसा भी क्या नुक्स है इन बेचारों में ?” अपनी अल्पसंख्यक लटो को सुलटाते हुए व्यंग्याचार्य ने रहस्य से पर्दा उठाया –“ बालक तुमने एक लाइन में पंजे को तो दूसरी में फूल, तीसरे में साईकिल और चौथे में हाथी को चित्त कर दिया .अब ऐसे में किस सम्पादक की मति मारी गयी जो तुम्हारे इन युगांतरकारी लेखों को छाप कर विज्ञापन रस के स्रोत में सायनाइड मिलाने की मूर्खता करेगा “. बहुत प्रक्टिकल बात कही थी आचार्य ने और अपन इतने खौफजदा हुए इस फतवे से कि किसी बड़े अख़बार या पत्रिका में इन व्यंग्यों को मोक्ष हेतु भेजने की हिम्मत ही ना जुटा पाए . मैं सर्वाधिक अध्ययनशील व्यंग्यकार डॉ सुरेश् कान्त का आभारी हूँ जिन्होंने पूरे मन से व्यंग्य विधा के बारे में लिखते हुए अपनी राय जाहिर की .मैं ह्रदय की गहराइयों से बुद्धिजीवी व्यंग्यकार भाई सुभाषचंदर का भी आभारी हूँ जिन्होंने मेरे इन व्यंग्य-लेखों की भूमिका लिखकर मुझे संबल प्रदान किया . मैं ‘वर्तमान मीडिया ‘ के सह सम्पादक आमिर मलिक जोकि पत्रकारिता के मूल्यों के लिए आत्मघाती साहस से लबरेज़ हैं ने २ वर्ष तक निरंतर पत्रिका की कवर स्टोरी पर केन्द्रित मेरे व्यंग्य आलेखों को ‘वर्तमान मीडिया ‘ में प्रकाशित किया का भी आभार व्यक्त करता हूँ साथ ही यह जोड़ना भी जरूर.मेरे लिए लेखन एक विवशता है.औसत सरकारी कर्मचारी की तरह ना जीने के मेरे संकल्प को किसी हद तक पूरा करने में सतत लेखन की मेरी आदत जो एक तरह की मजबूरी है कुछ और ना आने की और ना कर पाने की उसके चलते कविता ,व्यंग्य ,आलोचना ,क्रांतिकारियों के जीवन पर आधारित साहित्य ,फिल्म समीक्षा ,बाल साहित्य ,कहानी ,निबन्ध जब जैसा मौका होता है लिखता ही रहा हूँ बिना किसी हानि लाभ ,यश-अपयश की परवाह किये ---.परमात्मा से भी यही प्रार्थना है कि यदि वह कभी अच्छे मूड में आकर मुझे वरदान देने का मन बनाये तो लेखन की निरन्तरता का वरदान दे -----और क्या कहूँ –बस इतना और कि –तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा .--------

क्यो भारत की एक राष्ट्रीय भाषा नहीं है और सब देसो की एक ना एक राष्ट्रीय भाषा है ?

अभय विवेक अगगरोइआ

भाषा अनेक होने के बावजूद एक ऐसी भाषा का विकास भी करना जरूरी हो जो सामान्य हो- लेकिन राजनैतिक पार्टियां ऐसा नहीं होने देती, -- जब तक जाती, भाषा , धर्म  के आधार पर बांटे  जाएंगे तो इनके पकवान पकते रहेंगे ---- चाहे  कोई  भी पार्टी सत्ता में आये.

                

स्वार्थ से भरी इस दुनिया मे कौन किसी का होता है परछाई भी छोड़ जाती है साथ जब घोर अंधेरा होता है

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mahesh singh bisht
आपका विश्वास आपकी neev होनी चाहिये
प्रवीण कुमार शर्मा
लम्बा  इन्वेस्टमेंट  

मैं अपनी प्रोफाइल फोटो को सेव नहीं कर पा रहा, साथ ही जन्म तिथि जो गलत है को सही नहीं कर पा रहा.... सेव होने में काफी समय लगने के बाद भी प्रकिर्या सफल नही हो रही ...

mahesh singh bisht
आप एक बार अपने network को chaeq करिये. हो सकता हैं network problem आ रही हो

Laila Majnu – लैला और मजनूं एक प्रेम कहानी है जिसकी उत्पत्ति 11 वी शताब्दी में सेंचुरी अरबिया में हुई थी, बाद में उसे पर्शियन कवी निजामी गंजवी ने अपना लिया था जिन्होंने “खोसरो और शिरीन” भी लिखी थी। पाँच सबसे लम्बी कथा कविताओ यह तीसरी थी। लैला और मजनूं एक प्रेम कहानी – Laila Majnu Love Story in Hindi निजामी के बहुत समय पहले, किंवदंती अपने वास्तविक रूप में इरानिनन अख़बार में थी। मजनूं के बारे में वास्तविक जानकारी बहुत कम है। निजामी के कार्य में बहुत सी नकली बाते सामने आ रही थी, उनके कार्यो के बाद बहुत सी वास्तविक बातो को उजागर किया गया था। कहानी – कायस इब्न अल-मुलाव्वाह लैला के प्यार में पड़ गया था। जल्द ही उसने अपने और लैला के प्यार पर कविताए बनाना शुरू कर दी, कविताओ में वह लैला के नाम का जिक्र भी किया करता था। लैला को मनाने के लिए उसके द्वारा की जा रही कोशिशो को देखते हुए स्थानिक लोगो ने उसे मजनूं का नाम दिया था। और जब मजनूं ने लैला के पिता से शादी का हाथ माँगा तो लैला के पिता ने इंकार कर दिया था, उन्होंने ऐसा कहकर इंकार कर दिया की लैला किसी पागल इंसान से शादी नही करेंगी। इसके बाद लैला की शादी किसी अमीर व्यापारी से करवा दी गयी। जिससे उनकी शादी हुई वह इंसान भी काफी अच्छा और खुबसूरत भी था, उसका नाम वरद अल्थाक़फ़ी था। जब मजनूं ने लैला की शादी के बारे में सुना तो वह आदिवासी इलाके से भाग गया और आस-पास के रेगिस्तान में आवारागर्दी करने लगा। उनके परिवार ने उसके वापिस आने की आशा भी छोड़ दी थी और वे जंगल में उसके लिए खाना छोड़ चले जाते थे। कयी बार मजनूं लैला के प्यार में मिटटी पर लकड़ी की सहायता से लैला पर आधारित कविताए भी लिखता था। लैला को भी शादी के बाद अपने शौहर के साथ उत्तरी अरबिया में भेज दिया गया था। कुछ कथाओ के अनुसार लैला की मृत्यु अपने मजनूं को देखे बिना ही ह्रदय विकार की वजह से हुई थी। लेकिन मजनूं को इस बात का पता 688 AD में लगा था। इसके बाद मजनूं ने लैला की कब्र के पास पत्थरो पर तीन कविताए लिखी, जो लैला के लिए मजनूं द्वारा लिखी गयी अंतीम कविताए थी। उनकी मृत्यु से पहले उनके प्यार में और भी बहुत सी रोमांचक बाते हुई थी। मजनूं द्वारा लिखी गयी कविताओ में निचे की कविता भी शामिल है – “मै इन दीवारों से गुजरता जाऊंगा, जिनसे लैला गुजरती है और मै उस दीवार को किस (चूमना) करूंगा जिससे लैला गुजरती है यह मेरे दिल में दीवारों के प्रति प्यार नही है जो मेरे दिल को खुश करता है लेकिन जो उन दीवारों के पास से चलकर मेरा ध्यान आकर्षित करती है, उससे मुझे प्यार है।” यही लैला और मजनूं की एक शोकपूर्ण प्रेम कहानी है। इस तरह की प्रेम कहानी को अक्सर “कुँवारा प्यार” कहा जाता है क्योकि ऐसी प्रेम कहानियो में प्रेमी जोड़ो को कभी शादी नही होती। इतिहास में ऐसी बहुत सी प्रेम कहानियाँ हमें देखने को मिलती है, जिनमे लैला और मजनूं के साथ-साथ रोमियो और जूलिएट का भी समावेश है। लैला और मजनूं की मौत के बाद ही दुनिया ने जाना की उनकी मोहब्बत में कितनी सच्चाई थी। दोनों को साथ-साथ दफनाया गया ताकि इस दुनिया में न मिलने वाले लैला-मजनूं जन्नत में जाकर मिले।

यहाँ लिखना कठिन जान पड़ रहा है,क्या करूँ?