बिन_साजन_के_सावन_कैसा

कविता---बिन साजन के सावन कैसा

बारिश की बूंदों से जलतीहीय में मेरे आज सुलगतीपीपल के पत्तो की फडफडजैसे दिल की धडकन धडधडचूल्हे पर चढ़ गयी कढाई दूरहुई दिल की तन्हाईलेकिन सबकुछ लागे ऐसा बिनसाजन के सावन कैसा. चलती है सौंधी पुरबाई हुएइकट्ठे लोग लुगाईउनके वो और वो हैं उनकी





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