आध्यात्म



धार्मिक आस्था का मूल आध्यात्म

धार्मिक आस्था का मूल अध्यात्मसामान्य रूप से भारत में छः दर्शनप्रचलित हैं | इनमें एक वर्ग उन दर्शनों का है जो नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं |इनमें प्रमुख है चार्वाक सिद्धान्त | यह दर्शन केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है| ईश्वर की सत्ता नहीं मानता और शरीर को ही प्रमुख मानता है | आत्मा की सत्ता कोस्वीकार



प्रकृति में है परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ *मनुष्य माता - पिता के संयोग से इस पृथ्वी पर आता है | मानव जीवन में माता - पिता का बहुत बड़ा महत्त्व है बिना इनके इस संसार में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त ही नहीं हो सकता | जन्म लेने के बाद मनुष्य पर



मन

क्यों ये मन कभी शांत नहीं रहता ?ये स्वयं भी भटकता है और मुझे भी भटकाता है।कभी मंदिर, कभी गॉंव, कभी नगर, तो कभी वन।कभी नदी, कभी पर्वत, कभी महासागर, तो कभी मरुस्थल।कभी तीर्थ, कभी शमशान, कभी बाजार, तो कभी समारोह।पर कहीं भी शांति नहीं मिलती इस मन को।कुछ समय के लिये ध्यान हट जाता है बस समस्याओं से।उसके



मन को कैसे बदलें :--- आचार्य अर्जुन तिनारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !!मानव के जीवन में मन का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है | मन को साधने की कला एक छोटे बच्चे से सीखना चाहिए जो एक ही बात को बार बार दोहराते हुए सतत सीखने का प्रयास करते हुए अन्तत: उसमें सफल भी हो जाता है | मन की चंचलता से प्राय: सभी परेशान हैं | सामान्य जीवन में मन की औसत स्थिति हो



मन की विचित्रता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अपने संपूर्ण जीवन काल में अनेकों मित्र एवं शत्रु बनाता है | वैसे तो इस संसार में मनुष्य के कर्मों के अनुसार उसके अनेकों शत्रु हो जाते हैं जिनसे वह युद्ध करके जीत भी आता है , परंतु मनुष्य का एक प्रबल शत्रु है जिससे जीत पाना मनुष्य के लिए बहुत ही कठिन होता है | वह



मन का लगाव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य इस धरा धाम पर जन्म लेकर के जीवन भर अनेकों कृत्य करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करता है | इस जीवन अनेक बार ऐसी स्थितियां प्रकट हो जाती है मनुष्य किसी वस्तु , विषय या किसी व्यक्ति के प्रति इतना आकर्षित लगने लगता है कि उस वस्तु विशेष के लिए कई बार संसार को भी ठुकराने का संकल्प ले लेता है | आखि



मन की पवित्रता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में पवित्रता का बहुत बड़ा महत्त्व है | प्रत्येक मनुष्य स्वयं को स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहता है | नित्य अनेक प्रकार से संसाधनों से स्वयं के शरीर को चमकाने का प्रयास मनुष्य द्वारा किया जाता है | क्या पवित्रता का यही अर्थ हो सकता है ?? हमारे मनीषियों ने बताया है कि प्रत्येक तन के भीतर एक मन



आध्यात्मिक ज्ञान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *इस संसार में आदिकाल से लेकर आज तक अनेक ज्ञानी - विज्ञानी एवं महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने ज्ञानप्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित किया है | हमारे ज्ञानग्रंथों के अनुसार इन ज्ञानियों को तीन श्रेणियों में रखा गया है :- १- भौतिक ज्ञानी , २- मानसिक ज्ञानी एवं ३- आध्यात्मि



मानस गीत मंजरी

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साधना - - दिनचर्या के कार्यों के साथ - साथ

^^^^^ साधना - - दिनचर्या के कार्यों के साथ - साथ ^^^^^ ()साधना, जिसके लिए अलग समय देने की आवश्यकता नहीं;ऐसी साधना की बात करें। साधना, जो दिन प्रतिदिन के कार्यों को करते हुए की जा सके;ऐसी साधना की बात करें।। स्वयं से जुड़े रहना;होश में बने रहना;बड़ी उपलब्धियां हैं;उन्हे



अनुभव : एक निज सेतु

II अनुभव : एक निज सेतु IIहमारा निज अनुभव, मनोभाव के स्तर पर, हमें बतलाता है कि भविष्य में स्वयं के अंदर कैसे भाव उभरेंगे ? अंदर के भावों की द्रष्टि से, निज अनुभव हमारे स्वयं के लिए हमारे स्वयं के वर्तमान से निकलते हुये भविष्य की झलक



नजरिया और जीवन

भूमिका : हम देखते हैं, पाते हैं कि अलग अलग व्यक्ति अलग अलग ढ़ंग से, अपने अपने ढ़ंग से ही जीवन जी रहे हैं। बहुत मौटे तौर पर, हम इसको 3 श्रेणी में रख सकते हैं या 3 संभावनाओं के रूप में देख सकते हैं। हरेक के जीवन में हर प्रकार के क्षण आते हैं, उतार चढ़ाव आते हैं, पर कुल मि



दोराहा

- = + = दोराहा - = + =हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा;भटकन से भरा, स्थायित्व से भरा होता है दोराहा। जिसे जो राह चलन



गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण

" गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण "हम गुस्सा, करते रहते हैं;और गुस्सा करने को, उचित भी ठहराते रहते हैं;और साथ साथ, यह भी, मानते रहते हैं;कि गुस्सा देता, सिर्फ घाटा;. . . सिर्फ हानी;और होते, कितने नुकसान हैं। .. . इस उलझन को, हम देखते हैं।।1।।.. .जब जब हमारा काम हो जाता है, गुस्सा करने से;सफलता मिल जात



यह मेरा जीवन कितना मेरा है ?

** यह मेरा जीवन कितना मेरा है ? ** यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, वो किस का है? वो किस किस का है? हम में से प्रत्येक यह प्रश्न, इस तरह के प्रश्न स्वयं से कर सकता है। यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, मैं उसको मेरा कहता हूं, समझता हूं। परयह मेरा जीवन कितना मेरा है?हम कहते तो हैं कि यह मेरा जीवन है;कौन नहीं कहता



गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण

" गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण " हम गुस्सा, करते रहते हैं;और गुस्सा करने को, उचित भी ठहराते रहते हैं;और साथ साथ, यह भी, मानते रहते हैं;कि गुस्सा देता, सिर्फ घाटा; . . . सिर्फ हानी;और होते, कितने नुकसान हैं। . . . इस उलझन को, हम देखते हैं।।1।।. . . जब जब हमारा काम हो जाता है, गुस्सा करने से;स



यह मेरा जीवन कितना मेरा है ?

** यह मेरा जीवन कितना मेरा है ? ** यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, वो किस का है? वो किस किस का है? हम में से प्रत्येक यह प्रश्न, इस तरह के प्रश्न स्वयं से कर सकता है। यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, मैं उसको मेरा कहता हूं, समझता हूं। पर यह मेरा जीवन कितना मेरा है? हम कह



सुख एवं दुख :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जब से मानवी सृष्टि हुई तब से लेकर आज तक मनुष्य के साथ सुख एवं दुख जुड़े हुए हैं | समय समय पर इस विषय पर चर्चायें भी होती रही हैं कि सुखी कौन ? और दुखी कौन है ?? इस पर अनेक विद्वानों ने अपने मत दिये हैं | लोककवि घाघ (भड्डरी) ने भी अपने अनुभव के आधार पर इस विषय पर लिखा :- "बिन व्याही ब



आत्म परिष्कार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जिस प्रकार संसार में उपलब्ध लगभग सभी वस्तुओं को अपने योग्य बनाने के लिए उसे परिमार्जित करके अपने योग्य बनाना पड़ता है उसी प्रकार मनुष्य को कुछ भी प्राप्त करने के लिए स्वयं का परिष्कार करना परम आवश्यक है | बिना परिष्कार के मानव जीवन एक बिडंबना बनकर रह जाता है | सामान्य मनुष्य , यों ही अ



आध्यात्मिक भ्रान्ति

जय सिय रामभारत सदा से ही एक समृद्ध परंपरा और संस्कृति का प्रचारक रहा हैI क्या हम अपने देश को आध्यात्म-विहीन देश के रूप में देख सकते हैं? प्रश्न यह है कि “आजकल की युवा पीढ़ी धर्म को मज़हब या सम्प्रदाय मानने लगी और उन्हें केवल उपरी सतह



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