आध्यात्म

अनुभव : एक निज सेतु

II अनुभव : एक निज सेतु IIहमारा निज अनुभव, मनोभाव के स्तर पर, हमें बतलाता है कि भविष्य में स्वयं के अंदर कैसे भाव उभरेंगे ? अंदर के भावों की द्रष्टि से, निज अनुभव हमारे स्वयं के लिए हमारे स्वयं के वर्तमान से निकलते हुये भविष्य की झलक



नजरिया और जीवन

भूमिका : हम देखते हैं, पाते हैं कि अलग अलग व्यक्ति अलग अलग ढ़ंग से, अपने अपने ढ़ंग से ही जीवन जी रहे हैं। बहुत मौटे तौर पर, हम इसको 3 श्रेणी में रख सकते हैं या 3 संभावनाओं के रूप में देख सकते हैं। हरेक के जीवन में हर प्रकार के क्षण आते हैं, उतार चढ़ाव आते हैं, पर कुल मि



दोराहा

- = + = दोराहा - = + =हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा;भटकन से भरा, स्थायित्व से भरा होता है दोराहा। जिसे जो राह चलन



गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण

" गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण "हम गुस्सा, करते रहते हैं;और गुस्सा करने को, उचित भी ठहराते रहते हैं;और साथ साथ, यह भी, मानते रहते हैं;कि गुस्सा देता, सिर्फ घाटा;. . . सिर्फ हानी;और होते, कितने नुकसान हैं। .. . इस उलझन को, हम देखते हैं।।1।।.. .जब जब हमारा काम हो जाता है, गुस्सा करने से;सफलता मिल जात



यह मेरा जीवन कितना मेरा है ?

** यह मेरा जीवन कितना मेरा है ? ** यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, वो किस का है? वो किस किस का है? हम में से प्रत्येक यह प्रश्न, इस तरह के प्रश्न स्वयं से कर सकता है। यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, मैं उसको मेरा कहता हूं, समझता हूं। परयह मेरा जीवन कितना मेरा है?हम कहते तो हैं कि यह मेरा जीवन है;कौन नहीं कहता



गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण

" गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण " हम गुस्सा, करते रहते हैं;और गुस्सा करने को, उचित भी ठहराते रहते हैं;और साथ साथ, यह भी, मानते रहते हैं;कि गुस्सा देता, सिर्फ घाटा; . . . सिर्फ हानी;और होते, कितने नुकसान हैं। . . . इस उलझन को, हम देखते हैं।।1।।. . . जब जब हमारा काम हो जाता है, गुस्सा करने से;स



यह मेरा जीवन कितना मेरा है ?

** यह मेरा जीवन कितना मेरा है ? ** यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, वो किस का है? वो किस किस का है? हम में से प्रत्येक यह प्रश्न, इस तरह के प्रश्न स्वयं से कर सकता है। यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, मैं उसको मेरा कहता हूं, समझता हूं। पर यह मेरा जीवन कितना मेरा है? हम कह



सुख एवं दुख :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जब से मानवी सृष्टि हुई तब से लेकर आज तक मनुष्य के साथ सुख एवं दुख जुड़े हुए हैं | समय समय पर इस विषय पर चर्चायें भी होती रही हैं कि सुखी कौन ? और दुखी कौन है ?? इस पर अनेक विद्वानों ने अपने मत दिये हैं | लोककवि घाघ (भड्डरी) ने भी अपने अनुभव के आधार पर इस विषय पर लिखा :- "बिन व्याही ब



आत्म परिष्कार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जिस प्रकार संसार में उपलब्ध लगभग सभी वस्तुओं को अपने योग्य बनाने के लिए उसे परिमार्जित करके अपने योग्य बनाना पड़ता है उसी प्रकार मनुष्य को कुछ भी प्राप्त करने के लिए स्वयं का परिष्कार करना परम आवश्यक है | बिना परिष्कार के मानव जीवन एक बिडंबना बनकर रह जाता है | सामान्य मनुष्य , यों ही अ



आध्यात्मिक भ्रान्ति

जय सिय रामभारत सदा से ही एक समृद्ध परंपरा और संस्कृति का प्रचारक रहा हैI क्या हम अपने देश को आध्यात्म-विहीन देश के रूप में देख सकते हैं? प्रश्न यह है कि “आजकल की युवा पीढ़ी धर्म को मज़हब या सम्प्रदाय मानने लगी और उन्हें केवल उपरी सतह



दूल्हा दूल्हन मिल गये ------ आचार्य अर्जुन तिवारी

‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ *सनातन धर्म जितना वृहद एवं रहस्यात्मक उतना ही वृहद एवं रहस्यात्मक सनातन साहित्य भी है | भारत भूमि में अनेकों साहित्यकार एवं चिंतक तथा कवि हुए हैं | उनकी रचनाओं में कहीं ना कहीं अद्भुत रहस्य छुपा होता है | किसी कवि ने लिखा है ------- सुना सुनी की



आध्यात्म और योग को भी लेखों में शामिल करें .

हिंदी में बनाये गए इस पोर्टल का हिंदी प्रेमियों के जगत में किया जा रहा प्रयास सराहनीय है . कविता, स्वास्थय आदि वर्टिकलों के साथ साथ इस समय के समसामयिक विषयों में आध्यात्म और योग को भी यदि शामिल किया जाये तो पाठकों की संख्या कही अधिक हो सकती ह



अहम् ब्रह्मास्मि...

मेरा ईश्वर, मेरे सामने खड़ा,मेरा ही विराट रूप तो है,मेरी अपनी ही क्षमताओं के,क्षितिज के उस पार खड़ा, खुद मैं ही ‘परमात्मा’ तो हूं,... अहम् ब्रह्मास्मि, इति सत्यम,मैं अपनी ही राह का मंजिल,अपनी संभावनाओं का भक्त,पूर्णता की ईश्वरता का आध्य,मैं ही साधन, मैं ही साध्य,मैं ही पूजा, मैं आराधन,मैं स्वयं अपना



चवन्नी से अठन्नी का प्रबंधन सीखिये...

सब मिथ्या है, कहता तो हर कोई है,नश्वर है हर यथार्थ, जानते सभी हैं,झलावा है जो होने जैसा दिखता है,माया है जिसने सबको भरमाया है...अपना तो खुद का वजूद भी नहींगोया सोच भी अपनी मिल्कियत नहीं,‘मैं’ का उन्माद मूर्खता की नुमाइश है,चैरासी लाख जन्मों का यही सरमाया है...?जब सब ‘शून्य’ है तब यह हाल है,इंसान किस



क्यूं सहम जाते हैं...?

सबके अपने-अपने तयशुदा सांचे होते हैं,इश्क भी सांचों की खांचों में फंसे होते हैं।मां-बाप, भाई-बहन, जोरू-सैंयां सब सांचे हैं,आप अच्छे जब सबके सांचों में ठले होते हैं।प्रेम, रूप-स्वरूप की आकृति से परे बेवा है,हम तो ईश्वर को भी पत्थरों में कैद रखते हैं।सफलता-विफलता के भी सरगम तय छोड़े हैं,रिश्तों की रागद



इस कला के दायरे के बाहर कोई नहीं, न चेतना, न यथार्थ, न ही ईश्वर

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निस्पृह भाव व अकाम कर्म प्राप्ति की सबसे बड़ी बाधा ही ईश्वर है...!

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बिना निष्कर्ष की कहानी....

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दुख जैसा है, तभी अपना है

तेरा मिलना बहुत अच्च्छा लगे है, कि तू मुझको मेरे दुख जैसा लगे है...ये चर्चा, किसी के हुस्न की नही है। ना ये बयान है किसी के संग आसनाई के लुत्फ की। सीधे-सहज-सरल लफ्जों में यह तरजुमा है एक सत्य का। सच्चाई यह कि अपनापन और सोहबत की हदे-तकमील क्या है।अपना क्या है? कौन है?... वही जो अपने दुख जैसा है! मतलब



जीवन को, अपनी चेतना को, टुकड़ों में ना बांटें....

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