आओ

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होली सो होली , ' आओ मिल कर खेलें होली'

मेरी नन्द मनीषा रामरक्खा फिजी यूनिवर्सिटीमें हिंदी की प्रोफेसर हैं उन्होंने फिजी में हिंदी साहित्य के उत्थान के लिए बहुतकाम किया .मुझे उनपर गर्व हैं . उनकी होली उत्सव पर लिखी कविता मुझे बहुत पसंदआयीं मैने पाठकों के लिए शेयर की है . होली सो होली मनी



यादों की महफिल

आओ ना बैठो ना कुछ पल ही सही साथ बिताओ ना । आप हो हम हों,बातों की महफिल हो और ठहाके हो।यादों के फूल खिले हो, और सुगंध से मन प्रफुल्लित हो ।और साथ-साथ गरमागरम चाय हो,आलू के गुटके हो।गुड़ की डली के साथ चाय की चुस्की हो,और संग हो।अपनों की संगति,



हिन्दी की सामर्थ्य

हिन्दी की सामर्थ्यएक भाषा है जो मुझसे, बात करती है मैं कहीं भी जाऊँ, मुलाक़ात करती है , चाँदनी में दिखती, तारों में छिप जाती, जुगनुओं की तरह मेरेसाथ चलती है,हमने अपने बेटे से कहा,हिन्दी मे पहाड़ेसुनाओ,बोला पापा हमें खामखां मत गड़बड़ाओ,मेडम कहती है, नौकरी तभी मिलेगी जब अँग्रेजी पढ़ोगे,नहीं तो ज़िंदगी भरह



"पद" भैया चंद्रयान ले आओ

"पद"भैया चंद्रयान ले आओमैं हूँ चंद्रमा घटता बढ़ता, आकर के मिल जाओउड़नखटोला ज्ञान भारती, ला झंडा फहराओइंतजार है बहुत दिनों से, इसरो दरस दिखाओलेकर आना सीवन साथी, आ परचम लहराओराह तुम्हारी देख रहीं हूँ, मम आँगन इतराओस्वागत करती हूँ भारत का, ऋषिवत ज्ञान खिलाओबड़े जतन से राखूंगी मैं, अपनी चाल बढ़ाओकहती रहती द



“गज़ल” आकाश उठाकर तुम जब वापस आओगे

वज़्न- २२१ १२२२ २२१ १२२२ काफ़िया- अ रदीफ़ आओगे “गज़ल” आकाश उठाकर तुम जब वापस आओगेअनुमान लगा लो रुक फिर से पछताओगेहर जगह नहीं मिलती मदिरालय की महफिल ख़्वाहिश के जनाजे को तकते रह जाओगे॥ पदचाप नहीं सुनता अंबर हर सितारों का जो टूट गए नभ से उन परत खिलाओगे॥इक बात सभी कहते हद में रह



कविता

डा हिमेन्दर बाली हिम





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