मोह :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सम्पूर्ण जीवनकाल में मनुष्य काम , क्रोध , लोभ , मद , मोह , अहंकार आदि से जूझता रहता है | यही मनुष्य के शत्रु कहे गये हैं , इनमें सबसे प्रबल "मोह" को बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं :- "मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला" अर्थात सभी रोगों की जड़ है "मोह" | जिस प्रकार मनुष्य को अंधकार में कु



क्षणभंगुर जीवन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन काल से मनुष्य भगवान को प्राप्त करने के अनेकानेक उपाय करता रहा है , परंतु इसके साथ ही भगवान का पूजन , ध्यान एवं सत्संग करने से कतराता भी रहता है | मनुष्य का मानना है कि भगवान का भजन करने के लिए एक निश्चित आयु होती है | जबकि हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के जीवन का कोई भरोसा नहीं ह



प्रसन्नता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सकल सृष्टि में हर प्राणी प्रसन्न रहना चाहता है , परंतु प्रसन्नता है कहाँ ? लोग सामान्यतः अनुभव करते हैं कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि प्रसन्नता के मुख्य सूचक हैं | यह सत्य है कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि अल्प समय के लिए एक स्तर की संतुष्टि दे सकती है | परन्तु यदि यह कथन पूर्णतयः सत्य था तब वो सभी जिन्ह



ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का सदुपयोग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर अनेक प्राणियों के मध्य में मनुष्य सबसे ज्यादा सामर्थ्यवान एवं शक्ति संपन्न माना जाता है | अनेक प्राणी इस सृष्टि में ऐसे भी हैं जो कि मनुष्य अधिक बलवान है परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य शारीरिक शक्ति में भले ही हाथी , शेर , बैल , घोड़े आदि से कम हो परंतु बौद्धिक बल , सामाजिक बल एवं आत्



आत्मा पुरुष है या स्त्री ? आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का सृजन परमपुरुष परमात्मा की इच्छामात्र से हुई है | परमात्मा के अंशस्वरूप आत्मा का सृजन हुआ | यही आत्मा समस्त जड़ - चेतन में विद्यमान होती है | आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता है | मनुष्य की मूल सत्ता न शरीर है और न उसकी इच्छाएँ आकांक्षा हैं | बल्कि इनका आत्मा ही मनुष्य का मूल स्वरूप है | यह आ



आत्मबल :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *परमपिता परमात्मा द्वारा सृजित सृष्टि सतत परिवर्तनशील एवं चलायमान है | इस सकल सृष्टि में जिस प्रकार सब कुछ परिवर्तनशील है उसी प्रकार मानव जीवन में पल पल परिदृश्य भी परिवर्तित होते रहते हैं | जीवन विविध घटनाओं की एक अनवरत श्रृंखला है | इन्हीं से संसार निरंतर चलायमान प्र



आत्मा की चार स्थितियाँ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *ईश्वर ने सर्वप्रथम जड़ शरीर का सृजन किया फिर उसमें आत्मारूपी चेतनाशक्ति प्रकट की | देखना , सुनना , अनुभव करना , विचार करना , निर्णय करना आदि सभी कार्य चेतनाशक्ति के कारण होते हैं | चेतना के अभाव में यह जड़ शरीर कुछ भी नहीं कर सकता | यह चेतनशक्ति तीन अवस्थाओं में रहती



सुखी कौन ? दुखी कौन ?? :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य जब इस धरा धाम पर जन्म लेता है तो उसके जन्म से लेकर की मृत्यु पर्यंत पूरे जीवन काल में सुख एवं दुख समय समय पर आते जाते रहते हैं | प्रायः विद्वानों ने अपनी टीकाओं में यह लिखा है कि जब मनुष्य के विपरीत कोई कार्य होता है तब वह दुखी हो जाता है , और जब अपने अनुकूल सारे कार्य होते रहते हैं तब वह सु



आंतरिक रिक्तता

*आदिकाल के मनुष्यों ने अपने ज्ञान , वीरता एवं साहस से अनेकों ऐसे कार्य किए हैं जिनका लाभ आज तक मानव समाज ले रहा है | पूर्वकाल के मनुष्यों ने आध्यात्मिक , वैज्ञानिक , भौतिक एवं पारलौकिक ऐसे - ऐसे दिव्य कृत्य किए हैं जिनको आज पढ़ कर या सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है परंतु कभी मनुष्य इस पर विचार नहीं करत



कर्म प्रधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई इस महान श्रृष्टि में सबसे प्रमुखता कर्मों को दी गई है | चराचर जगत में जड़ , चेतन , जलचर , थलचर , नभचर या चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने वाला कोई भी जीवमात्र हो | सबको अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है | ईश्वर समदर्शी है , ईश्वर की न्यायशीलता प्रसिद्ध है | ईश्वर का न्याय सिद्



कहाँ मिले परमात्मा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में अनेकों देवी - देवताओं का वर्णन मिलता है , इसके अतिरिक्त यक्ष , किन्नर , गंधर्व आदि सनातन धर्म की ही एक शाखा हैं | इन देवी - देवताओं में किस को श्रेष्ठ माना जाए इसको विचार करके मनुष्य कभी-कभी भ्रम में पड़ जाता है | जबकि सत्य यह है कि किसी भी देवी - देवता को मानने के पहले प्रत्येक



जीवन यात्रा

जीवन यात्रा कदम कदम, जिन्दगी बढ़ती रहती, आगे की ओर;बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापे की ओर।. . . . जवानी से बुढ़ापे की ओर।। जीवन में आते हैं, कुछ ऐसे क्षण;शादी, सेवनिवृत्ती हैं, कुछ ऐसे ही क्षण। जब बदल जाती है जिंदगी, एकदम से;. . . . एकदम से;सिर्फ एक कदम च



स्वाध्याय :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में सामाजिकता , भौतिकता एवं वैज्ञानिकता के विषय में अध्ययन करना जितना महत्वपूर्ण है , उससे कहीं महत्वपूर्ण है स्वाध्याय करना | नियमित स्वाध्याय जीवन की दिशा एवं दशा निर्धारित करते हुए मनुष्य को सद्मार्ग पर अग्रसारित करता है | स्वाध्याय का अर्थ है :- स्वयं के द्वारा स्वयं का अध्ययन | प्राय



जीवनपथ :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह संसार इतनी विचित्रताओं से भरा है , इसमें इतना रहस्य व्याप्त है कि इसे जानने - समझने को प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक एवं लालायित रहता है | संसार की बात यदि छोड़ दिया तो हमारा सनातन धर्म एवं मानव जीवन अनेकानेक रहस्यों का पर्याय है | जिसे जानने की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को होती है और होनी भी चाहिए | व्य



सनातन वैज्ञानिकता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे देश भारत की संस्कृति सनातन से आध्यात्मिक रही है | यहाँ के लोगों में जन्म से ही अध्यात्म भरा होता है | भारत अपने अध्यात्म और ऋषियों की वैज्ञानिकता के कारण ही विश्वगुरू बना है | आज जैसे किसी नये प्रयोग के लिए सारा विश्व अमेरिका एवं चीन की ओर देखता है | वैसे ही पूर्व में भारत की स्थिति थी | हम भ



वैराग्य :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में सब का अंत निश्चित है ! चाहे वह जीवन हो या जीवन में होने वाली अनुभूतियां ! मानव जीवन भर एक हिरण की तरह कुछ ढूंढा करता है | हर जगह मानव को आनंद की ही खोज रहती है चाहे वह भोजन करता हो, या भजन करता , हो कथा श्रवण करता हो सब का एक ही उद्देश्य होता है आनंद की प्राप्ति करना | आनंद भी कई प्रक



भक्ति एवं मोक्ष :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म मानव शरीर को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताते हुए परम पूज्य बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं :---- "साधन धाम मोक्ष कर द्वारा ! पाई न जे परलोक संवारा !!" अर्थात :- यह मानव शरीर साधना करने का धाम और मोक्ष प्राप्ति का द्वार है , इस मानव शरीर में आकर के जीव यह द्वार खोल सकता है , और इसी मान



पूजा कैसे करें ;----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन हिन्दू धर्म में पूजा - पाठ का विशेष महत्व है | पूजा कोई साधारण कृत्य नहीं है | यदि आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखा जाय तो पूजा करने का अर्थ है स्वयं को परिमार्जित करना | पूजा में सहयोग करने वाली सामग्रियों पर यदि ध्यान दिया जाय तो उनकी अलौकिकता परिलक्षित हो जाती है | किसी भी पूजन में आसन का वि



आत्मविश्वास :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सकल सृष्टि में चौरासी लाख योनियों का विवरण मिलता है | जिसमें सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कही गई है | परमपिता परमात्मा ने मनुष्य शरीर देकरके हमारे ऊपर जो उपकार किया है इसकी तुलना नहीं की जा सकती है | मानव जीवन पाकर के यदि मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास न हो तो यह जीवन व्यर्थ ही समझना चाहिए | क्योंकि मानव



संभवना

इससे फर्क नहीं पड़ता,तुम कितना खाते हो?फर्क इससे भी नहीं पड़ता,कि कितना कमाते हो?फर्क इससे भी नहीं पड़ता, कि कितना कमाया है?फर्क इससे भी नहीं पड़ता,कि क्या क्या गंवाया है?दबाया है कितनों को,कुछ पाने के लिए.जलाया है कितनों को,पहचान बनाने के लिए.फर्क इससे नहीं पड़ता,कि दूजों को



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