वैराग्य शतकम् - भाग - चार :- आचार्य अर्जुन तिवारी

🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️ *‼️ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼️* 🚩 *सनातन परिवार* 🚩 *की प्रस्तुति* 🌼 *वैराग्य शतकम्* 🌼 🌹 *भाग - चौथा* 🌹🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧*खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदा



कोल्ड ड्रिंक्स से बचें :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में सबसे बड़ा धन शरीर को माना गया है | जिस प्रकार बिना आकार के निराकार कहा जाता है उसी प्रकार जब मनुष्य का शरीर रूपी धन नष्ट हो जाता है तो उसके लिए निधन शब्द का प्रयोग किया जाता है | धर्म की अनेक कठिन साधनाओं को साधने के लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है इसीलिए लिखा गया है :- "शरीर



वैराग्य शतकम् - भाग - तीन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️ *‼️ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼️* 🚩 *सनातन परिवार* 🚩 *की प्रस्तुति* 🌼 *वैराग्य शतकम्* 🌼 🌹 *भाग - तीसरा* 🌹🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧🎈💧*उत्खातं निधिशंकया क्षितित



अंतर्द्वन्द्व

जीवन यापन के लिए बहुधा व्यक्ति को वो सब कुछ करना पड़ता है , जिसे उसकी आत्मा सही नहीं समझती, सही नहीं मानती । फिर भी भौतिक प्रगति की दौड़ में स्वयं के विरुद्ध अनैतिक कार्य करते हुए आर्थिक प्रगति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयत्न करता है और भौतिक समृद्धि प्राप्त भी कर लेता है ,



प्रकृति रहस्य

🕉️🕉️🕉️🐚सृष्टि-रहस्य🐚🕉️🕉️🕉️नश्वर जगत् है- धारणा भ्रामक- त्रुटिपुर्ण हैब्रह्म सत्य है एवम् जगत् सापेक्षित सत्य हैवस्तु का रूप रंग आकार बदल सकता हैतरंग का खेल सारा नष्ट नहीं हो सकता हैमहाविध्वंस धातक सस्त्रादि बन सकते हैंमहल ढह मिट्टी का मलवा बन सकते हैंपंचतत्व का ये तन जल राख बन जाता हैसृ



जीवन मरण के बीच के समय का सदुपयोग :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाई गई है सृष्टि बहुत ही रहस्य पूर्ण है | यहां पग पग पर रहस्य भरे पड़े हैं जिनको सुलझाने में मानव जीवन भी कम पड़ जाता है | जीवन एवं मरण का रहस्य अपने आप में अद्भुत रहस्य है | बड़े बड़े ज्ञानी विद्वान इस रहस्य को नहीं समझ पाते हैं और जो इस रहस्य को समझ गया वही परम ज्ञानी कहा जाता है |



ज्ञान को जीवन में उतारें

*इस सृष्टि में अनेकानेक जीवों के मध्य सर्वोच्च है मानव जीवन | जीवन को उच्च शिखर तक ले जाना प्रत्येक मनुष्य का जीवन उद्देश्य होना चाहिए ` किसी भी दिशा में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है चाहे वह सांसारिक पहलू हो या आध्यात्मिक , क्योंकि शिक्षकों एवं गुरुजनों का मार्गदर्शन तथा



धूप छाँव और प्रभु कृपा

■□■धूप छाँव और प्रभु कृपा■□■☆★☆★☆★☆★☆धूप का प्रचण्ड तापदेह जला भी सकती है।भादो मास में धूप दिख आह्लादित करती है।।छाया तले आ पथिक को शितलता मिलती है।छाया पड़ती दुख की तो ये आँखें झड़ती हैं।।प्रभूवर! कई भक्त तुम्हें पाने हेतु लालायित रहते हैं।जप-तप-कीर्तन और सारी रात जागरण करते हैं।।योगी बन 'विहंगमयोग'



साधना का मर्म

*जीव इस संसार में अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ जब मानव योनि प्राप्त करता है तो उसका परम लक्ष्य होता है मोक्ष प्राप्त करना अर्थात आवागमन से छुटकारा प्राप्त करना | आवागमन छुटकारा पाने के लिए हमारे धर्म ग्रंथों में अनेक अनेक उपाय बताये गये हैं | जप - तप , साधना , उपासना आदि अनेकों प्रकार के साधन य



जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर



तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……

तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……आए दिन हमें लोंगों की शिकायतें सुनने को मिलती है….... लोग प्रायः दुःखी होते हैं। वे उन चीजों के लिए दुःखी होते हैं जो कभी उनकी थी ही नहीं या यूँ कहें कि जिस पर उसका अधिकार नहीं है, जो उसके वश में नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मनुष्य की आवश्यकतायें असीम हैं….… क्योंकि



क्या मृत्यु से डरना चाहिए……?

क्या मृत्यु से डरना चाहिए……?अगर हम बात मृत्यु की करते हैं तो अनायास आँखों के सामने किसी देखे हुए मृतक व्यक्ति के शव का चित्र उभरकर आ जाता है। मन भी न चाहते हुए शोकाकुल हो उठता है। आखिर ऐसी मनस्थिति के पीछे क्या वजह हो सकती है…? जबकि आज के परिवेश में घर के अंदर भी हमें दिन में ही ऐसी लाशों को देखने क



क्या कहेंगें आप...?

क्या कहेंगें आप...?हम सभी जानते हैं कि प्रकृति परिवर्तनशील है। अनिश्चितता ही निश्चित, अटल सत्य और शाश्वत है बाकी सब मिथ्या है। बिल्कुल सच है, हमें यही बताया जाता है हमनें आजतक यही सीखा है। तो मानव जीवन का परिवर्तनशील होना सहज और लाज़मी है। जीवन प्रकृति से अछूता कैसे रह सकता है…? जीवन भी परिवर्तनशील ह



मानव जीवन क्या है...

जीवन क्या है..? या मृत्यु क्या है..? क्या कभी आपने इसे समझने की चेष्टा की है..? नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ी। मनुष्य ऐसा ही है.. तो क्या सोच गलत है...जी बिल्कुल नहीं, ये तो मनुष्यगत स्वभाव है। जरा उनके बारे में सोचिए जिन्होंने हमें ज्ञान की बाते



गुरु वन्दना

मेरे समस्त स्नेही पाठकवृन्द को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं --- तुम कृपासिन्धु विशाल , गुरुवर ! मैं अज्ञानी , मूढ़ , वाचाल गुरूवर ! पाकर आत्मज्ञान बिसराया .छल गयी मुझको जग की माया ;मिथ्यासक्ति में डूब -डूब हुआ अंतर्मन बेहाल , गुरुवर ! तुम्हारी कृपा का अवलंबन , पाया अ



अर्ध रात्रि

🌹🌹🌹🌺मध्य रात्रि 🌺🌹🌹🌹 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺प्रचण्ड एषणा हृदय में, मन मैंने बनाया है।एक विराट शुभ विचार मन में समाहृत है।।भव्य स्वर्णिम मण्डप स्वप्न में हटात् आ दिखता है।विशाल स्तंभ केन्द्र में- बहुआयामिय आलोकित है।।भिन्न-भिन्न अद्भुत आकृतियाँ यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हैं।।सदाशिव महादेव-त्रिनेत



हमारा शरीर एवं ब्रह्मांड :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के सद्ग्रन्थों एवं ऋषि - महर्षियों के विचारों में एक तथ्य एवं दिशा निर्देश प्रमुखता से प्राप्त होता रहा है कि मनुष्य जीवन पाकर के सबसे पहले मनुष्य को स्वयं के विषय में जानने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं जान पाएगा तब तक वह ब्रह्मांड को जानने का कितना भी प्रया



देवाधिदेव

★★★★★देवाधिदेव ★★★★★"परम पुरुष" के बाहर कुछ भी नहीं।वे हीं देव हैं जो ब्रह्माण्डीय कार्यकीके कारण हैं। ब्रह्म रंध्र वा विश्व नाभिसे उत्सर्जित अभिव्यक्त महापँचभूत तरंगें हीं देवता हैं जो देव स्वरूपपरम पुरुष की सृष्टि नियंत्रित करते हैं।यहीं महाशक्ति ब्रह्माण्ड के अनवरतताण्डव का कारण है जिसक



गणपति बप्पा मोरिया

कथा गणपति बप्पा मोरिया की🕉️ 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️गणपति-बप्पा-मोरिया की प्रतिमायें सुशोभित हैं।गणेश कथा सुन, भक्त आह्लादित प्रफुल्लित हैं।।आएं आज- 'पंद्रह हजार वर्ष' पुर्व हम चलते हैं।पर्वतों पर बसे ऋषियों की चर्चा आज करते हैं।।"ऋषि कुल" को ऋग्वेद में "गोष्ठी" कहा करते थे।'"गोष्ठी" के श्रेष्टतम्



मन का निग्रह :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य सभी प्राणियों पर आधिपत्य करने वाला महाराजा है , और मनुष्य पर आधिपत्य करता है उसका मन क्योंकि मन हमारी इंद्रियों का राजा है | उसी के आदेश को इंद्रियां मानती हैं , आंखें रूप-अरूप को देखती हैं | वे मन को बताती हैं और मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करने लगता है | कहने का आशय यह है कि समस



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