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अंधकार में रहने का मैं अभ्यासी हूँ

अंधकार में रहने का मैं अभ्यासी हूँ✒️अंधकार में रहने का मैं अभ्यासी हूँमुझे उजालों से भी नफ़रत कभी नहीं थी,सबकी चाह दिखावे तक ही सिमट चुकी थीमुझे जलाने वालों की भी कमी नहीं थी।एक प्रहर में जलकर कांति बिखेरी मैंनेऔर दूसरे वक्त तृषित हो मुरझाया था,अंतकाल में देहतुल्य जल गयी वर्तिकालौ को अपने अंतस में



अंधकार

अँधेरे में नहीं बल्कि अँधेरे से लड़ेअन्धकार से लड़ना और अंधकार में लड़ना दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है. आज लोग अँधेरे से नहीं बल्कि अँधेरे में लड़ रहे है. आफ़ताब की रोशनी और चाँद की चाँदनी भी इस अंधकार को खत





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