भाषा

सादर नमस्कार , न जाने क्योंमेरे ह्रदय में यह सोचकर पीड़ा होती है कि कि आज कल क्यों हम भारतीय अपनी मात्र भाषा को भूलते जा रहे हैं| क्यों हम केवल और केवल अंग्रेजी पर ध्यान दे रहे हैं हम यह



कविता

बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा पैगाम. खून के प्यासे घूम रहे शठ धरती के आवाम. -----------टुकड़ों में बँट जगह-जगह पर लोग लगाते नारा. -----------अगुवा उसी को चुनते सब जो होता ठग हत्यारा. किसी को कुछ भी कहते निर्भय मुँह में नहीं लगाम. बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा





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