बातें कुछ अनकही सी...........: अवसाद

"अवसाद" एक ऐसा शब्द जिससे हम सब वाकिफ़ हैं।बस वाकिफ़ नहीं है तो उसके होने से।एक बच्चा जब अपनी माँ-बाप की इच्छाओं के तले दबता है तो न ही इच्छाएँ रह जाती हैं ना ही बचपना।क्योंकि बचपना दुबक जाता है इन बड़ी मंज़िलों के भार तले जो उसे कुछ खास रास नहीं आते।मंज़िल उसे भी पसंद है पर र



यादें

"बहुत खूबसूरत होती है ये यादों की दुनियाँ , हमारे बीते हुये कल के छोटे छोटे टुकड़े हमारी यादों में हमेशा महफूज रहते हैं,



तीर्थ राज प्रयाग राज में महापर्व अर्द्ध कुम्भ स्नान

तीर्थ राज प्रयाग राज में महा पर्व अर्द्ध कुम्भ स्नान डॉ शोभा भारद्वाज पुराणों में वर्णित पोराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं एवं दानवों ने मिल के समुद्र मंथन किया था तय था समुद्र मंथन से जो रत्न निकलेंगे दोनों पक्ष मिल कर बाँट लेंगे मन्दराचल पर्वत को मथनी बनाया भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार धारण कर समुद्र



बचपन बनाम बुढ़ापा।

बचपन बनामबुढ़ापा। नर्म हथेलीमुलायम होठ, सिरमुलायम काया छोट।बिन मांगेहोत मुरादे पूर,ध्यान धरे माता गोदी भरे।पहन निरालेकपड़े पापा संग, गाँवघूम कर बाबा-दादी तंग।खेल कूद बड़ेभये, भाई बहनो केसंग। हस खेल जवानी, बीत गईं बीबी के संग। ये दिन जब, सब बीत गए जीवन के। अंखियन नीरबहे, एक आस की खातिर।कठोर हथेलीसूखे हो



एक साल की उम्र में बाप ने थमा दिया सिगार, 2 साल की उम्र तक बच्चा पीने लगा दिन की 40 सिगरेट, छोड़ने के लिए जो हुआ उसपर नहीं कर पाएंगे यकीन

बचपन खेलने कूदने की उम्र होती है। चाहे बच्चा कितना भी छोटा हो लेकिन उसे उसके मन की करने से नहीं रोकना चाहिए ? क्या ये सवाल सही है। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है कि बच्चे को हमेशा अपने मन की करने देना चाहिए? अगर हां तो ये पूरा आर्टिकल जरूर पढ़े…2 साल का बच्चा पीता है दिन की 40 सिगरेट आज हम आपको एक ऐसे ब



धुप

दौड़ भागकर सारा दिन थकी उचक्की धुपआँगन में आ पसर गई कच्ची पक्की धुप सारा दिन ना काम किया रही बजती झांझ लेने दिन भर का हिसाब आती होगी साँझ याद दिलाया तो रह गई हक्की-बक्की धुपआँगन में आ, पसर गई कच्ची पक्की धुप अम्मा ले के आ गई पापड़, बड़ी, अचार ले ना आये खिचड़ी, समझ के



बचपन के दिन

कल याद आ गया मुझको भी अपना बचपनखुश हुई बहुत पर आँख तनिक सी भर आयीगांवों की पगडण्डी पर दिन भर दौड़ा करतीकुछ बच्चों की दीदी थी, दादी की थी राजदुलारीरोज़ सुनती छत पर दादाजी से



खिलखिलाता रहे खड़गपुर...

ढाक भी वही सौगात भी वहीपर वो बात कहां जो बचपन में थीठेले भी वही , मेले भी वहीमगर वो बात कहां जो बचपन में थीऊंचे से और ऊंचे तोभव्य से और भव्य होते गएमां दुर्गा के पूजा पंडाललेकिन परिक्रमा में वो बात कहां जो बचपन में थीहर कदम पर सजा है बाजारमगर वो रौनक कहां जो बचपन में थी।नए कपड़े तो हैं अब भी मगर पहन



वो भी क्या दिन थे.......

वो भी क्या दिन थे ....बचपन के वो दिनअसल जिंदगी जिया करते थे कल की चिंता छोड़ आज में जिया करते थे ईर्ष्या,द्वेष से परे,पाक दिल तितली की मानिंद उड़ते ना हाथ खर्च की चिंता,ना भविष्य के सपने बुनते हंसी ख़ुशी में गुजरे दिन ,धरती पर पैर ना टिकते छोटे छोटे गम थे,छोटी छोटी



अंतर इच्छा

लेने को तो मैं ले लेता, बदला बदलने वालों सेl फिर सोचा क्यों उनको सोचूँ, जिनको मेरी परवाह नहीं थी ll करने को तो मैं कर देता, विद्रोह सभी खिलौनों सेl पर बचपन को सूना कर दूँ, ऐसी कोई चाह नहीं थी ll



अंतर इच्छा

लेने को तो मैं ले लेता, बदला बदलने वालों सेl फिर सोचा क्यों उनको सोचूँ, जिनको मेरी परवाह नहीं थी ll करने को तो मैं कर देता, विद्रोह सभी खिलौनों सेl पर बचपन को सूना कर दूँ, ऐसी कोई चाह नहीं थी ll



बचपन एक प्ले स्कूल

हमारेबचपन में आज की तरह प्ले-स्कूल नहीं होता था। बस एक ही प्ले-स्कूल थाजो किताबी ज्ञान पर आधारित न हो, व्यवहारिकज्ञान व् प्रकृति करीब से जुड़ा था । प्लेस्कूल के लिए पांच-छह बरस तक हम अपने फार्म हाउस ( खेत खलियान) में घूमना, गन्ने



मासूम बचपन और हैवानियत का दंश

मासूमों पर वहशियों की नजर क्या पडी. बचपन बर्बाद हो गया. इंसानियत शर्मसार हुई तो संस्कारों पर भी सवाल खड़े हो गए. बाल उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़े यह सोचने पर बाध्य करते हैं कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति में कहां चूक हो गई कि भगवान स्वरूप बच्चे ही हैवानों का शिकार होने लगे. कभी अपनों की तो कभी गैरों क



लघुकथा मेरे बचपन के प्रिय मित्रसुबह का राम राम और सझौंती के सलाम

यहाँ कुशल वहाँ जगमाहीं मेरा पत्र मिला की नाहीं। जवाबी पत्र का इंतजार करते-करते आँखें पथरा गई, पोस्ट ऑफिस का डाकियाँ भी बदल गया लगता है। पुछनेपर नाराज हो जाता है, कहता है कि खुद लिखकर लाऊँ क्या? रोज-रोज आकर दरवाजे पर खड़े रहते हो, पत्र आया क्या? पत्र आया क्या?। यहाँ मनीआर्ड



बचपन की स्मृतियों

मामूली हैं मगर बहुत खास है...बचपन से जुड़ी वे यादेंवो छिप छिप कर फिल्मों के पोस्टर देखनामगर मोहल्ले के किसी भी बड़े को देखते ही भाग निकलनासिनेमा के टिकट बेचने वालों का वह कोलाहलऔर कड़ी मशक्कत से हासिल टिकट लेकरकिसी विजेता की तरह पहली पंक्ति में बैठ कर फिल्में देखनाबचपन की भीषण गर्मियों में शाम होने



बदलता बचपन

हाल में 1 दिन के लिए गांव गया था,क्योंकि घूप अपने चरम पर थी इसलिए कहीं ना जाकर घर के बाहर ही बच्चों के साथ मस्ती कर रहा था और मन ही मन अपने बचपन और इनके बचपन की तुलना भी कर रहा था, मुझे जहाँ तक अपना बचपन याद है- गर्मी के माह में एक्जुन्नी( 12 बजे तक) विद्यालय हो जाया करता



मैं कहाँ खो गया?????

कच्ची उम्र हैं,कच्चा हैं रास्ता,पर, पक्की हैं दोस्ती,पक्के हैं हम,उम्मीदों,सपनों का कारवां लेकर चलते,खुद पर भरोसा कर,कदम आगे बढाते,चुनौतियाँ बहुत हैं,ख्वाब हैं लम्बे,पर, जन्मभूमी ही हमारी पाठशाला होती,धरती की नींव में अपनी रूढ़ जमाए,दिन-रत समय की चक्की में पिसते,सुकोमल-सा पुष्पों जैसा मेरा जीवन......



आओ बचपन ख़ुद में ढूँढें

आओ बचपन खुद में ढूंढेंसुबह की ठंडी हवा निरालीधूप खिली है मतवाली।नन्हें-नन्हें पांव से गिर करउठने के सपने बुन लें।।आओ बचपन खुद में ढूंढें।......2वो आंगनवाड़ी में जा-जा कर क, ख, ग, घ, ङ पढ़नाए, बी,सी,डी के चक्कर मे सिस्टर जी की डांट भी सुनना।पट्टी पर खड़िया से लिख कर थोड़ी यादें ताजा कर लें।।आओ बचपन खुद



जिंदगी: बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम

जिंदगी भी क्या है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम, पहले अपने पैरों पर चलने की जल्दी में घुटने छिलवाए. किसी तरह चलना शुरू किया तो घर की चौखट लांघने की जल्दी. थोड़ा आगे बढ़े तो स्कूल में एडमिशन की भाग-दौड शुरू. ले देकर मम्मी डैडी ने एडमिशन करा दिया तो क्लास में आगे निकलने



लेख-- खेल के मैदानों से दूर होता बचपन

देश में तीव्र गति से बच्चों का झुकाव आक्रमक रवैये और अन्य असामाजिक कार्यों में लग रहा है। जिसका अहम कारण बच्चों की खेलों के प्रति बढ़ती दूरी भी है। आज के समाज में बच्चा जहां घर में माता-पिता की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन का एहसास करता है, वहीं खेलों से बढ़ती दूरी उसके मानसिकता के विकास को भी अवरुद



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