बदलाव

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आइये कुछ बदलें

आइये कुछ बदलें. जी हाँ, मेरा देशकुछ बदल गया है; कुछ बदल रहा है; और बहुत कुछ बदलेगा.ये आप सभी को हीनहीं, विदेशियों को भी दिखाई दे रहा है. इसलिए इस के उदाहरणों देने की आवश्यकतानहीं है. यदि किसी को नहीं दिखाई देता है तो हम उसका दृष्टि नहीं दे सकते.क्या मैं और आप इसबदलाव को केवल देखते ही रहेंगे (और/या आ



लड़कियों में 16 वर्ष की उम्र में होने वाले अहम बदलाव

जैसा कि हम सभी जानते है कि बदलते समय के साथ ही सभी लोगों में शारीरिक परिवर्तन देखने को मिलते है जब कोई लड़का या लड़की 16 साल के उम्र के पड़ाव को पार कर लेते है तो उनके शरीर और सोच में काफी सारे बदलाव होने लगते है। बात जब लड़कियों की होती है तो उनमें इस सिलसिले की शुरुआत 14 वर्ष की उम्र के साथ ही नजर



डिजिटल इंडिया की वजह से छात्रों को कैसे लाभ मिलेगा | TutStu

Digital India - is a “Social Change” which involvestransforming the mind-set of its Citizen. After observing modernisation in all aspects of ordinarylife, we can still sense th



दृश्य नहीं.... दृष्टि बदलो

भागदौड़ भरे जीवन मे अनेक बार ऐसे अवसर अवश्य आते है, जब व्यक्ति स्वयं के व्यक्तित्त्व को न बदलकर, विश्व को बदलने की नाकाम कोशिश करता है । इस विचारधारा वाला छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब या अच्छा-बुरा कोई भी व्यक्ति हो सकता है । यहाँ तक कि, अनेक बार दृढ़-निश्चयी और अच्छा व्यक्ति भी अपने व्यक्तित्त्व को नहीं बदल प



सभी यांत्रिक और अवैध बूचड़खाना बंद होंगे।

सभी पाठको का हार्दिक अभिनंदन,बीते दिनों कुछ राजनैतिक बदलाव हुए। एक मुद्दा बहुत चर्चा ने है "सभी यांत्रिक और अवैध बूचड़खाना बंद होंगे।" सुनने में अच्छा लगता है कुछ नहीं से तो कुछ सही। मेरे मन में एक सवाल है :



भावी आथित्य संस्कारो की झलकियां

भावी आथित्य संस्कारो की झलकियां ………………परिवर्तन के इस दौर मेंभविष्य का चित्र कुछ ऐसे उभर कर आयेगा !नैतिक मूल्यों के संग संगसंस्कारो का समस्त स्वरुप ही बदल जाएगा !सर्वप्रथम आथित्य सत्कार में,जो आगंतुक को विधिवत लुभायेगा !वही सुधि जन सर्वगुण संपन्न,सस्कारी जमात का गुरु कहलायेगा !!प्रथम काज अतिथि प्रणाम



कौन बिगाड़ रहा है समाज ?

शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब अखबार और न्यूज़ चैनलों में दुष्कर्म या छेड़खानी की कोई घटना न हो !आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है ? दिल्ली के उस आंदोलन के बाद भी ये घटनाये रुक क्यूँ नही रही है? आखिर समाज कहाँ जा रहा है?कहीं ये वो तथाकथित विनाश की शुरुआत तो नहीं है जिसका जिक्र माया सभ्यता में क



गजल- आशा

सोख लूंगा धूप को ,मैं छाँव देकर जाऊंगा ,ज़ुल्म के सीने पे गहरा,घाव देकर जाऊंगा ।रास्ते कदमों में होंगे ,ठोकरों में मंजिलें ,हौसलों के पंख मन को पाँव देकर जाऊंगा ।शर्तीयां उस ज़ख्म की, नासूरीयत को रोक दूंगा, काबिले मरहम ,इलाज-ए -दाव ,देकर जाऊंगा ।जो धुआं और धुंध में ,गम हो गए वो आशियाने ,गुमशुदा उन ब



27 जनवरी 2015

कौन बिगाड़ रहा है समाज ?

शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब अखबार और न्यूज़ चैनलों में दुष्कर्म या छेड़खानी की कोई घटना न हो !आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है ? दिल्ली के उस आंदोलन के बाद भी ये घटनाये रुक क्यूँ नही रही है? आखिर समाज कहाँ जा रहा है?कहीं ये वो तथाकथित विनाश की शुरुआत तो नहीं है जिसका जिक्र माया सभ्यता में क





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