भैया

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"पद" भैया चंद्रयान ले आओ

"पद"भैया चंद्रयान ले आओमैं हूँ चंद्रमा घटता बढ़ता, आकर के मिल जाओउड़नखटोला ज्ञान भारती, ला झंडा फहराओइंतजार है बहुत दिनों से, इसरो दरस दिखाओलेकर आना सीवन साथी, आ परचम लहराओराह तुम्हारी देख रहीं हूँ, मम आँगन इतराओस्वागत करती हूँ भारत का, ऋषिवत ज्ञान खिलाओबड़े जतन से राखूंगी मैं, अपनी चाल बढ़ाओकहती रहती द



@झिनकू भैया के प्रपंची आँसू"

"झिनकू भैया के प्रपंची आँसू" एक आँख से विनाशक बाढ़ व दूसरी आँख से फसलों को सुखाने वाला हृदय विदारक सूखा देखकर झिनकू भैया की आँखे पसीजने लगी जो चौतरफा दृश्य परिवर्तन के तांडव को देखकर छल-छल बहने की आदी तो हो ही गई है, अब तो उसे जीना और पीना भी है। बड़े ही भावुक और चिंतनशील आदमी हैं झिनकू भैया, जब धारा



"झिनकू भैया का झुनझुना” (घुनघुना)

"झिनकू भैया का झुनझुना” (घुनघुना) झिनकू भैया को बचपन से ही झुनझुना बहुत पसंद था, जो आज भी किसी न किसी रूप में बज ही उठता है। कभी महँगाई की धुन पर झनझना जाता है तो कभी भ्रष्टाचार, आतंकवाद, बेरोजगारी, भूखमरी, बलात्कार इत्यादि पर आफरीन हो जाता है झिनकू भैया का घुनघुना। बजा



"देशज गीत, मोरे ननदी के भैया

"देशज गीत" जेठ दुपहरिया छँहाइ ल, मोरे ननदी के भैया...... ननदी के भैया मोरे ननदी के भैया......जेठ दुपहरिया मनाई ल,.....मोरे ननदी के भैया.... ननदी के भैया मोरे सासू के छैया जेठ जेठानी के नटखट बलैया पसिजल पसीना सुखाइ ल,........ मोरे ननदी के भैया........1 दूर हुए मोसे मा



"घंटी बजा दी, झिनकू भैया ने"

"घंटी बजा दी, झिनकू भैया ने" आज सुबह- सुबह मेरे प्रिय झिनकू भैया का गाँव से फ़ोन आया, स्क्रीन पर उनका नाम उभरा और मेरी बांछे खिल गई। बड़े उत्सुकता से बटन दबाया' पर हाय रे चश्में का नंबर और बिना चश्में की आँख, गलत जगह टच हो गया और फोन की घंटी नौजौवना की तरह गुस्सा होकर झनझन





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