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नारायणी

स्वीकृति / अस्वीकृति के बीचकेवलएक 'अ' का नहीं,अपितुअसमान विचार-धाराओं का,सोच का,भावनाओं का गहन अंतर होता है। इन दोनों के बीच,पैंडुलम सा झूलता मनव्यक्तिगत संस्कारोंऔर धारणाओं के आधार पर हीनिजी फ़ैसले करता है। आज,भ्रमित-मानसिकता के कारणभयमिष्रित ऊहापोह में भटकते हुएहमभ्र



‘कन्याभ्रूण’ आखिर ये हत्याएँ क्यों?

बेटा वंश की बेल को आगे बढ़ाएगा,मेरा अंतिम संस्कार कर बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा| यहाँ तक की मृत्यु उपरान्त मेरा श्राद्ध करेगा जिससे मुझे शांति और मोक्ष की प्राप्ति होगी और बेटी, बेटी तो क्या है पराया कूड़ा है जिसे पालते पोसते रहो उसके दहेज की व्यवस्था के लिए अपने को खपाते रहो और अंत में मिलता क्या है



माँ...

माँ...मत मारो मुझे मेरी माँमैं टुकड़ा तुम्हारा ही माँ ।मत मारो मुझे मेरी माँ ।खता क्या हमारी हमें भी बताओजीवन हमारा माँ यूँ न मिटाओ ,मैं साया हूँ तेरा ही माँमत मारो मुझे मेरी माँ ।तू भी कभी थी हमारी तरहमैं हूँ मेरी माँ तुम्हारी तरह ,मैं पूरे करुँगी तेरे ख़्वाब





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