भूख

भूख जब हद से ज्यादा बढ़ जाए, देखती नहीं है रोटी बेईमानी की है या ईमानदारी की, ये कम्बख्त भूख चीज़ ही ऐसी है जो मिटती ही नहीं है, रोज़ दर रोज़ बढ़ती जाती है. (आलिम)



भूख ?

भूख ? डॉ शोभा भारद्वाज भारत विकास शील देश है, राजधानी दिल्ली में चर्चा है तीन बच्चियाँ मर गयी पोस्ट मार्टम करने वाले डाक्टर ने कहा उनके पेट में अन्न का दाना भी नहीं था कुपोषण की शिकार आभा रहित बच्चियाँ सूख गयीं थी उनके शव देख कर ऐसा लगता था जैसे आठ दिन से कुछ खाया नही



“गीतिका” पेट भूख कब जाति देखती रोटी रगर विकार हरो॥

छंद लावणी मात्रा भार- ३०. (चौपाई १४). १६ ३० पर यति पदांत – आर समान्त- अरो“गीतिका”प्रति मन में भोली श्रद्धा हो ऐसा शुद्ध विचार भरो मानव का कहीं दिल न टूटे कुछ ऐसा व्यवहार करोजगह जगह ममता की गांछें डाली सुंदर फूल खिले समय समय पर इक दूजे को पीड़ाहर उपकार धरो॥ मत कर अब अ



“मुक्तक” माँ जगत की अन्नदाता भूख को भर दीजिये।

“मुक्तक” माँ जगत की अन्नदाता भूख को भर दीजिये। हों सभी के शिर सु-छाया संग यह वर दीजिये। उन्नति के पथ डगर पिछड़े शय शहर का नाम हो- टप टपकती छत जहाँ उस गाँव को दर दीजिये॥-१ माफ कर जननी सुखी सारे सिपाही आप के। बेटियों की हो रहीं कैसी बिदाई माप के। जी रहें अंधेर में बिजली चिढ़ा



भूखे बच्चों को रोटी खिलाने के लिए तंगहाली में कुली बन गया देश का यह नेशनल हॉकी खिलाड़ी

हॉकी के मैदान पर गोल दागने वाले नेशनल खिलाड़ी तारा सिंह का नया पता है अंबाला रेलवे स्टेशन। रेलवे में खेल कोटे से उन्हें मुलाजिम होना था पर वे कुली बनने को मजबूर  नई दिल्लीः अंबाला रेलवे स्टेशन पर अगर कोई नौजवान कुली आपसे मिले और पूछे कि बाबूजी कहां सामान ले चलना है तो जरा उसका नाम जरूर पूछ लीजिएगा।



भूखे को भूख , खाए को खाजा ...

भूखों को भूख सहने की आदत धीरे - धीरे *भूखे को भूख, खाए को खाजा...!!भूखे को भूख सहने की आदत धीरे - धीरे पड़ ही जाती है। वहीं पांत में बैठ  जी भर कर जीमने के बाद स्वादिष्ट मिठाइयों का अपना ही मजा है। शायद सरकारें कुछ ऐसा ही सोचती है। इसीलिए तेल वाले सिरों पर और ज्यादा तेल चुपड़ते जाने का सिलसिला लगाता



वो अँधेरे से उजाला माँग बैठा, बहुत भूखा था निबाला मांग बैठा|

मेरी याद दिल से भुलाओगे  कैसे,गिराकर नज़र से उठाओगे कैसे|सुलगने ना दो ज़िन्दगी को ज्यादा,चिरागों से घर को बचाओगे  कैसे  



योगासन बनाम भूखासन

उसका नाम है रामदीन. वह भी ''योगासन'' करना चाहता है पर अभी वह ''भूख-आसन'' का शिकार है. उसे देख कर यह कविता बनी  -भूखे को रोटी भी दे दो,फिर सिखलाना योग .बड़ा रोग है एक गरीबी, चलो भगाएं रोग.खा-पीकर कुछ अघा गए हैं, अब सेहत की चिंता जो भूखे हैं उन लोगो को कौन यहां पर गिनता। पहले महंगाई से निबटो, भ्रष्टाचा



भुख स्वाद नहीं देखती

पप्पू बुरी तरह घबरा गया था, हड़बड़ी मैं किसी और का आर्डर मिस्टर बवेजा को दे आया था, बवेजा का गुस्सा वो पहले देख चुका था, नमक कम होने पर ही वो कई बार खाना फ़ेंक चुका था, कंपकंपाता वो डाबा मालिक रामलाल के पीछे जाकर खड़ा हो गया, राम लाल ने उसे इसतरह खड़ा देखा तो डाँटते हुए बोला अबे ओये पप्या यहाँ खड़ा-खड़



किसान चिंतित है

किसान चिंतित हैसुशील शर्माकिसान चिंतित है फसल की प्यास से ।किसान चिंतित है टूटते दरकते विश्वास से।किसान चिंतित है पसीने से तर बतर शरीरों से।किसान चिंतित है जहर बुझी तकरीरों से।किसान चिंतित है खाट पर कराहती माँ की खांसी से ।किसान चिंतित है पेड़ पर लटकती अपनी फांसी से।किसान चिंतित है मंडी में लूटते लुट



भूखा बचपन

रोटी की सही कीमत जानता है ,भूख से बिलबिलाता बदहाल बेसहारा बच्चा ,ढूंढ रहा है जो होटल के पास पड़ी झूठन में रोटी के चन्द टुकड़े,जिन्हें खाकर बुझा सके वो अपने उदर की आग को ,जिसकी तपन से झुलस रहा है उसका कोमल, कुपोषित ,कमजोर बदन |झपट पड़ा था जो फैंकी गयी झूठन पर उस कुते से प



भूख प्यास मजबूरी का आलम देखा

भूख प्यास मजबूरी का आलम देखा,जब से होश संभाला केवल ग़म देखा। नहीं मिला ठहराव भटकते क़दमों को,जिसके भी मन में झाँका बेदम देखा। वादों और विवादों की तक़रीर सुनी,जख्मीं होंठों पर सूखा मरहम देखा। बिना किये बरसात बदरिया चली गई, कई मर्तबा ऐसा भी मौसम देखा। सर पे छप्पर नहीं मह्ज नीला अम्बर था,उन आंखों में स्वा



17 दिसम्बर 2015

गरीबी को डर बस भूख का है

बारिश भिगाती रही मगर गरीबी को डर बस भूख का हैगर्मी भी सताती रही मगर गरीबी को डर बस भूख का हैसर्दी कंपकंपाती रही मगर गरीबी को डर बस भूख का हैमौसम से अमीरी ही डरी, गरीबी को डर बस भूख का हैकोई सत्ता में आया,छाया गरीबी को डर बस भूख का हैकिसी ने सिंहासन गवांया गरीबी को डर बस भूख का हैव्यस्त सब सियासी खेल



भूख से मरने वालों का सच नहीं जानते हम

गिरिजा नंद झाहालांकि, इस तथ्य को जानने में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए, लेकिन सामान्य ज्ञान बढ़ाना हो तो इस पर एक नज़र डालने में कोई हजऱ् नहीं है। बहुत बड़ा आंकड़ा नहीं है और इसीलिए इसे याद रखने के लिए बहुत ज़्यादा माथापच्ची भी नहीं करनी होगी। तथ्य यह है कि मौत अब तक का आखिरी सच है और इस सच क



भूख

भूख में होती है कितनी लाचारी,ये दिखाने के लिए एक भिखारी, लॉन की घास खाने लगा,घर की मालकिन में दया जगाने लगा।दया सचमुच जागीमालकिन आई भागी-भागी-क्या करते हो भैया ?भिखारी बोलाभूख लगी है मैया।अपने आपको मरने से बचा रहा हूं, इसलिए घास चबा रहा हूं।मैया ने आवाज़ में मिसरी घोली,और ममतामयी स्वर में बोली— मेर





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