बिखर

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जो बड़ा बना, वह गया।

जो बड़ा बना,वह गया।कली से खिलकर फूल बनकरबिखर गया।कोपलों से खिलकर बन पत्ताबिखर गया।नन्हा सा पौधा बनकर पेड़,वह भी कट गया।गिरी जो बर्फ पहाड़ो कोढकने के लिए वह भी बह गई।जमीन से उठी पार्टी नेआसमान चूमने के कोशिश किया।वह भी सिमट गईं इस जहांमे।गरीबी से उठकर अमीरों कोजानने की कोशिश किया,हो हताश ज़िंदगी से मौत क



"रविवार का सृजन (टूटता परिवार)"

*गुम हो गए संयुक्त परिवार**एक वो दौर था* जब पति, *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर* घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था । पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे । बाऊजी की बातों का.. *”हाँ बाऊजी"* *"जी बाऊजी"*' के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया



"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहे चाहतों के लिए शोर करते रहे

वज़्न--212 212 212 212, अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— करते, (अते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहेचाहतों के लिए शोर करते रहेकारवाँ अपनी मंजिल गया की रुकाकुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।।चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभीकुछ भटकते रहे कु



मेहनत का ईनाम

" मेहनत इतनी ख़ामोशी से करो की सफलता शोर मचा दे | " ये लाइन उन पे बहुत सही लगती हैं जो मेहनत करना जानते है ना की उन पे जो मेहनत न करके v सिर्फ बातें बनाना जानते हैं | हमारे घर काकी आती थी खाना



गजल- आशा

सोख लूंगा धूप को ,मैं छाँव देकर जाऊंगा ,ज़ुल्म के सीने पे गहरा,घाव देकर जाऊंगा ।रास्ते कदमों में होंगे ,ठोकरों में मंजिलें ,हौसलों के पंख मन को पाँव देकर जाऊंगा ।शर्तीयां उस ज़ख्म की, नासूरीयत को रोक दूंगा, काबिले मरहम ,इलाज-ए -दाव ,देकर जाऊंगा ।जो धुआं और धुंध में ,गम हो गए वो आशियाने ,गुमशुदा उन ब





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