बचपन बनाम बुढ़ापा।

बचपन बनामबुढ़ापा। नर्म हथेलीमुलायम होठ, सिरमुलायम काया छोट।बिन मांगेहोत मुरादे पूर,ध्यान धरे माता गोदी भरे।पहन निरालेकपड़े पापा संग, गाँवघूम कर बाबा-दादी तंग।खेल कूद बड़ेभये, भाई बहनो केसंग। हस खेल जवानी, बीत गईं बीबी के संग। ये दिन जब, सब बीत गए जीवन के। अंखियन नीरबहे, एक आस की खातिर।कठोर हथेलीसूखे हो



जिंदगी: बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम

जिंदगी भी क्या है, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भाग-भागम, पहले अपने पैरों पर चलने की जल्दी में घुटने छिलवाए. किसी तरह चलना शुरू किया तो घर की चौखट लांघने की जल्दी. थोड़ा आगे बढ़े तो स्कूल में एडमिशन की भाग-दौड शुरू. ले देकर मम्मी डैडी ने एडमिशन करा दिया तो क्लास में आगे निकलने



बुढ़ापा

अंगों में भरी शिथिलतानज़र कमज़ोर हो गयी ।देह को कसा झुर्रियों नेबालों की स्याह गयी ।ख़ून भी पानी बनकरदूर तक बहने लगा ।जीवन का यह छोरआज अब डसने लगा ।चलते चलते भूल गयाकितनी देर हो गयी ।अंगों में भरी शिथिलतानज़र कमज़ोर हो गयी ।।जिनके लिए दिन रातउम्र भर व्यय किए ।आज उन्होंने ही देखोकितने ज़ुल्मोसितम किए





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