चारपाई

तन्हाई मित्र हैं.

तन्हाई मित्र हैं. झरने की झर्झर,नदियों की ऊफान, पहाड़ की चोटी पर झाड़ मे खिले नन्हेंकोमल-कोमल फूल जो हवाओं से बाते करते। वादियो, घाटियों, समतल मैदानों मे भटकता एक चरवाहा तरह-तरह की आवाज को निकाल अपने आप कोरमाए रखता। कभी ऐसे गाता जैसे उसे कुछ याद आया हो। उस याद मे एक कशिश की आवाज। वहइन समतल वादियों म



सफर

आज मन की हलचलों ने कदमों को चलने न दिया।बहुत सोचा जाऊं या ना जाऊ । घर दूर, अपने आंखों से दूर, मौसम भी मगरूर ठंडी का है।सफर सहर में है। शाम की बातों ने मन को बोझिल कर दिया था।सब हलचलों और बोझिल शाम को समेट अपनी चारपाई पर तकिए के नीचे दबा लिया था। ठंडी की सिहरन





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