"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



"छड़, व्यवस्था और छत"

"छड़, मकान और छत"ठिठुर रहा है देश, ठिठुर रहें हैं खेत, ठंड की चपेट में पशु-पंछी, नदी, तालाब और अब महासागर भी जमने लगे हैं अपने खारे पानी को उछालते हुए, लहरों को समेटते हुए। शायद यही कुदरत की शक्ति है जिसे इंसान मानता तो है पर गाँठता नहीं। आज वह बौना बना हुआ है और काँप रहा है अपनी अकड़ लिए पर झुकने को



रंजिशों के तमाम हल निकले

छोड़ के राहें प्यारी चाहत की,जाने किस रास्ते पे चल निकले,तु गलत, मैं गलत, इन्ही सब में है खबर कितने अपने कल निकले ?लम्हें अनमोल कितने खो बैठें,किमती कितने अपने पल निकले ?इतनी सिद्धत से पाले हैं नफरत,कैसे उल्फ़त का कोई फल निकले,एक मौका दे एक -दूजे को,सब शिकायत की बर्फ गल निकले,ख्वाहिशे तो फन्ना हुई; रो



जहर पीना पड़ा

खुश रहे वो ,इसलिए ये दर्द भी सहना पड़ा,मन न था ,फिर भी मुझे ,उसे अलविदा कहना पड़ा,थी नहीं हसरत कभी जीना पड़े उसके बिना,उसके लिए हर वक़्त ही मरते हुए जीना पड़ा, एक उसके बिन अकेला इस कदर मैं हो गया,हर जख्म तनहा अकेले खुद मुझे सीना पड़ा,उसकी ख्वाहिस थी की मैं जिन्दा रहू,मेरा नाम हो,बस इसलिए ही जिन्दगी का ये





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