फागुनी बहार, छंद मुक्त काव्य

फागुनी बहार"छंदमुक्त काव्य"मटर की फली सीचने की लदी डली सीकोमल मुलायम पंखुड़ी लिएतू रंग लगाती हुई चुलबुली हैफागुन के अबीर सी भली है।।होली की धूल सीगुलाब के फूल सीनयनों में कजरौटा लिएक्या तू ही गाँव की गली हैफागुन के अबीर सी भली है।।चौताल के राग सीजवानी के फाग सीहाथों में रंग पिचकारी लिएहोठों पर मुस्का



छंद मुक्त काव्य

महिला दिवस को समर्पित"छंद मुक्त काव्य"महिला का मनसुंदर मधुवनतिरछी चितवननख-सिख कोमलता फूलों सीसर्वस्व त्याग करने वालीकाँटों के बिच रह मुसुकाएमानो मधुमास फाग गाए।।महिला सप्तरंगी वर्णी हैप्रति रंग खिलाती तरुणी हैगृहस्त नाव वैतरणी हैकल-कल बहती है नदियों सीहर बूँद जतन करने वालीनैनों से सागर छलकाएबिनु पान



छंदमुक्त काव्य

"छंद मुक्त काव्य" मेरे सावन की शीलनमन की कुढ़न गर्मी की तपनमेरे शिशिर की छुवनमधुमास की बहार हो तुम।।जब से सजा है चेहरे पर शेहरातुम ही बहार हो तुम ही संसार होकहो तो हटा दूँ इन फूलों की लड़ियों कोदिखा दूँ वह ढ़का हुआ चाँदमेर जीवन में खिली चाँदनी हो तुम।।मेरी शहनाई की रागिनी होमेरे हवा की आँधी होमेरे सूरज



"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



@छंदमुक्त काव्य"

..!छंदमुक्त काव्य, बदलता मौसम तुम ही हो मेरे बदलते मौसम के गवाहमेरे सावन की सीलनमेरे मन की कुढ़न मेरी गर्मी की तपनमेरे शिशिर की छुवनमधुमास की बहार हो तुम।।तुम ही होे मेरे उम्र की पहचानमेरे चेहरे पर सेहरे की शानतुम ही बहार हो तुम ही संसार होकहो तो हटा दूँ इन फूलों की लड़ियों कोदिखा दूँ वह ढ़का हुआ चाँदम



"छंदमुक्त काव्य" कूप में धूप मौसम का रूप

"छंदमुक्त काव्य"कूप में धूपमौसम का रूप चिलमिलाती सुबहठिठुरती शाम है सिकुड़ते खेत, भटकती नौकरीकर्ज, कुर्सी, माफ़ी एक नया सरजाम हैसिर चढ़े पानी का यह कैसा पैगाम है।।तलाश है बाली कीझुके धान डाली कीसूखता किसान रोजगुजरती हुई शाम है कुर्सी के इर्द गिर्द छाया किसान हैखेत खाद बीज का भ्रामक अंजाम हैसिर चढ़े पानी



"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना। मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।

छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ



मरा जा रहा हूँ

""""" """""मरा जा रहा हूँ (हास्य)""""" """' ************************* प्रिय मुझसे तेरा यूँ मुंह का फुलाना, नखरे दिखाना यूँ रूठ के सो जाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न हँसना तनिक भी न सजना सवरना, न आँखें दिखाना न लड़ना झगड़ना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ तिरछी नजर से न मुझको रिझाना, न कसमों



"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य" जी करता है जाकर जी लू बोल सखी क्या यह विष पी लू

"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य"जी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लूताल तलैया झील विहारकिस्मत का है घर परिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचार व्यविचारहंस ढो रहा अपना भारकैसा- कैसा जग व्यवहारजी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लू।।सूखी खेती डूबे बा



छंद पंचचामर

शिल्प विधान- ज र ज र ज ग, मापनी- 121 212 121 212 121 2 वाचिक मापनी- 12 12 12 12 12 12 12 12."छंद पंचचामर"सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।मतंग मंद मालती सुगंध



"छंद चामर"

छंद - चामर, शिल्प विधान- र ज र ज र, मापनी - 212 121 212 121 212 वाचिक मापनी - 21 21 21 21 21 21 21 2 "चामर छंद"राम- राम बोलिए जुबान मीठ पाइकै।गीत- मीत गाइए सुराज देश लाइकै।।संग- संग नाव के सवार बैठ जाइए।आर- पार सामने किनार देख आइए।।द्वंद बंद हों सभी बहार बाग छाइयै।फूल औ कली हँसें मुखार बिंदु पाइयै।



"छंद वाचिक विमोहा"

छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - 212 212 अथवा - गालगा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा राजभा (अर्थात र र) विशेष : विमोहा 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है, जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 / गागा के स्थान पर दो लघु 11 /लल प्रयोग करने की छूट नहीं होती है। ऐसे छंद को 'वर्



"छंद मुक्तक"

छंद- कीर्ति (वर्णिक) छंद विधान - स स स ग मापनी- 112 112 112 2"आप सभी महानुभावों को पावन विजयादशमी की हार्दिक बधाई""मुक्तक"मुरली बजती मधुमाषा हरि को भजती अभिलाषा रचती कविता अनुराधाछलकें गगरी परिहाषा।।-1घर में छलिया घुस आयायशुदा ममता भरमायागलियाँ खुश हैं गिरधारीबजती मुरली सुख छाया।।-2मथुरा जनमे वनवा



चपैय्या छंद, हे माँ जग जननी, तुम्हरी अवनी, नाम रूप जगदंबा। शक्ति पीठ बावन, अतिशय पावन, नमन करूँ माँ अंबा।।

जय नव दुर्गा ^^ जय - जय माँ आदि शक्ति - छंद, शिल्प विधान, 10, 8, 12 मात्रा पर यति, प्रथम दो यति पर सम तुकांत, व प्रथम द्वितीय चरण का सम तुकांत....... ॐ जय माँ शारदा.......!शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ जगत जननी नवदुर्गा के 51 शक्तिपीठ को नमन करते हुए आप सभी को हार्दिक बधाई, ॐ जय माता दी!"चवपैय



"शक्ति छंद"

छंद शक्ति , (मापनीयुक्त मात्रिक) वर्णिक मापनी, 122 122 122 12, लगाला लगाला लगाला लगा"शक्ति छंद"पुरानी दवा है दिखाती असर। चढ़ाती नशा है पिलाके ज़हर।।कभी प्यार की तो कभी बेख़बर।बुलाती बहारें लड़ाती नज़र॥-1 निशाने लगाती नचाती नज़र। बहाने बनाती घूमाती शहर।। बहुत प्यार इसको मिला है मगरनशे को नशा भर पिलाती उम



“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा



“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)

छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़



“छंद, वाचिक प्रमाणिका” लगा उड़ा लगा उठा पहाड़ का धुआँ उठा

छन्द- वाचिकप्रमाणिका (मापनीयुक्त मात्रिक) वर्णिक मापनी - 12 12 12 12 अथवा - लगा लगा लगालगा, पारंपरिक सूत्र - जभान राजभा लगा (अर्थात जर ल गा) विशेष : प्रमाणिका 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है,जिसमें वर्णों की संख्यानिश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 के स्थान पर दो लघु 11 प्रयोग करने की छूटनहीं होती है। ऐस



“छंद चवपैया " (मात्रिक )जय जय शिवशंकर प्रभु अभ्यांकर नमन करूँ गौरीशा।

शिल्प विधान- कुल मात्रा =३० (१० ८ १२) १० और ८ पर अतिरिक्त तुकान्त “छंद चवपैया " (मात्रिक )जय जय शिवशंकर प्रभु अभ्यांकर नमन करूँ गौरीशा। जय जय बर्फानी बाबा दानी मंशा शिव आशीषा॥प्रतिपल चित लाऊँ तोहीं ध्याऊँ मन लागे कैलाशा। ज्योतिर्लिंग



"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।

"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।घूँघट था अंजान नैन का कोरा आँजन।वाणी बहकी जाय होठ बेचैन हो गए-मिली पास को आस पलंग बिराजे राजन।।-१खूब हुई बरसात छमा छम बूँदा बाँदीछलक गए तालाब लहर बिछा गई चाँदी। सावन झूला मोर झुलाने आए सैंया-



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