छंद ॒ चौपाई

सहज वचन बोली कर जोरी।चञ्चल चितवन चन्द्र चकोरी।मन अनंग रति प्रेम पियासा।भाव विभाव सहज दुर्वासा।चन्द्र योग द्वय लखि विज्ञानी।पूर्वोत्तर साहित्य भवानी।।अकथनीय गुण बरनि न जाई ।शब्द विशेष समय प्रभुताई।अवसर परम पुनीत सुहावन lशब्द विशेष शेष मनभावन llपावन दिवस सुहावन कैसे ?प्रेम सुमित्र चित्र लखि जैसे ।lशंख



रोला छंद

रोला- रोला छंद दोहा का उलटा होता है l विषम चरण में ग्यारह मात्रा एवं सम चरण में तेरह मात्रा के संयोग सेनिर्मित [११+१३=२४ मात्रिक ] लोकप्रिय रोला छंद है l रोला छंद में ११,१३ यति २४ मात्रिक छंद है दो क्रमागत चरण तुकांत होते हैं काव्य रम



अहीर छंद "प्रदूषण"

अहीर छंद "प्रदूषण"बढ़ा प्रदूषण जोर।इसका कहीं न छोर।।संकट ये अति घोर।मचा चतुर्दिक शोर।।यह भीषण वन-आग।हम सब पर यह दाग।।जाओ मानव जाग।छोड़ो भागमभाग।।मनुज दनुज सम होय।मर्यादा वह खोय।।स्वारथ का बन भृत्य।करे असुर सम कृत्य।।जंगल किए विनष्ट।सहता है जग कष्ट।।प्राणी सकल कराह।भरते दारुण आह।।धुआँ घिरा विकराल।ज्यों



आँसू छंद "कल और आज"

आँसू छंद "कल और आज"भारत तू कहलाता था, सोने की चिड़िया जग में।तुझको दे पद जग-गुरु का, सब पड़ते तेरे पग में।तू ज्ञान-ज्योति से अपनी, संपूर्ण विश्व चमकाया।कितनों को इस संपद से, तूने जीना सिखलाया।।1।।तेरी पावन वसुधा पर, नर-रत्न अनेक खिले थे।बल, विक्रम और दया के, जिनको गुण ख



32 मात्रिक छंद "शारदा वंदना"

32 मात्रिक छंद "शारदा वंदना"कलुष हृदय में वास बना माँ,श्वेत पद्म सा निर्मल कर दो ।शुभ्र ज्योत्स्ना छिटका उसमें,अपने जैसा उज्ज्वल कर दो ।।शुभ्र रूपिणी शुभ्र भाव से,मेरा हृदय पटल माँ भर दो ।वीण-वादिनी स्वर लहरी से,मेरा कण्ठ स्वरिल माँ कर दो ।।मन उपवन में हे माँ मेरे,कवि



गीत

विधान--प्रदीप छंद (16,13) पदांत- लघु गुरु (1 2) 🌹गीत🌹 """"""""""चहुँ ओर है छल भरा यौवन, सहज समर्पण चाहिए ।प्रेम सरित उद्गम करने को, अनुरागी मन चाहिए ।। 🌹परखने की आँखें हो संग, संतुलन मन बना सके।ख्वाहिश हो सँवारने



गीत

विधान--प्रदीप छंद (16,13) पदांत- लघु गुरु (1 2) 🌹गीत🌹 """"""""""चहुँ ओर है छल भरा यौवन, सहज समर्पण चाहिए ।प्रेम सरित उद्गम करने को, अनुरागी मन चाहिए ।। 🌹परखने की आँखें हो संग, संतुलन मन बना सके।ख्वाहिश हो सँवारने



पुनीत छंद

🌹पुनीत छंद 🌹विधान---मात्रिक, 15 मात्रा संयोजक- -- 2 2 3 3 2 2 1 🌻सागर वेग बहुत है धार। पावन प्रेम परम है सार।। कैसे बोल रहीं साकार। प्यारी लगे सहज आचार।।तुमरी प्रीत करे है धाँव । हिय में बसे प्रेम के भाव।। आकर हमपर कुछ तो वार। तू बन जा प्रेमी अवतार।।सब से पा



हाकलि छंद

--हाकलि छंद - हाकलि छंद में प्रत्येक चरण में तीन चौकल अंत में एक गुरु के संयोग से १४ मात्राएँ होती है l चरणान्त में s, ss ,।। एवं सगण l ls आदि हो सकते हैं l कतिपय विद्वानों छन्दानुरागियों का मत है चौदह मात्रा में यदि प्रत्येक चरण में तीन चौकल एवं एक दीर्घ [गुरु ] न होने पर उस छंद को हमें मानव छंद क



हाकलि छंद

पितृ दिवस पर प्रस्तुत है हालकि छंद, आदणीय पिता श्री को सादर प्रणाम एवं सभी मित्रों को हर्षित बधाई, ॐ जय माँ शारदा!हाकलि छंदपिता दिवस पर प्रण करें, पीर पराई मिल हरें।कष्ट न दें निश्चित करें, मातु पिता ममता भरें।बने पिता की लाठी भी, माता सुख संघाती भी।पूत कपूत नहिं हो ह



छंदमुक्त काव्य

"छंदमुक्त काव्य"गुबार मन का ढ़हने लगा हैनदी में द्वंद मल बहने लगा हैमाँझी की पतवारया पतवार का माँझीघर-घर जलने लगा चूल्हा साँझीदिखने लगी सड़कें बल्ब की रोशनी मेंपारा चढ़ने लगा है लू की धौकनी मेंनहीं रहा जाति-पाति का कोई बंधनजबसे अस्तित्व के लिए बना महा गठबंधनचोर ने लूट लिया मधुरी वाहवाहीचौकीदार की गेट प



छंदमुक्त काव्य

"विधा-छंदमुक्त" रूठकर चाँदनी कुछ स्याह सी लगीबादल श्वेत से श्याम हो चला हैक्या पता बरसेगा या सुखा देगाहै सिकुड़े हुए धान के पत्तों सी जिंदगीउम्मीद और आशा से हो रही है वन्दगीआज की मुलाकात फलाहार सी लगीरूठकर चाँदनी कुछ स्याह सी लगी।।वादे पर वादे सफेद झूठ की फलीक्वार के धूप में श्याम हुई सुंदरीअरमानों क



छंदमुक्त काव्य

"छंद मुक्त काव्य" अनवरत जलती है समय बेसमय जलती हैआँधी व तूफान से लड़ती घनघोर अंधेरों से भिड़ती हैदिन दोपहर आते जाते हैप्रतिदिन शाम घिर आती हैझिलमिलाती है टिमटिमाती हैबैठ जाती है दरवाजे पर एक दीया लेकरप्रकाश को जगाने के लिएपरंपरा को निभाने के लिए।।जलते जलते काली हो गई हैमानो झुर्रियाँ लटक गई हैबाती और



मेरे रस-छंद तुम, अलंकार तुम्हीं हो

मेरे रस-छंद तुम, अलंकार तुम्हीं होजीवन नय्या के खेवनहार तुम्हीं हो,तुम्हीं गहना हो मेरा श्रृंगार तुम्हीं हो।मेरी तो पायल की झनकार तुम्ही हो,बिंदिया, चूड़ी, कंगना, हार तुम्हीं हो।प्रकृति का अनुपम उपहार तुम्ही हो,जीवन का सार, मेरा संसार तुम्ही हो।पिया तुम्हीं तो हो पावन बसंत मेरे,सावन का गीत और



छंदमुक्त काव्य

रंगोत्सव पर प्रस्तुत छंदमुक्त काव्य...... ॐ जय माँ शारदा......!"छंदमुक्त काव्य"मेरे आँगन की चहकती बुलबुलमेरे बैठक की महकती खुश्बूमेरे ड्योढ़ी की खनकती झूमरआ तनिक नजदीक तो बैठदेख! तेरे गजरे के फूल पर चाँदनी छायी हैपुनः इस द्वार के मलीन झालर पर खुशियाँ आयी है।।उठा अब घूँघट, दिखा दे कजरारे नैनआजाद करा



फागुनी बहार, छंद मुक्त काव्य

फागुनी बहार"छंदमुक्त काव्य"मटर की फली सीचने की लदी डली सीकोमल मुलायम पंखुड़ी लिएतू रंग लगाती हुई चुलबुली हैफागुन के अबीर सी भली है।।होली की धूल सीगुलाब के फूल सीनयनों में कजरौटा लिएक्या तू ही गाँव की गली हैफागुन के अबीर सी भली है।।चौताल के राग सीजवानी के फाग सीहाथों में रंग पिचकारी लिएहोठों पर मुस्का



छंद मुक्त काव्य

महिला दिवस को समर्पित"छंद मुक्त काव्य"महिला का मनसुंदर मधुवनतिरछी चितवननख-सिख कोमलता फूलों सीसर्वस्व त्याग करने वालीकाँटों के बिच रह मुसुकाएमानो मधुमास फाग गाए।।महिला सप्तरंगी वर्णी हैप्रति रंग खिलाती तरुणी हैगृहस्त नाव वैतरणी हैकल-कल बहती है नदियों सीहर बूँद जतन करने वालीनैनों से सागर छलकाएबिनु पान



छंदमुक्त काव्य

"छंद मुक्त काव्य" मेरे सावन की शीलनमन की कुढ़न गर्मी की तपनमेरे शिशिर की छुवनमधुमास की बहार हो तुम।।जब से सजा है चेहरे पर शेहरातुम ही बहार हो तुम ही संसार होकहो तो हटा दूँ इन फूलों की लड़ियों कोदिखा दूँ वह ढ़का हुआ चाँदमेर जीवन में खिली चाँदनी हो तुम।।मेरी शहनाई की रागिनी होमेरे हवा की आँधी होमेरे सूरज



"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x