मरा जा रहा हूँ

""""" """""मरा जा रहा हूँ (हास्य)""""" """' ************************* प्रिय मुझसे तेरा यूँ मुंह का फुलाना, नखरे दिखाना यूँ रूठ के सो जाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न हँसना तनिक भी न सजना सवरना, न आँखें दिखाना न लड़ना झगड़ना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ तिरछी नजर से न मुझको रिझाना, न कसमों



"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य" जी करता है जाकर जी लू बोल सखी क्या यह विष पी लू

"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य"जी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लूताल तलैया झील विहारकिस्मत का है घर परिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचार व्यविचारहंस ढो रहा अपना भारकैसा- कैसा जग व्यवहारजी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लू।।सूखी खेती डूबे बा



छंद पंचचामर

शिल्प विधान- ज र ज र ज ग, मापनी- 121 212 121 212 121 2 वाचिक मापनी- 12 12 12 12 12 12 12 12."छंद पंचचामर"सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।मतंग मंद मालती सुगंध



"छंद चामर"

छंद - चामर, शिल्प विधान- र ज र ज र, मापनी - 212 121 212 121 212 वाचिक मापनी - 21 21 21 21 21 21 21 2 "चामर छंद"राम- राम बोलिए जुबान मीठ पाइकै।गीत- मीत गाइए सुराज देश लाइकै।।संग- संग नाव के सवार बैठ जाइए।आर- पार सामने किनार देख आइए।।द्वंद बंद हों सभी बहार बाग छाइयै।फूल औ कली हँसें मुखार बिंदु पाइयै।



"छंद वाचिक विमोहा"

छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - 212 212 अथवा - गालगा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा राजभा (अर्थात र र) विशेष : विमोहा 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है, जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 / गागा के स्थान पर दो लघु 11 /लल प्रयोग करने की छूट नहीं होती है। ऐसे छंद को 'वर्



"छंद मुक्तक"

छंद- कीर्ति (वर्णिक) छंद विधान - स स स ग मापनी- 112 112 112 2"आप सभी महानुभावों को पावन विजयादशमी की हार्दिक बधाई""मुक्तक"मुरली बजती मधुमाषा हरि को भजती अभिलाषा रचती कविता अनुराधाछलकें गगरी परिहाषा।।-1घर में छलिया घुस आयायशुदा ममता भरमायागलियाँ खुश हैं गिरधारीबजती मुरली सुख छाया।।-2मथुरा जनमे वनवा



चपैय्या छंद, हे माँ जग जननी, तुम्हरी अवनी, नाम रूप जगदंबा। शक्ति पीठ बावन, अतिशय पावन, नमन करूँ माँ अंबा।।

जय नव दुर्गा ^^ जय - जय माँ आदि शक्ति - छंद, शिल्प विधान, 10, 8, 12 मात्रा पर यति, प्रथम दो यति पर सम तुकांत, व प्रथम द्वितीय चरण का सम तुकांत....... ॐ जय माँ शारदा.......!शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ जगत जननी नवदुर्गा के 51 शक्तिपीठ को नमन करते हुए आप सभी को हार्दिक बधाई, ॐ जय माता दी!"चवपैय



"शक्ति छंद"

छंद शक्ति , (मापनीयुक्त मात्रिक) वर्णिक मापनी, 122 122 122 12, लगाला लगाला लगाला लगा"शक्ति छंद"पुरानी दवा है दिखाती असर। चढ़ाती नशा है पिलाके ज़हर।।कभी प्यार की तो कभी बेख़बर।बुलाती बहारें लड़ाती नज़र॥-1 निशाने लगाती नचाती नज़र। बहाने बनाती घूमाती शहर।। बहुत प्यार इसको मिला है मगरनशे को नशा भर पिलाती उम



“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा



“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)

छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़



“छंद, वाचिक प्रमाणिका” लगा उड़ा लगा उठा पहाड़ का धुआँ उठा

छन्द- वाचिकप्रमाणिका (मापनीयुक्त मात्रिक) वर्णिक मापनी - 12 12 12 12 अथवा - लगा लगा लगालगा, पारंपरिक सूत्र - जभान राजभा लगा (अर्थात जर ल गा) विशेष : प्रमाणिका 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है,जिसमें वर्णों की संख्यानिश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 के स्थान पर दो लघु 11 प्रयोग करने की छूटनहीं होती है। ऐस



“छंद चवपैया " (मात्रिक )जय जय शिवशंकर प्रभु अभ्यांकर नमन करूँ गौरीशा।

शिल्प विधान- कुल मात्रा =३० (१० ८ १२) १० और ८ पर अतिरिक्त तुकान्त “छंद चवपैया " (मात्रिक )जय जय शिवशंकर प्रभु अभ्यांकर नमन करूँ गौरीशा। जय जय बर्फानी बाबा दानी मंशा शिव आशीषा॥प्रतिपल चित लाऊँ तोहीं ध्याऊँ मन लागे कैलाशा। ज्योतिर्लिंग



"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।

"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।घूँघट था अंजान नैन का कोरा आँजन।वाणी बहकी जाय होठ बेचैन हो गए-मिली पास को आस पलंग बिराजे राजन।।-१खूब हुई बरसात छमा छम बूँदा बाँदीछलक गए तालाब लहर बिछा गई चाँदी। सावन झूला मोर झुलाने आए सैंया-



"विमोहा छंद मुक्तक"

छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - २१२ २१२"विमोहा छंद मुक्तक"दृश्य में सार हैआप बीमार हैं पूछता कौन क्या कान बेकार है॥-१ आँख बोले नहीं मौन देखे नहीं पाँव जाए कहाँ सार सूझे नहीं॥-२ वेदना साथ है. आयना सार है। दाग दागी नहीं- देखती आँख है॥-३ देख ये बाढ़ है। चेत आष



"दिग्पाल छंद"

मापनी- २२१२ १२२ २१२२ १२२"दिग्पाल छंद"जब गीत मीत गाए मन काग बोल भाएविरहन बनी हूँ सखियाँ जीय मोर डोल जाएसाजन कहाँ छुपे हो ले राग रंग अबिराऋतुराज बौर महके मधुमास घोल जाए।।आओ न सजन मेरे कोयल कसक रही है पीत सरसो फुलाए फलियाँ लटक रहीं हैदादुर दरश दिखाए मनमोहना कहाँ होपपिहा तरस



"रूपमाला/मदन छंद"

"रूपमाला/मदन छंद"आप बचपन में कहाँ थे आज है क्या हालदेख जाओ गाँव आकर खो गए हैं ताल।हर नहर सूखी मिलेगी बाग वन आधारपेड़ जामुन का खड़ा है बैठ कौआ हार।।-१हो सके तो देख लेना बंद सारे द्वारझाँकती मानों चुड़ैली डर गई दीवार।खो गई गुच्छे की चाभी झुक गए है लोगनेवला मुड़ मुड़ के देखे कर र



"छंद हंसगति"

हंसगति ( २० मात्रा ) शिल्प विधान --- ११,९= २० प्रथम चरण ११ मात्रा चरणान्त २१ से अनिवार्य"छंद हंसगति"जस वीणा रसधार भरी है माता।कर शारद उपकार भक्त का नाता।।नमन करूँ दिन-रात मातु मम भोली।भर शब्दों का ज्ञान सहज हो बोली।।-१झंकृत हों सब तार मृदुल धुन गाऊँ।छंद सृजन अनुसार राग अप



छंद – तमाल” (सम मात्रिक )

शिल्प विधान --चौपाई गुरु लघु (१६ ३=१९) अंत में यतिछंद – तमाल” (सम मात्रिक )गोकुल गलियाँ मोहन खेलें रास। बंसी बाजे मधुवन कोकिल वास॥ दूर नगर बरसाना राधे गाँव।कुंज गली में तुलसी श्यामा छाँव॥-१नाचें गाएं झूमत ग्वाला बाल। दधि-मुख लेपन फोरत हाँडी लाल॥ सखियाँ गागर लेके निकली रा



छंद -"पद्धरि"

छंद -"पद्धरि"(पदपादाकुलक की उपजाति)*शिल्प विधान - मात्रा भार =१६ आरम्भ में गुरु अनिवार्य *पदपादाकुलक चौपाई में चार चौकल बनते हैं तभी लय सटीक आती है । *अंत में १२१ ( जगण)छंद -"पद्धरि"हो पावन मनभावन उद्यान। हरियाली सुहावन पहचान॥ झूमे पेड़ घर बाग महान। डाल डाली पर फूल सुजान



"रोला छंद"

"रोला छंद"जय जय सीताराम नाम जप लो अनुसारी।रटती रसना नाम सियापति अवध बिहारी।।राधे राधे श्याम गीर धरि नख गिरधारी।भाग कालिया भाग नाग नथ नथें मुरारी।।-१गौरी पति महादेव आप शिव गौरीशंकर।देवों के प्रभु देव आप है महा निरंकर।।लक्ष्मीपति हरिनाथ है क्षीरसिंधु निवासाचँवर डुलाएँ मातु



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