भरतनाट्यम और कथकली नृत्यांगना (मृणालिनी साराभाई)

'मुझे नहीं पता मैं कहाँ से अस्तित्व में आई ? मुझमें समझदारी कहाँ से आई, किसने मेरा रास्ता तैयार किया ? हर दिन एक नया दिन, किसी भी घंटे का कुछ पता नहीं.यही अज्ञात क्षण निश्चित दिनों में बदल जाते हैं । मैंने बाद में महसूस किया किमैं क्या थी । और पांच साल की उम्र में मे



दर्पण

बोले टूटकर बिखरा दर्पण , कितना किया कितनों को अर्पण,बेरंगों में रंग बिखेरा, गुनहगारों को किया समर्पण।देखा जैसा, उसको वैसा, उसका रूप दिखाया,रूप-कुरूप बने छैल-छवीले, सबको मैंने सिखाया,घर आया, दीवार सजाया, पर विधना की माया,पड़ूँ फर्श पर टुकड़े होकर, किस्मत में ये लिखाया।च



मेरी दूसरी पुस्तक मन दर्पण का आवरण

ISBN 978-81-933482-3-1 गूगल सर्च कर, ऑर्डर कर सकेंगे. अभी प्री-सेल शुरु है. पुस्तक 20 मई से 1 जून के बीच प्रकाशित होने की उम्मीद है.



मन दर्पण

मेरी नई पुस्तक मन दर्पण का कवर पेज प्रस्तुत है. पुस्तक अप्रेल 2017 तक प्रकाशित हो जाएगी.



दर्पण छवि के लेखक पीयूष गोयल

 1.पीयूष जी अपने बारे में बताए. जी मेरा नाम पीयूष कुमार गोयल है में पिता डाक्टर देवेंद्रा कुमार गोयल व माता रवि कांता गोयल का बड़ा बेटा हूँ मे डिप्लोमा यांत्रिक इंजिनियर हूँ और एक कंपनी में कार्यरत हूँ. 2.पीयूष जी आपने इतना सुंदर काम किया हैं इस की प्रेरणा कहा से मिली ? जी सच तो ये हैं मुझे ईश्वर



दर्पण को दोष लगाने से

दर्पण को दोष लगाने से सूरत नहीं बदल जाती है !तुम मत पूजो घर की तुलसी !तुम मत मानों ,कोई देवता ! बहती नदिया को छलकर तुम ,भ्रम पाले ना ,कोई देखता !छुप-छुपकर ,चोरी करने सेसीरत नहीं बदल जाती है !चुगली करतीं हैं ख़ुद आँखें !कितना पाप लिए जागे हो !सीढ़ी पर हो झुकते लेकिन ,विश्वासों के तोड़े धागे !अर्चन को



इतने बदसूरत है फिर भी दर्पण देख रहे है

एक बार सुकारात सुबह के समय दर्पण देख रहे थे ऐसा वह लगभग रोज करते थे  ऐसा देखकर उनका एक शिश्य पीछे से मुसकरा रहा था कि सुकारात इतने बदसूरत है फिर भी दर्पण देख रहे है  सुकारात ने उसे मुसकराते देखा तो पूँछा क्या बात है  उसने कहा कुछ नही  तब सुकारात ने कहा मै दर्पण इस लिए देखता हूँ  कि और कितने अच्छे का





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