परिवर्तन को स्वीकारें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि परिवर्तनशील है या यूँ कहें कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है | यहां एक जैसा कभी कुछ नहीं रह पाता है | सुबह सूर्य निकलता है शाम को ढल जाता है , सृष्टि के जितने भी सहयोगी हैं निरंतर गतिशील है | यदि गतिशीलता को जीवन एवं विराम को मृत्यु कहा जाय तो गलत नहीं है | जो रुक गया समझ ल



संस्कृति एवं सभ्यता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस जीवन में हम प्राय: संस्कृति एवं सभ्यता की बात किया करते हैं | इतिहास पढ़ने से यह पता चलता है कि हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता बहुत ही दिव्य रही है | भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्धि संस्कृति है , जहां अन्य देशों की संस्कृतियां समय-समय पर नष्ट होती रही है वहीं भारतीय संस्कृ



अहंकार से बचने का उपाय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य के अनेकों मित्र एवं शत्रु बनते देखे गए हैं , परंतु मनुष्य अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचान नहीं पाता है | मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके स्वयं के भीतर उत्पन्न होने वाला अहंकार है | इसी अहंकार के कारण मनुष्य जीवन भर अनेक सुविधाएं होने के बाद भी



जीवन का अद्भुत सत्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों में वर्णित एक एक शब्द मानव मात्र को दिव्य संदेश देता है | कोई भी साहित्य उठा कर देख लिया जाय तो उसने मानव मात्र के कल्याण की भावना निहित है | आदिभाषा संस्कृत में ऐसे - ऐसे दिव्य श्लोक प्राप्त होते हैं जिनके गूढ़ार्थ बहुत ही दिव्य होते हैं | ऐसा ही एक श्लोक देखते हैं कि ई



मर्यादा का रखें ध्यान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संपूर्ण सृष्टि में परमात्मा ने एक से बढ़कर एक सुंदर रचनाएं की हैं | प्रकृति की छटा देखते ही बनती है , ऊंचे - ऊंचे पहाड़ , गहरे - गहरे समुद्र , अनेकों प्रकार की औषधियां , फूल - पौधे एवं अनेक प्रकार के रंग बिरंगी जीवो की रचना परमात्मा ने किया है जिन्हें देखकर बरबस ही मन मुग्ध हो जाता है और मन यही



मनुष्य के वास्तविक बंधु - बांधव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य माता के गर्भ से जन्म लेता है उसके बाद वह सबसे पहले अपने माता के द्वारा अपने पिता को जानता है , फिर धीरे-धीरे वह बड़ा होता है अपने भाई बंधुओं को जानता है | जब वह बाहर निकलता है तो उसके अनेकों मित्र बनते हैं , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसका विवाह हो जाता है और वह अपने पत्नी से पर



लोहड़ी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संपूर्ण विश्व में यदि अनेकता में एकता का दर्शन करना है तो वह हमारे देश भारत में ही मिलता है | यहां राष्ट्रीय एवं धार्मिक त्योहारों के साथ-साथ आंचलिक त्योहारों की भी धूम वर्ष भर मची रहती है | समय-समय पर अनेक त्यौहार हमारे देश भारत में मनाए जाते हैं और इन त्योहारों की विशेषता यह है कि इन सभी त्योहार



संकष्टी गणेश चतुर्थी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत कला , संस्कृति के साथ-साथ अनेकों रंग बिरंगे त्योहारों एवं मान्यताओं की परंपरा को स्वयं मैं समेटे हुए है | यहां प्रतिदिन कोई न कोई व्रत मानव मात्र के कल्याण के लिए मनाया जाता रहता है | इन्हीं व्रतों की श्रृंखला में माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को "संकष्टी गणेश चतुर्थी" का व्रत ब



युवा समझें अपने कर्तव्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं की मुख्य भूमिका होती है | जहां अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों का पोषण करने का कार्य बुजुर्गों के द्वारा किया जाता है वहीं उनका विस्तार एवं संरक्षण का भार युवाओं के कंधों पर होता है | किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का



माता - पिता के महत्त्व को समझें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म भारतीय संस्कृति का मूल है | भारतीय संस्कृति , संस्कार एवं सभ्यता का उद्गम स्रोत सनातन धर्म ही है | सनातन धर्म नें मानव मात्र के लिए एक सशक्त मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है | अनेक मान्यताओं , परंपराओं के साथ ही हमारे यहां माता-पिता का विशिष्ट स्थान बताया गया है | यदि जीवन में माता पिता क



बैर - प्रीति एवं स्वार्थ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन विचित्रताओं से भरा हुआ है | मनुष्य के द्वारा ऐसे - ऐसे क्रियाकलाप किए जाते रहे हैं जिनको देख कर के ईश्वर भी आश्चर्यचकित हो जाता है | संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य परिवार एवं समाज में भिन्न-भिन्न लोगों से भिन्न प्रकार के व्यवहार करता है , परंतु स्थिर भाव बहुत ही कम देखने को मिलता है | यह सम



गुरु से कपट मित्र से चोरी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य जीवन कैसे जिया जाय ? मनुष्य के आचरण कैसे हो ? उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ? इसका समस्त वर्णन सनातन के धर्म ग्रंथों में देखने को मिलता है | जहां मनुष्य को अनेक कर्म करने के लिए स्वतंत्र कहा गया है वही कुछ ऐसे भी कर्म हैं जो इस संसार में है तो परंतु मनुष्य के लिए वर्ज



गुरु से द्रोह :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारतीय संस्कृति और सभ्यता में एक नाम बहुत ही सम्मान एवं श्रद्धा के साथ लिया जाता है जिसे गुरु या सद्गुरु कहा गया है | इस छोटे से नाम इतनी प्रभुता छिपी हुई है जिसका वर्णन स्वयं मैया शारदा एवं शेषनाग जी भी नहीं कर पा रहे हैं | गुरु को साक्षात परब्रह्म माना गया है यह मान्यता यूँ ही नहीं कही गई है बल्क



महत्त्वपूर्ण कौन ?? :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अनेकों लोगों से मिलता है जीवन के भिन्न - भिन्न क्षेत्र में भिन्न - भिन्न प्रकार के लोग मिला करते हैं जो कि जीवन में महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं | अनेक महत्त्वपूर्ण लोगों के बीच रहकर मनुष्य जीवन में सफलता - असफलता प्राप्त करता रहता है | जीवन



भगवान श्रीराम के आदर्श :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारत देश आदिकाल से अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है | समय-समय पर यहां अनेकों महापुरुषों ने जन्म लेकर समाज को नई दिशा दिखायी है | समय - समय पर इस पुण्यभूमि में ईश्वर ने अनेकानेक रूपों में अवतार भी लिया है | इन्हीं महापुरुषों (भगवान) में एक थे रघुकुल के गौरव , चक्रवर्ती सम



अधकचरा ज्ञान घातक होता है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे देश भारत में सदैव से विद्वानों का मान सम्मान होता रहा है | अपनी विद्वता के बल पर विद्वानों ने भारत देश का गौरव समस्त विश्व में बढ़ाया है | विद्वता का अर्थ मात्र पांडित्य का क्षेत्र न हो करके जीवन के अनेक विषयों पर पारंगत हो करके यह विद्वता प्राप्त की जाती है | किसी भी विषय का विद्वान हो वह अप



मानव शरीर एक मंदिर है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर सर्वश्रेष्ठ मानवयोनि को कहा गया है |मानव जीवन में आकर के मनुष्य अपने बुद्धिबल का प्रयोग करके अनेकों प्रकार के रहस्य से पर्दा हटाता है | मानव जीवन को उच्चता की ओर ले जाने के कृत्य इसी शरीर में रहकर के किए जाते हैं | मनुष्य के जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है ईश्वर प्राप्ति | ईश्वर को प्र



ब्रह्माण्ड एवं मानव शरीर का रहस्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के अनुसार इस ब्रह्मांड की रचना परमपिता परमात्मा किंचित विचार मात्र से कर दी | ईश्वर द्वारा सृजित इस ब्रह्मांड में अनेकों प्रकार के जीवो के साथ जड़ पदार्थ एवं अनेकों लोकों का वर्णन पढ़ने को मिलता है | मुख्य रूप से पंच तत्वों से बना हुआ यह ब्रह्मांड अंडाकार स्वरूप में है , इसमें जल की मात्



सनातन की सहिष्णुता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल में जब सृष्टि का विस्तार हुआ तब इस धरती पर सनातन धर्म के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं था | सनातन धर्म ने मानव मात्र को अपना मानते हुए वसुधैव कुटुंबकम की घोषणा की जिसका अर्थ होता है संपूर्ण पृथ्वी अपना घर एवं उस पर रहने वाले मनुष्य एक ही परिवार के हैं | सनातन धर्म की जो भी परंपरा प्रतिपादित की



धुंधला होता संस्कारों का दर्पण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

. *इस धरा धाम पर सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कही गई है | मनुष्य यदि सर्वश्रेष्ठ हुआ है तो उसका कारण यही था कि मनुष्य ने अपने हृदय में मानवता का बीजारोपण किया है | मनुष्य के रूप में जन्म लेने मात्र से कोई मानव नहीं बन जाता है बल्कि होने के लिए परंपरागत मानवीय मूल्यों का होना परम



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