"सिंहावलोकनी दोहा"

विधान- 13-11 की यति, चौपाई की अर्धाली व दोहा का सम चरण, सम चरण का अंतिम शब्द विषम चरण का पहला शब्द हो, यही इस दोहा की विशेषता है"सिंहावलोकनी दोहा" परम मित्र नाराज है, कहो न मेरा दोष।दोष दाग अच्छे नही, मन में भरते रोष।।-1रोष विनाशक चीज है, भरे कलेश विशेष।विशेष मित्र



भास्कर मलीहाबादी

पंख लगा देता अगर,छेरी_के_करतार ।तो हरियाली से रहित,_होता यह संसार ।। -भास्कर मलीहाबादी



"दोहावली"

"दोहावली"गली छोड़ कर क्यूँ गए, ओ मेरे मन मीतकोयल अब गाती नहीं, सुबह सुरीली गीत।।-1दूर जा रहें हैं सभी, जैसे जूनी रीत।गाँव छोड़ कर बस रहे, शहर अनोखी प्रीत।।-2सुना रहे हैं अब सभी, अपने मन की गीत।मानों ओझल हो गई, लोक प्रीत संगीत।।-3बूढ़ी दादी की कथा, अरु चौपाली हीत।शंकित लगती चाल है, दम्भित लगते मीत।।-4फै



"दोहावली"

"दोहावली"हँसते मिलते खेलते, दिल हो जाता खास।प्रेम गली का अटल सच, आपस का विश्वास।।-1राधा को कान्हा मिले, मधुवन खुश्बू वास।थी मीरा की चाहना, मोहन रहते पास।।-2गोकुल की गैया भली, थी कान्हा के पास।ग्वाल-बाल की क्या कहें, हुए कृष्ण के दास।।-3यशुदा के दरबार में, दूध दही अरु छास।मोहन मिश्री ले उड़े, माखन मुख



"दोहावली"

"विधा- दोहा"बादल है आकाश में, लेकर अपना ढंगइंद्रधनुष की नभ छटा, चर्चित सातों रंग।।-1दाँतों में विष भर चला, काला नाग भुजंग।नाम सुने तो डर गए, सर्प मुलायम अंग।।-2जीवन की अपनी व्यथा, हर जीवों के संग।इक दूजे को हम सभी, क्यों करते हैं तंग।।-3सरेआम होता गया, नियम नगर का भंग।कभी टूटते हैं महल, कभी झोपड़ी तं



"दोहा"इंसानों के महल में पलती ललक अनेक।

"दोहा"इंसानों के महल में पलती ललक अनेक।खिले जहाँ इंसानियत उगता वहीँ विवेक।।जैसी मन की भावना वैसा उभरा चित्र।सुंदर छाया दे गया खिला साहसी मित्र।।अटल दिखी इंसानियत सुंदर मन व्यवहार।जीत लिया कवि ने जगत श्रद्धा सुमन अपार।।महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर प्रस्तुत दोहावली

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर प्रस्तुत दोहावली "दोहा"भोर हुई निकलो सजन महके बगिया फूल।हाथ पाँव झटकार लो आलस जाओ भूल।।-१रात देर तक जागते दिन भर घोड़ा बेंच।सोते हो तुम देर तक अब तो चादर खेंच।।-२ऋषियों की यह देन है दुनिया करती योग।बिन हर्रे बिन फिटकरी भागे सगरो रोग।।-३ऋषियों की



“दोहा”

“दोहा”चक्र सुदर्शन जोर से घूम रहा प्रभु हाथरक्षा करें परमपिता जग के तारक नाथ।।-१ जब जब अंगुली पर चढ़ा चक्र सुदर्शन पाशतब तब हो करके रहा राक्षस कुल का नाश।।-२ महातम मिश्र गौतम गोरखपु



"दोहा"

"दोहा"हरिहर तुम बिन कौन अब हरे जगत की पीर मंशा मानस पातकी शीतल करो समीर।।-१प्रभु आया तुम्हरी शरण तुम हो तारणहारतन मन धन अर्पण करूँ हे जग पालनहार।।-२सुख संपति सुंदर भवन निर्मल हो व्यवहारघात हटे घट-घट घृणा घटना हटे कुठार।।-३मूरख मनवा हरि बिना भरे न भव्य विचारकामधेनु बिन बाछ



"दोहा"

"दोहा"उड़े तिरंगा शान से लहराए जस फूलहरित केशरी चक्र बिच शुभ्र रंग अनुकूल।।-१झंडा डंडे से बँधा मानवता की डोरकाश्मीर जिसकी सिखा क न्याकुमारी छोर।।-२महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक”न्याय और अन्याय का किसको रहा विचार। साधू बाबा भग गए शिक्षा गई बेकार। नौ मन का कलंक लिए नाच रहा है चोर- दशा फिरी है आठवीं पुलक उठी भिनसार॥-१ दौलत का इंसाफ हो हजम न होती बात। सब माया का खेल है ठिठुर रही है रात। हरिश्चंद्र ओझल हुए सत्य ले गए साथ- बिन सबूत दिन



"दोहा मुक्तक"

"दोहा मुक्तक"पारिजात सुन्दर छटा, शम्भू के कैलाश।पार्वती की साधना, पुष्पित अमर निवास।महादेव के नगर में, अतिशय मोहक फूल-रूप रंग महिमामयी, महके शिखर सुवास।।हिमगिरि सुंदर छावनी, देवों का संसार।कल्पतरु का वास जहाँ, फल फूले साकार।जटा छटा शिर चाँदनी, पहिने शिव मृगछाल-नयन रम्यता



"विधा- दोहा"

"विधा- दोहा"रे रंगोली मोहिनी, कैसे करूँ बखानविन वाणी की है विधा, मानों तुझमे जान।।-१भाई दूजी पर्व है, झाँक रहा है चाँदनभ तारे खुशहाल हैं, अपने अपने माँद।।-२झूम रही है बालियाँ, झलक उठे खलिहानपुअरा तपते खेत में, कहाँ गए धन धान।।-३नौ मन गेंहूँ भरि चले, बीया बुद्धि बिहानपानी



" दोहावली"

" दोहावली" विषय आज का मनचला, खेल खेल में खेलकहीं रातरानी खिली, कहीं खिली है वेल।।-१सुंदर हैं तारे सभी, गुरु प्रकाश सम आपमंच मिताई साधुता, साधुवाद बिन ताप।।-२कड़क रही है दामिनी, बादल सह इतरायपलक बंद पल में करे, देखत जिय डरि जाय।।-३क्यों रूठे हो तुम सखे, कुछ तो निकले बैनव्य



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक”घर की शोभा आप हैं, बाहर में बहुमान भवन सदन सुंदर लगे, जिह्वा मीठे गानधाम धाम में वास हो, सद आचरण निवासभक्ती भक्त शिवामयी, शक्ति गुणी सुजान॥-१घर मंदिर की मूर्ति में, संस्कार का वास प्रति मनके में राम हैं, प्रति फेरा है खाससबके साथ निबाहिए, अंगुल अंगुल जापनिशा



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक”भूषण आभूषण खिले, खिल रहे अलंकार। गहना इज्जत आबरू, विभूषित संस्कार। यदा कदा दिखती प्रभा, मर्यादा सम्मान- हरी घास उगती धरा, पुष्पित हरशृंगार॥-१गहना हैं जी बेटियाँ, आभूषण परिवार। कुलभूषण के हाथ में, राखी का त्यौहार। बँधी हुई ये डोर है, कच्चे धागे प्रीत- नवदुर्गा की आरती, पुण्य प्रताप अपार



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक”यह तो प्रति हुंकार है, नव दिन का संग्राम। रावण को मूर्छा हुई, मेघनाथ सुर धाम। मंदोदरी महान थी, किया अहं आगाह- कुंभकर्ण फिर सो गए, घर विभीषण राम॥-१ यह दिन दश इतिहास में , विजय पर्व के नाम। माँ सीता की वाटिका, लखन पवन श्रीराम। सेतु बंध रामेश्वरम, शिव मय राम मह



दोहा मुक्तक

"दोहा मुक्तक" भर लो चाह बटोर कर, रख अपने भंडार। खड़ी फसल यह प्रेम की, हरियाली परिवार। बिना खाद बिन पान के, निधि अवतरे सकून- मन चित मधुरी भाव भरि, ममता सहज दुलार।।-1 प्रेम खजाना है मनुज, उभराता है कोष। अहंकार करते दनुज, निधि होती निर्दोष। कभी गिला करती नहीं, रखती सबका मान- पाए जो बौरात वह, संचय भार



दोहा मुक्तक

"दोहा मुक्तक" अमिय सुधा पीयूष शिव, अमृत भगवत नाम सोम ब्योम साकार चित, भोले भाव प्रणाम मीठी वाणी मन खुशी, पेय गेय रसपान विष रस मुर्छित छावनी, सबसे रिश्ता राम।।-1 अमृत महिमा जान के, विष क्योकर मन घोल गरल मधुर होता नहीं, सहज नहीं कटु बोल तामस पावक खर मिले, लोहा लिपटे राख उपजाएँ घर घर कलह, निंदा कपट क



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक”नित मायावी खेत में, झूमता अहंकार। पाल पोस हम खुद रहे, मानों है उपहार। पुलकित रहती डालियाँ, लेकर सुंदर फूल- रंग बिरंगे बाग से, कौन करे प्रतिकार॥-१पक्षी भी आ बैठते, तकते हैं अभिमान। चुँगने को दाना मिले, कर घायल सम्मान। स्वर्ण तुला बिच तौल के, खुश होत अहंकार-चमक



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