दुःख

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हंसों का जोड़ा

हंसो का जोड़ा डॉ शोभा भारद्वाज देखने वाले उन्हें हंसों का जोड़ा कहते थे .दोनों का एक ही गली में घर था आते जाते नजर टकरा जाती पता नहीं चला कब प्रेम हो गया दोनों छिप कर मिलने लगे लड़की का नाम मंजू था उसके पिता मन्दिर के पुजारी थे पंडिताई करते थे . घर का बड़ा बेटा विवाहित था उसकी अपनी चलती दुकान थी .



अंधी ममता दिमाग की नहीं दिल की सुनती है

अंधी ममता दिमाग की नहीं दिल की सुनती है ?डॉ शोभा भारद्वाज इंडोनेशिया एवं सिंगापुर की पृष्ट भूमि में लिखी कहानी यूनी 22 वर्षों से सिंगापुर में मेड का काम कर रही थी यहाँ इन्हें नैनी कहा जाता वह सिंगापूर की नागरिकता लेना चाहती है नहीं मिली वहाँ केवल पढ़े लिखे प्रतिभावान लोगों को नागरिकता दी जाती है



सब कुछ एक पल के लिए।

सब कुछ एक पल के लिए।मरना जीना सब हरि विधाता के हाथ मे।यस अपयश कर्म सब मानव के हाथ मे।हवा पानी मिट्टी आँग आसमान सब बिधाता ने अपने मन से बनाया।रेल बस जहाज ट्रक मोटर साइकिल कार मानव अपने कर से बनाया।इन सब की अधिकता विनाश का कारण है पर जननी सबकी घरती है।बीमारी महामारी ज्वाला भूकम्प जलजला तूफ़ान सब से साम



दुख जैसा है, तभी अपना है

तेरा मिलना बहुत अच्च्छा लगे है, कि तू मुझको मेरे दुख जैसा लगे है...ये चर्चा, किसी के हुस्न की नही है। ना ये बयान है किसी के संग आसनाई के लुत्फ की। सीधे-सहज-सरल लफ्जों में यह तरजुमा है एक सत्य का। सच्चाई यह कि अपनापन और सोहबत की हदे-तकमील क्या है।अपना क्या है? कौन है?... वही जो अपने दुख जैसा है! मतलब



अब इतना दम कहाँ!

झुक गए हैं कंधे मेरे, अपनों का बोझ उठाते,सपनों का बोझ उठाऊं, अब इतना दम कहाँ!कण कण जोड़कर घरोंदा ये बनाया मैंने,तन-तन मोड़कर इसको सजाया मैंने।रुक गया हूँ, झुक गया हूँ, बहनों का बोझ उठाते,गहनों का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!परिवार की आशाओं में खुद को पिराया मैंने,बनकर छत उनकी सदा, खुद को भिगाया मैंने।अ



दास्तान-ए-कलम (मेरी कलम आज रोई थी)

मेरी कलम आज फिर रोई थी,तकदीर को कोसती हुई, मंजर-ए-मज़ार सोचती हुई,दफ़न किये दिल में राज़, ख़यालों को नोंचती हुई।जगा दिया उस रूह को जो एक अरसे से सोई थी,मेरे अल्फाज़ मेरी जुबां हैं, मेरी कलम आज रोई थी।।पलकों की इस दवात में अश्कों की स्याही लेकर,वीरान दिल में कैद मेरी यादों



आज बहुत रोई पिया जी! - एस. कमलवंशी

आज बहुत ही रोई पिया जी, आज बहुत ही रोई,जिस्म-फ़रोसी की दुनियाँ में, दूर तलक मैं खोयी।कोई भी हाल न मेरा पूँछे, कोई न पूँछे ठिकाना,जिधर भी जावे मोरी नजरिया, चाहवे सब अज़माना।घूँट घूँट कर ज़हर मैं निगली, देह पथरीली होई,आज बहुत ही रोई पिया मैं, आज बहुत ही रोई।लाख मुसाफ़िर, लाख प्यासे, लाख ठिखाने लाये,लाख त



सखी री मोरे पिया कौन विरमाये?- एस. कमलवंशी

सखी री मोरे पिया कौन विरमाये? कर कर सबहिं जतन मैं हारी, अँखियन दीप जलाये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... अब की कह कें बीतीं अरसें, केहिं कों जे लागी बरसें, मो सों कहते संग न छुरियो, आप ही भये पराये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... गाँव की



दुखों की पोटली

दुखों की पोटलीएक बार एक गांव के सभी लोग अपने अपने दुखों के कारण भगवान से बहुत नाराज हो गए वह भगवान से प्रार्थना करने लगे कि उनके दुखों को दुर करें वरना वो भगवान काहे का ?लोगें की फरियाद सुन आकाश से भविष्यवाणी हुई  हे गांव वासियों ऐसा करें आज रात के तीसरे पहर में सब लोग अपने अपने दुखो को एक कागज में





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