कलयुग

कलयुगपैदल चल, हल जोत किसान, साइकिल से रफ्तार बढ़ाई।गुरुकुल पढ़, संस्थान बनाई, डिजिटल से रफ्तार बढ़ाई।घोड़ा गाड़ी, बैलगाड़ी, रथ छोड़ ऑटोमेटिक रेल बनाई।रह कच्ची झोपड़ी, तजि माटी, ईट पत्थर से महल बनायो।गोधूलि बिसरायो, खेत ठुकरायो, कम्पनी में काम ब



‘लोकबंदी’ और ‘भौतिक-दूरी’

https://waachaal.blogspot.com/2020/05/blog-post.htmlकिसी भी क्षेत्र की भाषा उस क्षेत्र की संस्कृति की कोख से अपने शब्दों की सुगंध बटोरती है। वहाँ की लोक-परम्परा, जीवन शैली, आबोहवा, फ़सल, शाक-सब्ज़ी, फलाहार, लोकाचार, रीति-रिवाज, खान-पान, पर्व-त्योहार, नाच-गान, हँसी-मज़ाक़, हवा-पानी जैसे अगणित कारक है



मैं खुशी ढूंढ़ता हूं

छोटे छोटे अरमानों के पुरा होते देख,मैं खुशी ढूंढ़ता हूं।किसी गरीब की थाली में पकवान देख,किसी मजदूर को काम के



दूर

दुनिया में आए अकेले हैं। दुनिया से जाना अकेले हैं। दर्द भी सहना पड़ता अकेले हैं। लोग मतलब निकलते ही छोड़ देते अकेला है। तो फिर काहे की दुनियादारी, लोगों से दूर रहने में ही ठीक है। दर्द जब हद से गुजरता है तो गा लेते हैं। जिंदगी इम्तिहान लेती है। कभी इस पग में कभी उस पग में घुंघरू की तरह बजते ही रहें



सब कुछ एक पल के लिए।

सब कुछ एक पल के लिए।मरना जीना सब हरि विधाता के हाथ मे।यस अपयश कर्म सब मानव के हाथ मे।हवा पानी मिट्टी आँग आसमान सब बिधाता ने अपने मन से बनाया।रेल बस जहाज ट्रक मोटर साइकिल कार मानव अपने कर से बनाया।इन सब की अधिकता विनाश का कारण है पर जननी सबकी घरती है।बीमारी महामारी ज्वाला भूकम्प जलजला तूफ़ान सब से साम



आजाद हुआ कोरोना।

आजाद हुआ कोरोना।कोरोना बढ़ रहा है लॉक डाउन खोला जा रहा है।देश दुनियाँ में मौत के आंकड़े को छुपाया जा रहा है।जग में मानव को जीने का सलीका दिया जा रहा। काश यह छूट देश मे पहले दी गई होती ।आज देश मे एक भी प्रवासी मजदूर न हुआ होता।हर प्रवासी मजदूर कोरोना की शक्ल में नजर आ रहा है।चाहत होती थी दिल्ली, मुम्बई



मन भ्रम

आंखों से पर्दा और तकदीर के लेख अपने समय पर ही खुलकर सामने आते हैं। बातों के फेर और मन भ्रम के फेर एक न एक दिन टूटते जरूर हैं लेकिन जब भी टूटते हैं, सोचने के लिए सवाल और सीख देकर जाते हैं। मन का भ्रम हो या हो मन प्रेम। मन के रिश्ते हैं। मन को ही समझ आते हैं। दिमाग तो है उलझनों का पिटारा, देखते हैं, क



#कोरोना त्रासदी । #मजदूरों का #पलायन #मोदी_सरकार_की_विफलता

#कोरोना त्रासदी । #मजदूरों का #पलायन#मोदी_सरकार_की_विफलता#निष्पक्ष व सटीक #विश्लेषणसंविधान की शक्तियों का उपयोग करें।नागरिकों की जान माल स्वास्थ्य व कोरोना की राष्ट्रीय त्रासदी में सुप्रीम कोर्ट व जनता कि नाराजगी कोई मोल लेने का दुस्साहस नहीं करेगा किंतु इच्छाशक्ति तो मोदी साहिब को ही दिखानी होगी।वि



कोरोना वायरस

Covid-19 coronavirus Disease-2019 कोरोना वायरस के कहर से हम भलीभाँति अवगत हैं देश का मीडिया पल पल की खबर आप तक पहुँच



शोर

चारों ओर कोरोना का शोर है। घर में ही रहों,पाबंदियों का दौर हैं। यहां अन्नदाता कमजोर है। नई नई दलीलों पर जोर है। घर में ही रहों,पाबंदियों का शोर है। यहां मजदूर कमजोर है। मजदूरों के बल पर बने बैठे, मालिकों का शोर है। घर में ही रहों, पाबंदियों का दौर हैं। कोरोनावायरस की चपेट में आ रहे लोग हैं। एक से हज



अब की धुन

कैसे कहाँ से आया कोरोना..? अपने भी अपनो से दूर रहने लगे। ये जो कड़ी है, मुश्किल की घड़ी है। सामाजिक दूरी सहनी पड़ी है, बंद है हर कोई, अपने घरों में। कैसे कहाँ से आया कोरोना..? बहती जहरीली हवाओ के डर से, सभी के मुँह में मास्क लगने लगे। एक दूजे को हक़ करने से डरने लगे, कैसे कहाँ से आया कोरोना..? ख़ोज करने



कोरोना नही, महामारी है।

काटे नहीं कटते ये दिन ये रातकह दी है जो घर मे रहने की बातलो आज मैं कहता हूँकोरोना नही यह तो महामारी है।कोई नहीं है बस कोरोना कोरोना कहनी थी तुमसे जो दिल की बातजब तक रहे कोरोना घर मे ही रहना है,कोरोना एक महामारी बन गई है।कैसी हवा है, जहरीली जहरीलीआज सारे जहाँ, में कोरोना कोरोनासारा नज़ारा, नया नयादिल



पैदल ही ......! क्यों ...?

पैदल ही ......!क्यों ...?देश के विकास में जिसने अहम योगदान दिया ,आज संकट के समय क्यों उसको इस तरह छोड़ दिया....?क्या उसको हक नहीं कि उसको भी दो वक़्त की रोटी के साथ सुरक्षित आश्रय मिल जाता ?वह भी देश की इस संकट की घड़ी में अपना कर्तव्य निभाता।अगर उस संक्रमण का एक कण भी उसके साथ चला गया ,तो सोचो , उस



दूरी...... !

दूरी...... !उस कंपकंपाती रात में वह फटी चादर मेंसिमट- सिमट कर, सोने का प्रयास कर रही थी ,आँखों में नींद ही नहीं थी ,शरीर ठंड से कांप जो रहा था।एक ही चादर थी , जो ओढ़ी थी, दोनों बहनों ने ,तभी बाहर से आती मधुर आवाजों से,वह बेचैन हो ,खिंचती चली गई।झोपड़ी की बंद खिड़की के सुराख़ से दो आँखें बाहर झाँकने लगी



गरीबी के आलम में,

गरीबी के आलम में,सेवा में,सौ बीगा जमीन के बाद हम गरीब थे| आज सौ गज जमीनमें बनी कोठी, अमीर होने का न्यौता देती हैं|जब पैसो की तंगी थी तब गहनों मालाओ से औरत सजी थी, आज रोल गोल्ड कोअमीरी कहते हैं| जब पीतल की थाली में खाना खाते थे तो गरीब कहे जाते थे| आजप्लास्टिक के बर्तन में खाकर अपने आप को धनी समझ रह



जिधर जिंदगी उधरी मौत।

जिधर जिंदगी उधरी मौत।आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, किसी को फुरसत कहाँ?सुबह की हड़बड़ी में पानी का टैंकर, गली में हॉर्न बजा रहा था।स्वच्छता अभियान के तहत, एक सावला लड़का झाडू लगा रहा था।मन कुंछित दबे पांव, मजदूर काम पर जा रहा था।मौत किसको कहाँ ले जाए? यह जाने वाले को पता न था।भागा वह भी था, भूखा पेट रोटी



प्रेगनेंसी में गैस बनने की समस्या से पाएं छुटकारा || Gas Problem During Pregnancy In Hindi

प्रेग्नंसी के दौरान महिलाएं बहुत नाजुक दौर से गुजरती हैं और इस दौरान उन्हें बहुत सी समस्याएं भी होती है. इनमें चक्कर आना, थकावट, अपच, कब्ज या फिर गैस की समस्या हो जाती है. गैस की समस्या से गर्भवती महिला की तकलीफ और भी बढ़ जाती है और इससे उन्हें दर्द भी ज्यादा होता है और प्रेग्नेंट महिलाओं में ऐसी सम



ओला बौछार

ओला बौछार काले घने बादल जब अपनी जवानी मे आते हैं आसमान मे।जमीन मे मोर पपीहा खूब इतराते हैं, नृत्य करते हैं आसमान को निहार कर, कल वह भी बौरा गए ओला वृष्टि को देख कर। कल शहरी लोग पहले खूब इतराए ओलो को देख कर फिर पछते सड़क मे जब निकले ऑफिस से कार पर। किसान खुश था पानी की धार को देखकर वह भी पछताया गेंहू



"देशज गीत" सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल नजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइल

"देशज गीत" सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइलनजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइलरचिको न सोचल झुराइ जाइ लौकीकोहड़ा करैला घघाइल छान चौकीबखरिया के हूर राजा दूर काहें गइल..... सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइलकहतानि आजा बिहान होइ कइसेझाँके ला देवरा निदान होइ कइसेनगरिया के झूठ सैंया फूर काहें कइल..... सजरिया स



राजधानी में खरीदा जाता है कूड़े के लिए किराये का बचपन -Street children in Delhi

बच्चों का नाम जहाँ आता है वहां बचपने की एक तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है, पर बदलते समय के साथ इस बचपन की तस्वीर धुंधली होती जा रही है। रोज़ाना हम सड़कों पर कूड़ा उठाते बच्चों को देखते हैं और उन्हें देखते ही हमारे ज़हन में बाल मजदूरी का ख़्याल आता है, पर मांजरा यहां कुछ औ



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