मेरी परछाई

मेरी परछाई हरदम साथ चली।हर गांव शहर गली गली ।जो थे मेरे कर्म या थी कोई डगरमिलकर गले पल-पल साथ चलीं।मैं झुका संग झुकी मैं गिरा वह भी गिरकरहर इरादे में साथ चली।मेरी परछाई..............तन्हा सफर हो या रोशन रातेंसंग दूर तलक चली।सत्य की राह हो या हो मिथ्य पथ।बेबस बे जुबां चली।मेरी परछाई ..…............क



मैं भी देख दीवानी बन गई हूं

ए हमदम मेरे और दीवाने मेरे मैं भी देख दीवानी बन गई हूं मुहब्बत का तेरी ऐसा असर है हरी बेल सी आज मैं तन गई हूं मेरा मोल समझा ना पहले किसी ने मुझको फकत एक नाचीज समझा तूने मोल मेरा है जब से बताया अब तो मैं अनमोल बन धन गई हूं अकेली थी जब तो हिम्मत नहीं थी चारो तरफ नाग लहरा रहे थे जब से मिला है तेरा साथ



झंकार

अगर प्यार होता नहीं मेरे मन में तो कैसे मैं इसका इकरार करती कितना भी चाहे तू मुझको लुभाता इसका ना हरगिज मैं इजहार करती औरत के मन में बसे गर ना कोई उससे वो फिर दूरियां है बनाती फिर भी अगर कोई पीछा करे तो ऊंची मैं छिपने को दीवार करती राहों में तेरी पलके बिछा कर बैठी हूँ कब से तुझे देखने को अगर मेरे दि



जादू

वो जादू है मुहब्बत में जवां जो मन को करता है ना जाने फिर भी क्यों इंसान प्रीति धन को करता है बोल वो प्यार के तेरे समां जाते हैं नस नस में लहू सा बन के फिर ये प्रेम शीतल तन को करता है मुहब्बत की आस पाले नाचते मोर को देखो मोरनी से मिलन को प्यार वो इस घन को करता है मुहब्बत के वार से ही उसने दुनिया हरा



गजल



मैं भटकता रहा

*गहराई की छिपी वर्जनाओं के स्वर*( "स्वयं पर स्वयं" से ) मैं भटकता रहामैं भटकता रहा; समय, यूं ही निकलता रहा; मैं भटकता रहा। उथला जीवन जीता रहा;तंग हाथ किये, जीवन जीता रहा। न किसी को, दिल खोल कर अपना सका;न किसी का, खुला दिल स्वीकार कर सका;न आपस की, दूरी मिटा सका;न सब कु



फूलों में भी, काँटों में भी

नमस्कार,स्वागत है आप सभी का यूट्यूब चैनल "मेरे मन की" पर|"मेरे मन की" में हम आपके लिए लाये हैं कवितायेँ , ग़ज़लें, कहानियां और शायरी|आज हम लेकर आये है वसीम महशर सौरिखी जी का सुन्दर गजल "फूलों में भी, काँटों में भी "|आप अपनी रचनाओं का यहाँ प्रसारण करा सकते हैं और रचना



दुनिया नहीं कुछ मुझे देने वाली

नमस्कार,स्वागत है आप सभी का यूट्यूब चैनल "मेरे मन की" पर|"मेरे मन की" में हम आपके लिए लाये हैं कवितायेँ , ग़ज़लें, कहानियां और शायरी|आज हम लेकर आये है कवियत्री रेखा जी का सुन्दर गीत "दुनिया नहीं कुछ मुझे देने वाली"|आप अपनी रचनाओं का यहाँ प्रसारण करा सकते हैं और रचनाओं



अभिव्यक्ति मेरी: मैं आग को पीता गया बस आजमाने के लिये

खुद की मौत पर तन्हा था मैं, मांतम मनाने के लिये।केवल ओठ ही हिलते है, अब बस गुनगुनाने के लिये।।हालांकि मेरे हाथ से, गिर कर जो टूटा काँच सा,अरमान ही तो था मेरा, बस मुस्कुराने के लिये।।उस शाम की महफिल में ,बस दो चार ही तो लोग थे,मैं था , मेरे ग़म थे, दो आंसू बहाने के ल



ऋतु बदली नहीं आप की साथियाँ॥ गजल

“गज़ल”आप के पास है आप की साखियाँ मत समझना इन्हें आप की दासियाँगैर होना इन्हें खूब आता सनम माप लीजे हुई आप की वादियाँ॥कुछ बुँदें पिघलती हैं बरफ की जमी पर दगा दे गई आप की खामियाँ॥दो कदम तुम बढ़ो दो कदम मैं बढूँइस कदम पर झुलाओ न तुम चाभियाँ॥मान लो मेरे मन को न बहमी बुझो देख



गजल, बे-वजह की यह जलन तपते तपाते क्यों

बह्र - २१२२ २१२२ २१२२ २,कफिया- आते, रदीफ-क्यों...."गजल"चाह गर मन की न होती तो बताते क्योंआह गर निकली न होती तो सुनाते क्योंआप भी तकने लगे अनजान बीमारीबे-वजह की यह जलन तपते तपाते क्यों।।खुद अभी हम तक न पाए भाप का उठनाकब जला देगी हवा किससे छुपाते क्यों।।शोर इतना तेज था विधन



“गजल” ख्वाब आँखों में दिखा तो भा गया

मापनी- 2122 2122 212 “गजल”ख्वाब आँखों में दिखा तो भा गयामौसम बिना बादलों के आ गयायाद तेरी थी घिरी घर छा गईनैन मेरे खुल गए तक ता गया॥खूब थी वो रात आ ढ़लने लगी भोर का है कारवाँ चलता गया॥लोग भी आकर मिले पादान पर पर न थी रौनक गिला बढ़ता गया॥ एक दिन वह शाम जब ढलने लगी दिख गया उनका महल कहता गया॥ क्या ह



एक गज़ल

विलायत गया न वकालत पढ़ी है।चेहरों पे लिक्खी इबारत पढ़ी है।पढ़ी हैं किताबें, मगर बेबसी में लगाकर के दिल, बस मुहब्बत पढ़ी है।न कर जुल्म इतने के सब्र टूट जाये मेरे भी दिल ने बग़ावत पढ़ी है ।मुनाफे से कम कुछ न मंजूर इसको दुनिया उसूल-ए-तिज़ारत पढ़ी है | मुस्कुराये लब, तो ख



“गजल” मतलब की दुनिया के खैर तो देखो

“गजल” चहलकदमी के नपे पैर तो देखो सुबहो शाम दस्तकी शैर तो देखो गिनते हैं रिश्ते कई पीढ़ियों तक मतलब की दुनिया के खैर तो देखो॥ भरे आए थे खाली होकर चल दिए अपने सरीखे मिले गैर तो देखो॥ मन में रखते हैं सजाए नूर नजर वक्त आने पर उपजे कैर तो देखो॥ जानकर प



माना जाएगा

न भागना ,न कोई बहाना काम आयेगा । मुश्किलों से सिर्फ टकराना काम आयेगा । लोग जहनी हैं, बहुत इल्म है जमाने में । होगा जो सही इस्तेमाल ,माना जायेगा । फुर्सत किसी को वक्त की मोहलत होगी । दिल को करार आयेगा तो, माना जायेगा ।



गर रख लो जायदाद

दो पल सुकून के नहीं ,गर रख लो जायदाद ,पलकें झपक न पाओगे ,गर रख लो जायदाद ,चुभती हैं अपने हाथों पर अपनी ही रोटियांखाना भी खा न पाओगे ,गर रख लो जायदाद . ................................................................. क्या करती बड़े घर क



“गजल/गीतिका”

समांत-आन, पदांत- देखे हैं, मात्रा भार-26 “गजल/गीतिका” उठता ही रहा ऊपर सदा अरमान देखे हैं बहता जहाँ पानी झुके आसमान देखे हैं दिखे पाँव कीचड़ में बचा करके निकल जाते उठ छींटे भी रुक जाते मजहब मान देखे हैं॥ घिसते रहे घिर मैल जमी फूल की प्



“गजल/गीतिका”

मापनी-122 122 122 12, काफिया-आया, रदीफ़- सनम........ “गजल/गीतिका” तुझे प्यार करना न आया सनम तुने दिल खिलौना बनाया सनम तुझे क्यूँ न जाने सुहाई पलक नयनों ने नयना मिलाया सनम॥ वफा बेवफा की अलग है व्यथा बताओ कि क्या कह बुलाया सनम॥ सुनाओ तनिक र



गजल/गीतिका

मात्रा भार- 28.....गजल/गीतिका देता हूँ इक पुष्प जिसे गुलदस्ते में रख देना सिंचा मैंने इसे जतन से न परदे में ढँक देना अरमानों से भरी हुई कोमल पंखुड़िया इसकी मधुर सुगंधित खुश्बू है आहें उस में मत देना।। चंचल हैं निश्छल नैना खेल े खाए बचपन



“गजल”

काफ़िया- री, रदीफ़- अगी, मात्रा- भार-22 मुझको लगती भली मेरी दीवानगी चाहे दुनिया कहे इसको आवारगी छाए मौसम सुहाने मेरे बाग में कब मिली पाक ऋतुओं री परवानगी॥ धुंध उठने लगी है रुख हवाएँ चली आँधियाँ भी चलेंगी ये खरी वानगी॥ लोग रुकते कहाँ हैं अब किसी के लिए हर निगाहों में दिखती उभरी हैवानगी॥



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