ग़ज़ल

ग़ज़ल

फन्ना हुई कस्ती मेरी,मेरे आसूओं मे डूबकर,कुछ इस क़दर इश्क़ में रुलाया गया हूँ मैं...https://merealfaazinder.blogspot.com/2019/07/blog-post_73.html



खबर लो

मधुर मिलन की है आस मन में कोशिश जरा तो कर लो मुझको लगाओ सीने से अपने बाहों के बीच भर लो ये जिंदगी है कुछ पल का मेला सोचो ना हद से ज्यादा औरों की सुन के देखो ना हरदम सूनी कोई डगर लो दिल में छुपा के कब तक रखोगे मन जो भी कह रहा है अधरों के बीच तुम भी सनम ए मेरी ही सांस धर लो इंसान हो तो इंसा रहो ना भगव



जो बात छिपाये हो तुम होठों में कहीं ,आज नैनों को सब कहने दो न ा

जो बात छिपाए हो तुम होठों में कहीं , आज नैनों को सब कहने दो न , कई जन्मों से प्यासी है ये निगाहें , आज मेरी जुल्फों में ही रह लो न ा एक लम्हा जो नहीं कटता तेरे बिन ,उम्र कैसा कटेगा तुम बिन वो साथिया ,छ



लफ्ज का मरहम

मन की हर बात करने का मेरा मन तुझसे करता हैतेरे हर लफ्ज का मरहम मेरी पीड़ा को हरता हैमेरी झोली किसी के प्यार से महरूम थी अब तकतू दोनों हाथों से इसको सदा हँस हँस के भरता हैतू मेरे साथ है जब से मुझ को चिंता नहीं रहतीतन्हा इंसान ही बस हर समय गैरों से डरता हैअलग इंसान होते हैं फ़कत कातिल ज़माने मेंये जज्बा



आब के जैसा

तू जब भी पास होता है समय ये थम सा जा हैतेरी बातों में मेरा मन अचानक रम सा जाता हैदर्द मेरे भी दिल में था सुकूँ पर ना दिया रब ने मिला है तू मगर जब से हुआ ये कम सा जाता हैमिला जो तू मुकद्दर से खुशी इतनी मिली मुझकोये आंसू आँख को मेरी करे अब नम सा जाता हैमुहब्बत में लहू बन के तू जो नस नस में आ बैठा



मेरा सहारा

तेरी आवाज़ ही अब तो बनी मेरा सहारा हैहजारों फूल खिलते हैं तूने जब भी पुकारा हैतू मेरी सांस बनके इस तरह जीवन में छाया है तेरे बिन ज़िन्दगी का अब नहीं होता गुजारा हैमुझे कड़वे सचों ने ज़िन्दगी के तोड़ डाला था मेरी उजड़ी सी हस्ती को फ़कत तूने निखारा हैबसी हूँ जब से पलकों में वहीं महफूज़ हूँ हरदम



उसूल

सोचा किए जो वो ना हुआ कुछ तो बात हैदिन का समय भी आएगा गर आज रात हैआज वो ऊँचा भी है और डालियां हैं संग पर जमीं पे एक दिन गिरता ये पात हैकोशिशें करता है जो वो जीत जाएगा वक्त से हर शै को तो मिलती ही मात हैअब क्या करें शिकायतें उस इंसान से यहाँजिसके लहू में बह रहा बस एक घात हैज़िन्दगी मधुकर चले बस निज उ



मेरी फितरत

मुझे तू प्यार करता है तो मैं सिमटी सी जाती हूँखुशी से झूम उठती हूँ लाज संग मुस्कुराती हूँमेरे मन में उमंगों का बड़ा सा ज्वार उठता हैमगर मैं हाले दिल तुमको नहीं खुलकर बताती हूँमेरे हर क़तरे क़तरे में तेरी छवियां समाई हैमगर न जाने क्यों मैं प्यार अपना न जताती हूँनज़र लग जाए न अपनी मुहब्बत को कभी जग की



नाव

जिसे तुम ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा प्यार करते होझिझक को छोड़ कर पीछे उसे बाँहों में भरते होज़मीं का साथ पाकर ही शज़र पे रंग आता हैचुकाने को कर्ज थोड़ा फूल तुम उस पे झरते होतेरे सीने से लगने की तमन्ना दिल में रहती हैमेरी हर एक पीड़ा तुम बड़ी शिद्दत से हरते होमुझे उन राहों पे चलने से हरदम मान मिलता है



लाचारी

मिलन की आरजू पे डर ज़माने का जो भारी हैतेरी मेरी मुहब्बत में अजब सी कुछ लाचारी हैदोस्तों दोस्ती मुझको तो बस टुकडों में मिल पाईबड़ी तन्हा सी मैंने ज़िन्दगी अब तक गुज़ारी हैभले तुम अजनबी से अब तो मुझसे पेश आते होतेरी सूरत ही मैंने देख ले दिल में उतारी हैभुलाना भी तुम्हें अब तो कभी आसां नहीं लगता मेरे



कयास

कोई रिश्ता फ़कत इक नाम से ना खास होता हैमुहब्बत जो भी बांटेगा वो दिल के पास होता हैपरेशां मन जो रहता है गैर दोषी नहीँ इसके मेरे घर में ही कुछ खामी है ये एहसास होता हैबात कितनी करे कोई अगर उल्फ़त नहीं दिल मेंदूरियों का हर समय बीच में आभास होता है कोई गैरों की पूजा में ही



सुगंध

मुहब्बत जिससे होती है सुगंध एक उसमें आती हैउसे पाने की चाहत फिर जो बस मन में जगाती हैये चेहरा कुछ नहीं दिल से जुड़ा एक आईना समझोजो मन में चल रहा है बस वो ही सूरत दिखाती हैचाह जिसकी करी वो ही तो देखो ना मिला मुझकोज़िन्दगी की ये सच्चाई तन्हा मेरे दिल को दुखाती हैछवि महबूब की जिसने बसाई हो फ़कत दिल में



इबादत सी मुहब्बत

चाह तुझसे मिलन की जब तलक सीने में जिंदा हैबड़ा बेचैन सा रहता मेरे मन का परिंदा हैमुहब्बत को बनाया पर सही ना साथ मिल पायापरेशां इस जमीं पर देख लो हर इक बाशिंदा हैचोट सीने पे लग जाए बिखर जाती हैं खुशियां भी कोई बनता है फिर साधू कोई बनता दरिंदा हैप्रेम होता नहीं सबको प्रेम की बातें हैं सारी हर इक रिश्त



हश्र

नज़रें चुरा ली आपने देख कर ना जाने क्योंमन में हम बसते हैं तेरे बात अब ये माने क्यों जानते थे जब ज़माना ख़ुदगर्ज होता है बहुत चल पड़े तेरी मुहब्बत फिर यहाँ हम पाने क्यों कुछ हश्र देखा है बुरा चाहत का इतना दोस्तोंसोचते हैं ये ह



ज़िंदगी की राह

था मुकद्दर सामने पर भूल हम से हो गईज़िंदगी की राह भटके मुस्कुराहट खो गई झूठ का पहने लबादा साथ में वो आ गया मन में मेरे बात उसकी बस ज़हर सा बो गई रोशन करेंगे रास्ता सोचा जली मशाल सेइस शमा की रोशनी भी ज़िंदगी से लो गई साथ आएगा कोई तो कुछ नया होगा



पास हो तुम

पास हो तुम दिल के इतने कैसे मैं तुमको छोड़ दूँजिसमें हैं बस छवियां तेरी वो आईना क्यों तोड़ दूँअविरल धार स्नेह की जो बहती है जानिब तेरेइसका रुख क्यों गैरों के मैं कहने भर से मोड़ दूँ प्रेम का रिश्ता ये हरगिज़ ख़त्म हो ना पाएगातू कहे तो एक नाम देकर सम्बन्ध अपना जोड़ दूँहाथ कोई गर तुझे छूने की हिम्मत भ



कर्मों के फल

किसी के प्रेम की देखो राह अब भी मैं तकता हूँमेरी उम्मीदें टूटी हैं मगर फिर भी ना थकता हूँमेरे दिल में ज़रा झांको जख्म अब ही हरे होंगे बड़ी शिद्दत से मैं उनको गैर लोगों से ढकता हूँमुहब्बत की प्यास मेरी ना मिटने पाई है अब तकएक दो जाम पीने से फ़कत मैं तो ना छकता हूँमेरे दिल का दर्द देखो यूँ ही कम हो ना पा



प्रीत के बिन

तुम्हारी प्रीत के बिन तो बड़ा मुश्किल ये जीना हैमुझे तो ज़िन्दगी का जाम नज़र से तेरी पीना हैना मेरे मर्ज को समझा ना मेरे दर्द को समझाबड़ी बेरहमी से तुमको उन्होंने मुझसे छीना हैदिन भी लम्बे हुए हैं कुछ और तू पास ना आए मेरे किस काम का खिलता बसन्ती ये महीना हैमेरी उजड़ी सी दुनिया देख वो ही मुस्कुराएगापतंग



जन्मों का नाता

कोई तो बात है तुझ में तू इतना याद आता है इक तेरा प्यार ही मुझ में उमंगों को जगाता है कई जन्मों का नाता है सदा मुझको लगे ऐसामुहब्बत वरना कोई इस तरह थोड़ी लुटाता हैमुझे महसूस होता है कोई ना झूठ है इस मेंअपनी पलकों पे तू ही फ़कत मुझको बिठाता हैमुहब्बत के सिवा मैं तो तुझे कुछ दे नहीं पाईमेरे नखरों को



दीवारें

दर्द ए दिल का मज़ा लेना है थोड़ी चोट तुम खा लो पास हो के भी जो बस दूर हो इक ऐसा सनम पा लोमुकद्दर साथ ना दे गर मुहब्बत मिल ना पाएगीप्रेम गीतों को अपने दिल से चाहे लाख तुम गा लोदीवारें मन में खिंच जाएं तो वो गिरती नहीं पल मेंलाख कोशिश करोगे चाहे तुम कि उनको अब ढा लोअगर खुल के ना बरसोगे बहारें कैसे आएंगी



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