भक्तों ने पुकारा और मैया चली आई...

भक्तों ने पुकारा और मैया चली आईभक्तों ने पुकारा और मैया चली आईदर्शन देकर के मैया आपन कृपा बरसाई......जब-जब नवरात्रि आई, माई के दरबार सजाईघर में ही दरबार लगाई, स्वागत में मंगलाचार गाई....माँ के दरबार में..आज मंगलाचार है..सबका स्वागत सत्कार हैहो रही जयजयकार है माँ अंबे का सत्कार हैमाता भवानी आई हैं सं



मधुमास गीत

गीतमधुमास के दिनों की, कुछ याद आ रही है।महकी हुई फिजाएं, मनको लुभा रही है।जब फूल-फूल तितली, खुशबू बिखेरती थी।महकी हुई हवाएं, संवाद छेड़ती थी।कोयल सदा वनों में, हैं राग प्रीत गाये।मौसम वही सुहाना, मुझको सदा लुभाये।महकी हुई धरा मन, मेरा लुभा रही है।मधुमास के दिनों की, कुछ याद आ रही है।भौंरे क



लिखूँगा

उठाया है क़लम तो इतिहास लिखूँगामाँ के दिए हर शब्द का ऐहशास लिखूँगाकृष्ण जन्म लिए एक से पाला है दूसरे ने उसका भी आज राज लिखूँगापिता की आश माँ का ऊल्हाश लिखूँगा जो बहनो ने किए है त्पय मेरे लिए वो हर साँस लिखूँगाक़लम की निशानी बन जाए वो अन्दाज़ लिखूँगाकाव्य कविता रचना कर



आत्मतत्त्व से ही समस्त चराचर की सत्ता

आत्मतत्व से ही समस्त चराचर की सत्ताप्रायःसभी दर्शनों की मान्यता है कि जितना भी चराचर जगत है, जितना भी दृश्यमान जगत है – पञ्चभूतात्मिका प्रकृति है –उस समस्त का आधार जीवात्मा – आत्मतत्त्व ही है | वही परम तत्त्व है और उसी कीप्राप्ति मानव जीवन का चरम लक्ष्य है | किन्तु यहाँ प्रश्नउत्पन्न होता है कि आत्म



गीता और देहान्तरप्राप्ति

गीता औरदेहान्तरप्राप्तिश्राद्ध पक्ष में श्रद्धा के प्रतीक श्राद्ध पर्व काआयोजन प्रायः हर हिन्दू परिवार में होता है | पितृविसर्जनीअमावस्या के साथ इसका समापन होता है और तभी से माँ दुर्गा की उपासना के साथ त्यौहारोंकी श्रृंखला आरम्भ हो जाती है – नवरात्र पर्व, विजयादशमी,शरद पूर्णिमा आदि करते करते माँ लक्



गीत (आज बसंत की छाई लाली)

गीत (आज बसंत की छाई लाली)आज बसंत की छायी लाली,बागों में छायी खुशियाली, आज बसंत की छायी लाली॥वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।आज बसंत की छायी लाली॥1॥इस बसंतने किये प्रदान हैं उनको नूतन पल्लव।चहल पहल में बदल गया अब उनका ज



खुदको बदल पाओगी

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा। आज जान हो कल अंजान हो जाओगी। मेरे घर के हर कमरे की मान थी, अब मेहमान कहलाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या खुद को बदल पाओगी। आज अम्बर धरती झील नदिया सब पूछते है जहाँ कल तक दोनो का नाम दिखाया करती थी, क्या अब उनकी भी खबर रख पाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या रिश्त



तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना

कल मिलने आइ वो,मेरा पसंदीदा पकवान लाई वो।हम दोनो बहुत सारी बातें किये,उसकी और मेरे नयन ने भी मुलाक़ातें किए।अचानक से पूछी मुझसे.ये बताओ, मुझमे और इश्क़ में क्या अंतर हैं?मैंने कहाँ, तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना,तु ख़्वाब है और वो है सपना।अब वो नाराज़ हो गईं,रोते-रोते मेरे हाई कँधो पर सो गईं



शब्द रूचि

मैं शब्द रूचि उन बातों की जो भूले सदा ही मन मोले-2अँगड़ाई हूँ मैं उस पथ का जो चले गए हो पर शोले-2हर बूँदो को हर प्यासे तक पहुँचाने का आधार हूँ मैं-2मैं बड़ी रात उन आँखो का जो जागे हो बिना खोलें-2जो कभी नहीं बोला खुल कर वो आशिक़ की जवानी हूँ।-2मीरा की पीर बिना बाँटे राधा के श्याम सुहाने हैं।-2



गैरों से बातें

जा मिल कर उनसे मोहब्बत की बातेंतु ख़ुश है उसके साथ तो तेरा क्या करे हम बात तुझे ऐहशास क्या होगा मेरे दिल पर जो बिता वो विश्वास क्या होगा किसी को मत तड़पा इतना डर मुझे लगता है कही तुझे हुआ तो वो अवकाश क्या होगा



नाम क्यूँ नहीं लेते

लोग कहते हैं तुम नाम क्यूँ नहीं लेते...!!!मैंने कहा छोड़ो यारों मैंने उन्हें छोड़ दिया इससे ज़्यादा और क्या इल्ज़ाम देते...!!!



गीता और जैन दर्शन

पर्यूषण पर्व चल रहे हैं, और आज भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण की परा शक्ति श्री राधा जी का जन्मदिवस राधा अष्टमी भी है – सर्वप्रथम सभी को श्री राधाअष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...गीता गायक भगवान श्री कृष्ण... पर्यूषण पर्व के



गीतिका

कोरोना है साहब, दो मीटर की दूरी बनाएं रखें और मास्क पहनना न भूलें।"गीतिका" सोचता हूँ क्या जमाना फिर नगर को जाएगाजिस जगह से भिनभिनाया उस डगर को जाएगाचल पड़े कितने मुसाफिर पाँव लेकर गांवों मेंक्या मिला मरहम घरों से जो शहर को जाएगा।।रोज रोटी की कवायत भूख पर पैबंदियाँजल बिना जीवन न होता फिर को जाएगा।।बं



गीतिका

"गीतिका" नदियों में वो धार कहाँ से लाऊँराधा जैसा प्यार कहाँ से लाऊँकैसे कैसे मिलती मन की मंजिलआँगन में परिवार कहाँ से लाऊँ।।सबका घर है मंदिर कहते सारेमंदिर में करतार कहाँ से लाऊँ।।छूना है आकाश सभी को पल मेंचेतक सी रफ्तार कहाँ से लाऊँ।।सपने सुंदर आँखों में आ जातेसचमुच का दीदार कहाँ से लाऊँ।।संकेतों क



भोजपुरी, होली गीत

"होली गीत" होरी खेलन हम जईबे हो मैया गाँव की गलियाँसरसों के खेतवा फुलईबे हो मैया गाँव की गलियाँ।।रंग लगईबें, गुलाल उड़ेईबें, सखियन संग चुनर लहरैबेंभौजी के चोलिया भिगेईबें हो मैया गाँव की गलियाँ.....होरी खेलन.....पूवा अरु पकवान बनेईबें, नईहर ढंग हुनर दिखलईबेंबाबुल के महिमा बढ़ेईबें हो मैया गाँव की गलिय



दोहा गीतिका

"दोहा गीतिका"री बसंत क्यों आ गया लेकर रंग गुलालकैसे खेलूँ फाग रस, बुरा शहर का हालचिता जले बाजार में, धुआँ उड़ा आकाशगाँव घरों की क्या कहें, राजनगर पैमाल।।सड़क घेर बैठा हुआ, लपट मदारी एकमजा ले रही भीड़ है, फुला फुला कर गाल।।कहती है अधिकार से, लड़कर लूँगी राजगलत सही कुछ भी कहो, मैं हूँ मालामाल।। सत्याग्रह



दोहा गीतिका

"दोहा गीतिका"मुट्ठी भर चावल सखी, कर दे जाकर दानगंगा घाट प्रयाग में, कर ले पावन स्नानसुमन भाव पुष्पित करो, माँ गंगा के तीरसंगम की डुबकी मिले, मिलते संत सुजान।।पंडित पंडा हर घड़ी, रहते हैं तैयारहरिकीर्तन हर पल श्रवण, हरि चर्चा चित ध्यान।।कष्ट अनेकों भूलकर, पहुँचें भक्त अपारबैसाखी की क्या कहें, बुढ़ऊ जस



गीत

अब अब देश का मौसम तुम्हें मैं क्या बताऊँ , जब हवा भी कुछ बोलनेसे डर रही है | भोर तो आती यहाँ हर रोज लेकिन , फूलकोई भी तनिक हँसत



बनारस की गली में

बनारस की गली में दिखी एक लड़की देखते ही सीने में आग एक भड़की कमर की लचक से मुड़ती थी गंगा दिखती थी भोली सी पहन के लहंगा मिलेगी वो फिर से दाईं आंख फड़की बनारस की गली में... पुजारी मैं मंदिर का कन्या वो कुआंरी निंदिया भी आए ना कैसी ये बीमारी कहूं क्या जब से दिल बनके धड़की बनारस की गली में... मालूम ना श



जैसे सब कुछ भूल रहा था

नेत्र प्रवाहित नदिया अविरल,नेह हृदय कुछ बोल रहा था।तिनका-तिनका दुख में मेरे,जैसे सबकुछ भूल रहा था।अम्बर पर बदरी छाई थी,दुख की गठरी लादे भागे।नयनों से सावन बरसे थाप्यासा मन क्यों तरस रहा था।खोया-खोया जीवन मेराचातक बन कर तड़प रहा था।तिनका-तिनका दुख में मेरेजैसे सब कुछ भ



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