हाल



शरद ऋतु

🌹सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक🌹"""""""""""""""""""""""दस्तक देती शरद ऋतु , मन मुखरित उल्लास ।जूही की खुशबू उड़े, पिया मिलन की आस।।आस किसी की मैं करूँ , जो ना आएं पास ।बाट निहारें दृग विकल टूट रहा विश्वास ।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



"रविवार का सृजन (टूटता परिवार)"

*गुम हो गए संयुक्त परिवार**एक वो दौर था* जब पति, *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर* घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था । पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे । बाऊजी की बातों का.. *”हाँ बाऊजी"* *"जी बाऊजी"*' के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया



एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...

मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँएक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँकाटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता और माथे के तिलक तो साथ रखता नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेताहै मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँएक सौदागर हूँ ...धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा हैदौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है यूँ नहीं



"दोहावली" नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर। हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।

"दोहावली"नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर।हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।-1नतमस्तक यह देश है, आप दिए बलिदान।गर्व युगों से आप पर, करता भारत मान।।-2रुदन करे मेरी कलम, नयन हो रहे लाल।शब्द नहीं निःशब्द हूँ, कौन वीर का काल।।-3राजनयिक जी सभा में, करते हो संग्राम।जाओ सीमा पर लड़ो, खुश होगी आवाम।।-4वोट



जीवन

जिंदगी एक धारा है. जब बहता रहें तो स्वच्छ निर्मल और पारदर्शक रहता है . जब लयबद्द और संगीतमय हो तो आनदं के परम सीमा में रहती है और हमें उसी दिशा में अपने जीवन को बहते ले जाना है ताकि अंत में परमात्मा स्वरूपी महासागर में विलय होजाये .



"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं। क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।

"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं।क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।रावण का जलाना भी नासूर बन गया-दृश्य आँखों में जख़्म जल प्रपात बने हैं।।-1देखन आए जो रावण सन्निपात बने हैं।कुलदीपक थे घर के अब रात बने हैं।त्योहारों में ये मातम सा क्यूँ हो गया-क्या रावण के मन के सौगात बने हैं।।-2महातम मिश्र,



किसान

दिन भर सूरज से बाते करता , खुद भूखा रहता हे फिर भी कर्मरत - हे वह निरंतर दिन भर तपता ,सूरज की गर्मी में देखता - क्या दम सूरज में की दे दे वो शाम को दो दाने वो ान के भर दे शायद वो पेट उनका भी जो - बैठे हे एकटक बाट ज़ोह किसी अपने की (ये ऐसी केसी ह



शेर

बेशक आग लगेगी हमारे घर उसकी आंच से चमड़ी तुम्हारी भी पिघलेगी



महालया - पितृ विसर्जनी अमावस्या

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यह लम्हा फिलहाल जी लेने दे - फिलहाल

ये लम्हा फिलहाल जी लीन डी गीत ऑफ फिलहाल (2002): यह तब्बू, सुष्मिता सेन, संजय सूरी और पलाश सेन अभिनीत फिलाल का एक प्यारा गीत है। यह आशा भोसले द्वारा गाया जाता है और अनु मलिक द्वारा रचित किया जाता है।फिलहाल (Filhaal )यह लम्हा जी लेने दे की लिरिक्स (Lyrics Of Yeh Lamha Filhaal Jee Lene De )ए ज़िन्दग



सोलह सिंगार करके गाड़ी भरै ले - फिलहाल (वारि जवान)

Solah Singar Karke Godi Bharai Le Lyrics of Filhaal (2002): This is a lovely song from Filhaal starring Tabu, Sushmita Sen, Sanjay Suri and Palash Sen. It is sung by Jaspindar Narula and Palash Sen and composed by Anu Malik.फिलहाल (Filhaal )सोलह सिंगार करके गाड़ी भरै ले (वारि जवान)की लिरिक्स (Lyri



फिलहाल (Filhaal )

'फिलहाल' एक 2002 हिंदी फिल्म है जिसमें तब्बू, सुष्मिता सेन, संजय सूरी, पलाश सेन, आकाश खुराना, शिवाजी सतम, सुहासिनी मुलाय, सविता प्रभाषण, कमल चोपड़ा, सुप्रिया मुखर्जी, सुषमा प्रकाश और मिनल पटेल प्रमुख भूमिका निभाते हैं। हमारे पास फिलहाल के 2 गाने गीत हैं। अनु मलिक ने अपना संगीत बना लिया है जसपिंदर ना



पी. के., श्री कुन्हालीकुट्टी - लोकसभा सदस्य

निर्वाचन क्षेत्र -मलप्‍पुरम (केरल)दल का नाम -इंडि‍यन यूनि‍यन मुस्लिम लीग (आई.यू.एम.एल. )ईमेल -pkk[AT]indkerala[DOT]comजन्म की तारीख -मलप्‍पुरम (केरल)उच्चतम योग्यता -इंडि‍यन यूनि‍यन मुस्लिम लीग (आई.यू.एम.एल. )शैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता -01/06/1951व्यवसाय -स्थायी पता -वर्तमान पता -



चन्‍द्र , श्री निहाल चौहान - लोकसभा सदस्य

निर्वाचन क्षेत्र -गंगानगर (SC) (राजस्‍थान)दल का नाम -भारतीय जनता पार्टी ( भा.ज.पा.)ईमेल -nihalchand[AT]gmail[DOT]comजन्म की तारीख -04/02/1971उच्चतम योग्यता -स्नातकशैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता -बी.ए., श्री नेहरु एस.पी. सांध्‍य महाविद्यालय (बीकानेर विश्‍वविद्यालय) से शिक्षा ग्रहण कीव्यवसाय -कृष



‘ सांख्यिकी दिवस ’ (29 जून)

भारत के महान सांख्यिकीविद और वैज्ञानिक प्रशांत चंद्र महालनोबिस की आज 125वीं जयंति (29 जून) के मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है । सांख्यिकी की फील्ड में अपने योगदान के चलते प्रशांत चंद्र महालनोबिस आज भी याद किए जाते है । महालनोबिस का जन्मदिवस 29 जून सांख्य



काश

काश भ्रष्टाचार न होता ,फिर भलों का दिल न रोताकानून ढंग से काम करता, काश भ्रष्टाचार न होता। लोकतंत्र भ्रष्ट न होता, रिश्वत का तो नाम न होता संसद ढंग से काम करता काश भ्रष्टाचार न होता।होता चहुँ और निष्पक्ष विकासफैलता स्वतं



“मुक्तक” हाल हर पंक्षी उड़ता॥

“मुक्तक”होता रहा उत्थान जगत का ऐसे वैसे। मानवता को राह मिली पग जैसे तैसे। देख जी रहा वक्त शख्त सुरताल लगाकर- सुनो भी अपने गीत मीत मन कैसे कैसे॥-१ अभ्युदय जिया मान खान पर पान मचलता। होगी लाल प्रभात मनुज सूरा तन तपता। इतराए दिन रात सिरात भोर मन मैना- मिला कदम की ताल



मेरी मधुशाला

कभी जो अधरों से पिलायी थी तुमने प्रेम हाला अभी भी उस खुमारी में झूमु मैं होकर मतवाला ना मंदिर में ना मस्जिद में दिखे मुझे दुनिया बनाने वाला मेरा तो तू ही रब तू ही मेरा शिवाला मधु रस में डूबे सभी पर तू ही मेरा प्रेम प्याला तू ही साकी मेरा तुम ही हो हाला ज



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