माध्यम की भाषा

माध्यम की भाषा (1)जिस कार्य-क्षेत्र में उपयोग में आती रहे जो भाषा; उस क्षेत्र केलिए विकसित होती रहती वो भाषा। काम केलिए उपयोग में न लाएं निज-भाषा; फिर क्यों कहें विकसित नहीं हमारी निज भाष।।(2)व्यक्तिगत क्षमता, सामूहिक क्षमता में; सार्वजनिक रूप में, सरकारी काम में;भ



विपरीत के विपरीत

विपरीत के विपरीत कुछ-कुछ लोग कुछ-कुछ शब्दों को भूल गए, बिसर गए;हमारे पास शब्द हैं, उपयुक्त शब्द हैं, पर कमजोर शब्द पर आ गए। कुछ-कुछ शब्दों के अर्थ भी भूल गए, बिसर गए;और गलत उपयोग शुरू हो गए;मैं भी इन कुछ-कुछ लोगों में हूं, हम जागरूकता से क्यों दूर हो गए।।अनिवार्य है,इस विपरीत धारा के विपरीत जाना;भाष



क्या भात से चावल बनता है ?

भूमिका : जब हम महान उद्देश्य लेकर चलते हैं, महान अभियान पर चलते हैं;बड़े महत्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करने केलिए हम सब मिलजुल कर आगे बढ़ते हैं;तब हम उद्देश्य प्राप्ति केलिए संवाद करते हैं। तब हम वास्तविकता से जुड़ते जाने केलिए संवाद करते हैं;जीवन को अच्छा बनाने केलिए संवाद



"बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" पर हिंदी की 11 सर्वश्रेष्ट कवितायेँ - Top 11 Hindi poems empowering Beti Bachao Beti Padhao aandolan

भारत में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” (Beti Bachao Beti Padhao) एक अति महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दा है | बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं पर कविताओं और नारों के जरिए न केवल सरकार बल्कि आम आदमी भी अपनी बात को लोगों के समक्ष रख रहे है, जिससे समाज में फ़ैली कुरीतियां जैसे कन्याभ्रूण हत्य



निज भाषा

विशेष : आओ हिंदी भाषा को लेकर कुछ चर्चा करें, हिंदी की सेवा करें।** निज भाषा ** (1) - ( प्रस्तावना )मैं हि



निदा फ़ाज़ली -दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती In Hindi

Hindi poem -Nida Fazliदिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलतीदिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलतीख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलतीकुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैंहर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलतीदेखा था जिसे मैंने कोई और था शायदवो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलतीहँसते हुए चेहरो



निदा फ़ाज़ली -नयी-नयी आँखें In Hindi

Hindi poem -Nida Fazliनयी-नयी आँखें नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता हैकुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है ।मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैंजिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है ।मेरे आँगन में आये या तेरे सर पर चोट लगेसन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है ।च



निदा फ़ाज़ली -कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे In Hindi

Hindi poem -Nida Fazliकभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगेकभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगेवो बदन जब भी सजे कोई नया ख्वाब लगेएक चुप चाप सी लड़की, न कहानी न ग़ज़लयाद जो आये



निदा फ़ाज़ली - कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता In Hindi

Hindi poem -Nida Fazliकभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलताकभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलताकहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोलेये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलतातमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न होजहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलताकहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखेंछतें



जावेद अख़्तर - बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का Poem in Hindi

बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का - जावेद अख़्तर Poem in Hindi बहाना ढूंढ़ते रहते हैं कोई रोने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीन भिगोने का अगर पलक पर है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का जो फसल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई



ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा - जावेद अख़्तर Poem in Hindi

ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा - जावेद अख़्तर Poem in Hindi ज़िंदा हो तुम - जावेद अख़्तर दिलों में अपनी बेताबियाँ ले कर चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम नज़र में ख्वाबों की बिजलियाँ ले कर चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम हवा के झोंकों के जैसे आज़ाद रहना सीखो तुम एक दरिया के जैसे लहरों में बहना सीखो हर एक लम्हे से तुम मिलो खोल



ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा - जावेद अख़्तर Poem in Hindi

ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा - जावेद अख़्तर Poem in Hindi दिल आखिर तू क्यूँ रोता है ?जब जब दर्द का बादल छाया जब गम का साया लहराया जब आंसूं पलकों तक आये जब ये तन्हां दिल घबराया हमे दिल को यूँ समझाया दिल आखिर तू क्यूँ रोता है?दुनिया में यूँही हो



हिंदी कविता | Best Hindi Poems | Hindi Poetry | Poems In Hindi | Hindi Kavitayein | हिंदी काव्य | Poets

हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ एवं गीत. Best Hindi Poems के इस संग्रह में हम लेकर आये है हिंदी कवितायेँ , हिंदी काव्य, हिंदी गीत, ग़ज़ल ।कविता एक ऐसी प्रयोजनीय वस्तु है जो संसार के सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है. जब इतिहास न था, न विज्ञान था और न ही दर्शन तब भी कुछ थी तो वो थी कवितायेँ | कवि



रामधारी सिंह “दिनकर”-परिचय

Ramdhari Singh Dinkar - Hindi poem परिचय – रामधारी सिंह “दिनकर”सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैंस्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैंबँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैंनहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैंसमाना चाहता, जो बीन उर मेंविकल उस शून्य की झंकार हूँ मैंभटकता खोजता हूँ, ज्



रामधारी सिंह “दिनकर”- बालिका से वधू

Ramdhari Singh Dinkar - Hindi poem बालिका से वधू – रामधारी सिंह “दिनकर”माथे में सेंदूर पर छोटीदो बिंदी चमचम-सी,पपनी पर आँसू की बूँदेंमोती-सी, शबनम-सी।लदी हुई कलियों में मादकटहनी एक नरम-सी,यौवन की विनती-सी भोली,गुमसुम खड़ी शरम-सी।पीला चीर, कोर में जिसकेचकमक गोटा-जाली,चली पिया के गांव उमर केसोलह फूलों



रामधारी सिंह “दिनकर”-कलम, आज उनकी जय बोल

Ramdhari Singh Dinkar - Hindi poem कलम, आज उनकी जय बोल – रामधारी सिंह “दिनकर”जला अस्थियाँ बारी-बारीचिटकाई जिनमें चिंगारी,जो चढ़ गये पुण्यवेदी परलिए बिना गर्दन का मोलकलम, आज उनकी जय बोल।जो अगणित लघु दीप हमारेतूफानों में एक किनारे,जल-जलाकर बुझ गए किसी दिनमाँगा नहीं स्नेह मुँह खोलकलम, आज उनकी जय बोल।पी



रामधारी सिंह “दिनकर”-हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

Ramdhari Singh Dinkar - Hindi poem हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों – रामधारी सिंह “दिनकर”कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो।श्रवण खोलो¸रूक सुनो¸ विकल यह नादकहां से आता है।है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे?वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है?जनता की छाती भिदेंऔर तुम नींद करो¸अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूँगा।त



कुमार विश्वास की कवितायेँ - Kumar Vishwas poems in Hindi

डॉ.कुमार विश्वास “कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है”कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी 1970 को पिलखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डॉ. चन्द्रपाल शर्मा आर एस



सूरज पर प्रतिबंध अनेकों - कुमार विश्वास

Hindi poem - kumar vishwas सूरज पर प्रतिबंध अनेकों सूरज पर प्रतिबंध अनेकों और भरोसा रातों परनयन हमारे सीख रहे हैं हँसना झूठी बातों परहमने जीवन की चौसर पर दाँव लगाए आँसू वालेकुछ लोगों ने हर पल, हर दिन मौके देखे बदले पालेहम शंकित सच पा अपने, वे मुग्ध स्वयं की घातों परनयन हमारे सीख रहे हैं हँसना झूठी ब



उनकी ख़ैरो-ख़बर नही मिलती - कुमार विश्वास

Hindi poem - Kumar vishwasउनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलतीहमको ही खासकर नहीं मिलती शायरी को नज़र नहीं मिलतीमुझको तू ही अगर नहीं मिलती रूह मे, दिल में, जिस्म में, दुनियाढूंढता हूँ मगर



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