हुई

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साफ्ट कॉर्नर

लघुकथासाफ्ट कॉरनर " मैं जानती हूँ कि आपके दिल में मेरे लिये एक खास किस्म का साफ्ट कॉरनर है परन्तु मेरे लिये आप एक अच्छे और शायद सच्चे दोस्त हैं ,इसके अलावा कुछ नहीं । इसे ही मान लिजिये प्लीज क्योंकि उसी नाते मैं आपको ,अपनी कोई भी बात बड़ी बेबाकी से कह लेती हूँ । " शिखा ने अपनी चिर परिचित मासूमीयत



"गीतिका”भोर हुई निकलो साजन महके री बगिया

छंद- लीला, समांत- इया अपदांत विधान- २४ मात्रा के इस छंद में १४ १० पर यति तथा पदांत में सगण (११२) का विधान है"गीतिका”भोर हुई निकलो साजन महके री बगिया हाथ पाँव भी झटकारो आलस क्यों खटिया बहुत रात्रि तक जागते नाक रोज बजती सोते हो तुम देर तलक खेंच अब चदरिया॥बिन हर्रे बिना फिटक



"गीतिका" आज कहाँ गुम हुई री गुंजा झलक दिखलाती नहीं गलियारों में।।

"गीतिका"काश कोई मेरे साथ होता तो घूम आता बागों बहारों मेंबैठ कैसे गुजरे वक्त स्तब्ध हूँ झूम आता यादों इशारों में पसर जाता कंधे टेक देता बिछी है कुर्सी कहता हमारी हैराह कोई भी चलता नजर घूमती रहती खुशियाँ नजारों में॥प्यार करता उन दरख्तों को जो खुद ही अपनी पतझड़ी बुलाते हैं आ



भागी हुई लड़की

सुबहका समय था. राजू सोया पड़ा था कि तभी किसी नेउसे झकझोर कर उठाया. राजू आँखे मलते हुए उठ गया. सामने मामी खड़ी थीं. मामी ने हांफते हुए कहा,“तुम्हे पता है रात छबीली घूरे के साले के साथ भाग गयी.” राजू ने आँखे मिचमिचा कर देखा कि कहीं वो सपना तो नही देख रहा है. राजू मामी से बोला, “किसने बताया आपको?”मामी



गीतिका- चाह हुई की मिल आऊँ खुद जाकर अपने बापू से

पितृ दिवस पर आदरणीय पिता जी को सादर समर्पित एक रचना, समान्त- अने, पदांत- बापू से, मात्रा भार- 30......"गीतिका" चाह हुई की मिल आऊँ खुद जाकर अपने बापू से पकड़ चला हूँ अंगुली जिनकी लेकर सपने बापू से बहुत लुटाया बहुत जुटाया उनकी भरी तिजोरी ने देख तो आऊँ कोना कतरा अब के कह



"नाबूद हुई कालर"

काव्य रचना......."नाबूद हुई कालर" चूहे ने फिर से कुतर दिया टंगे हुए कुरते की कालर कहीं कतरन कहीं झालर मिला जमात को एक नया ब्यूटीपार्लर घूर रहे, घूम रहे, चिढ़ रहा कुर्ता चूहों ने जिसका बना दिया भुर्ता।। पगरखे को दबोच लिया शाम को, गली के एक कुत्ते ने उधर पड़ा है छुपा



फटी हुई चादर

ठण्ड रात थीउनकी चादर फटी हुई थी,चादर कंप कंपा रही थी,कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रहीथी.बस सिर्फ चादर फटी हुईथी,गहरी अँधेरी रात थी,ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठथी....रात जितनी लंबी थी, उससेभी ज्यादा लंबी हो रही थीचादर फटी हुई थी...नींद आँखों में होते हुएभी ठंडे तारों को देख रहीथी...



उत्तम क्षमा, सबको क्षमा, सबसे क्षमा

उत्तम क्षमा, सबको क्षमा, सबसे क्षमाक्षमावाणी पर्व का अपना एक अलग ही महत्व होता है। क्षमा पर्व हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है।अपने मन में क्रोध को पैदा न होने देना और अगर हो भी जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना। अपने भीतर आने वाले क्रोध के कारण को





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