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मेरी अभिलाषा

अभिलाषा हैं मेरी,भ्रष्टाचार मिटा दूं पुरे देश से;अभिलाषा हैं मेरी,स्वच्छ कर दूं पूरे देश को;महाशक्ति बना दूं विश्व में,यही मेरी अभिलाषा;खेलों में बना दूं देश को सिरमौर,यही है मेरी लालसा;उद्योगों में कर दूं आत्मनिर्भर,बस यही है कामना;संयुक्त राष्ट्र संघ का हो जाये स्थायी सदस्य,यही करता हूं प्रभु से प



कोई हमें पढ़ाने क्यों नहीं आता ...?

वह अपनाबस्ता लेकर उचक- उचक कर उन कच्चे रास्तों के आगे बनी अपनी पाठशाला के दरवाज़े पर टकटकीलगाए देख रही थी । वह मुस्कुराकरबुदबुदाई – कितना अच्छा लगता था ,स्कूल जाना ! पता नहीं कब खुलेगा .....?अरी बिटिया,कहाँ चली गई....? माँ की आवाज़ सेवह बस्ता एक तरफ़ रख कर ,रसोई में जाकर, बेमन से, माँ की मदद करने लगी ।



दिल का एनालिसिस

एक दिन मैं ऐसे ही बैठा था कि एक ख्याल आया,आखिर ये दिल भी क्या चीज है।क्यों ना इस पर रिसर्च किया जाए।वैसे मैं आपको बता दूं मेरे ऐसे फालतू विषयों पर कई रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं।जैसे ही मैंने फालतू विषय बोला ,सारे दिल वाले नाराज हो गए।क्या दिल फालतू विषय है,क्या तुझमें दिल नाम की कोई चीज नहीं ह



महत्वाकांक्षा

किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा ,उसकी प्रगति का आयाम होती है; महत्वाकांक्षा ना हो किसी व्यक्ति की,तो उसका विकास अधूरा है;एक पेट्रोल पंप कर्मचारी की महत्वाकांक्षा,बन गई दुनिया की बहुत बड़ी कंपनी;धीरूभाई अंबानी की आकांक्षा जल्दी ही बदल गई,आज है वो रिलायंस कंपनी।महत्वाकांक्षा व



सेक्स पावर बढ़ाने के कुछ प्राकृतिक तरीके

सेक्स पावर को बनाए रखने और बढ़ाने में व्यायाम बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



महिल

जिसकी अपनी महत्ता है।



गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर की एक रचना का अंश

मै अनेक वासनाओं को प्राणपन से चाहता हूँ;तूने मुझे उनसे वंचित रख, बचा लिया.तेरी यह निष्ठुर दया मेरे जीवन के कण कण में व्याप्त है.तूने आकाश, प्रकाश, देह, मन, प्राण बिना मांगे दिए हैं.प्रतिदिन तू मुझे इस महादान के योग्य बना रहा है;अति इच्छा के संकट से उबार कर...मित्रों , अर्थात अपने आप को अति इच्छा के



कुछ पल और रुक ए -ज़िंदगी



मृगतृष्णा का जाल बनता गया.........

भावनाओं का चक्रव्यूह तोड़ स्मृतियों के मकड़जाल से निकल कच्ची छोड़,पक्की डगर पकड़ लालसाओं के खुवाओं से घिराभ्रमित मन का रचित संसार लिए.....रेगिस्तान में कड़ी धूप की जलधारा की भांति सपनें पूरे करने......चल पड़ा एक ऐसी डगर.......अनजानी राहें,नए- लोग चकाचौंध की मायावी दुनियां ऊँची-ऊँची इमारतों जैसे ख्वाब हकीक



"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "दुःख"

"दुःख" "अपूर्ण इच्छाओं की सूक्ष्म , रंध्रयुक्त पेटिका है जो समय-समय पर रिसती रहती है , निकलती इच्छायें दुःख रूपी अनुभव में परिणीत होती हैं""एकलव्य



"चरखा" 'कविता'

हे ! वरदानीतुम आनबसो !मेरे अंदर वो प्राण भरो ! कायर होता,मैंमन ही मनवीर सा तुमउत्कर्ष भरो ! हे ! मानव रक्षकअभिमानीविश्वास भरो !आभास भरो ! चित्त को पावन अब कर दो ! तुम अमृत वाणी ! कुछ कहके तुमजीवन का मार्गप्रशस्त्र करो !हे ! वरदानीतुम आनबसो !मेरे अ





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