अभिलाष

जीवन के मधु प्यास हमारे, छिपे किधर प्रभु पास हमारे?सब कहते तुम व्याप्त मही हो,पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?नाना शोध करता रहता हूँ, फिर भी विस्मय में रहता हूँ,इस जीवन को तुम धरते हो, इस सृष्टि को तुम रचते हो।कहते कण कण में बसते हो,फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?सक्त हुआ मन निरासक्त पे,अभिव



मानव जीवन की सार्थकता

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *श्री राधे कृपा हि सर्वस्वम* 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲 *जय श्रीमन्नारायण*🦚🦜🦚🦜🦚🦜🦚🦜🦚 *जीवन रहस्य*🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 यह जीवन परमपिता परमेश्वर ने कृपा करके हमें प्रदान किया जिसे पाने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं जितने भी सजीव शरीर हैं उनमें मानव शरीर की महत्ता सबसे अधिक



क्या सीखें रामायण में वर्णित शबरी प्रसंग से

त्याग, संघर्षपूर्ण जीवन, नि: स्वार्थ सेवा और निष्काम भक्तिरामायण और रामचरित मानस में भगवान श्रीराम की वनयात्रा में माता शबरी का प्रसंग सर्वाधिक भावपूर्ण है। भक्त और भगवान के मिलन की इस कथा को गाते सुनाते बड़े-बड़े पंडित और विद्वान भाव विभोर हो जाते हैं। माता शबरी का त्याग और संघर्षपूर्ण जीवन, नि: स्व



प्रार्थना का सबसे सरल रूप

प्रार्थना जितनी सरल होती शायद ही कुछ इतना सरल हो, मैं यहाँ पर उतने ही कम शब्दों में और इसके बारे में कहना चाहूँ की प्रार्थना जितनी निःशब्द रहे उतनी सरल और तेज प्रभाव वाली होती है। शब्दों में कमी रह सकती है मगर निःशब्द प्रार्थना बहुत कुछ कहती है।वैसे प्रार्थना निवेदन करके ऊर्जा प्राप्त करने की शक्ति



21 जनवरी 2019

सब कुछ पवित्र के रूप में देखने का जादू।

जब हम सुबह उठते हैं, हम में से बहुत से लोग अपने फोन या कंप्यूटर पर स्वचालित रूप से चले जाते हैं और ऑटोपायलट पर हमारी ऑनलाइन दुनिया के माध्यम से पढ़ना, संदेशों की जांच करना, चीजों की प्रतिक्रिया देना और चलना शुरू कर देते हैं।हम अपने दिन को इस तरह से गुजारते हैं, हम जितना बेहतर कर सकते हैं, तनाव से नि



संभवना

इससे फर्क नहीं पड़ता,तुम कितना खाते हो?फर्क इससे भी नहीं पड़ता,कि कितना कमाते हो?फर्क इससे भी नहीं पड़ता, कि कितना कमाया है?फर्क इससे भी नहीं पड़ता,कि क्या क्या गंवाया है?दबाया है कितनों को,कुछ पाने के लिए.जलाया है कितनों को,पहचान बनाने के लिए.फर्क इससे नहीं पड़ता,कि दूजों को



धर्म की सत्यता

जिनका विश्वास ईश्वर में है वो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में विश्वास नहीं रखते, जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च में विश्वास रखते है वो ईश्वर में नहीं राजनीती में विश्वास रखते है. ईश्वर के नाम पर दंगे नहीं होते, दंगे धर्म



पूजा का सच्चा अर्थ

पूजा, उपासना जो बिना स्वार्थ के किया जाए, बिना किसी फल की इच्छा से किया जाए, जो सच्चे मन से सिर्फ ईश्वर के लिए किया जाए वो पूजा सात्विक है , सात्विक लोग करते है. जो पूजा किसी फल की प्राप्ति के लिए की जाये, अपने शरीर को कष्ट द



भक्ति

मैं उस ईश्वर की भक्ति करता हूँ जो सर्व शक्तिमान है, उस ईश्वर की नहीं जिसे मेरी ज़रूरत पड़े अपना घर( मंदिर) बसाने की. क्या करूंगा मैं उसकी भक्ति कर जिसकी रक्षा मुझे करनी पड़े, मैं तो उस की भक्ति करता हूँ जो मेरी रक्षा करे.



हर भगवान करते हैं, अलग-अलग जानवरों की सवारी, इसके पीछे हैं कई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

देवताओं को प्रसन्नकरना हों तोउनका पूजन वाहनोंके साथ हीकरना चाहिए। पुराणॊंमें वर्णित हैकि देव पूजनके साथ साथदेवताओं के वाहनपूजन का भीअपना महत्व है।हिन्दू धर्म शास्त्रकहते है किदेवताओं के वाहनहमें बहुत कुछसीखाते है, भारवहन और सहनशक्तिहमें ऊंटों सेसीखनी चाहिए। श्रीगणेशवाहन मूषक हमेंभूमि से जुड़ीजानकारी



मौत का ज़हर है फिज़ाओं में, अब कहाँ जाके सांस ली जाए ...

जम्मू-कश्मीरके कठुआ और उत्तर-प्रदेश के उन्नाव की वहसी घटनाएँ जब से प्रिंट/मीडिया और समाचार पत्रों में नित नए रूप में आ रही है तथा अनेक खुलासे हो रहे है, तबसे अधिकतर बुरे विचारों ने ही मन को घेर लिया है और सोचने के लिए विवश है कि, अपने साथ यदि ऐसा हो जाए तो क्या



ईश्वर का अस्तित्त्व.... राज को राज़ रहने दो !!!

“भगवान या ईश्वर ” है या नहीं ? इस विषय पर अनादिकाल से वाद-विवाद चलता हुआ आ रहा है किन्तु इस चर्चा का आजतक कोई सर्वमान्य ठोस जवाब नहीं मिला है । इस बाबत न तो पौराणिक ग्रन्थों, न ही आधुनिक वि ज्ञान के पास कोई भी ठोस सबूत अथवा जवाब है । अधिकतर लोग मानते है कि,’भगवान’



हिंसा

आज से लगभग 200 साल पहले हमारे रतले खानदान में भैंसें की बलि दी जाती थी.. नवदुर्गा में!!कुछ समय बाद भूरे कद्दू पर सिंदूर मलकर तलवार से काटा जानें लगा,भैंसें के प्रतीक के रूप में।और इस तरह हमारे परिवार में अंत हुआ पशुबलि की प्रथा का।हिन्दू भी कुछ कम नहीं है, यह कहना होगा!!आ



मैं वही रहना चाहती हूँ जो ईश्वर ने मुझे बनाया

मैं अर्जुन नहीं होना चाहती गुरु द्रोण से एकलव्य को लेकर प्रश्न अर्जुन की प्रतिभा को कम करता है यदि अर्जुन की ईर्ष्या एकलव्य को निरस्त कर गई तो उसके कुशल धनुर्धर होने पर दाग भी बन गईद्रोण ने गुरु के नाम पर पक्षपात कियाअपनी मूर्ति के लिए दक्षिणा की माँग करके एकलव्य का अंगूठा लिया .... मैं द्रोण भी नही



जीवन "ईश्वर की महिमा "

जीवन "ईश्वर की महिमा "हमें ईश्वर की महिमा को प्रकट करने के लिए पैदा किया गया है, जो हमारे भीतर है| यह हममें से सिर्फ कुछ लोंगो मैं नहीं है ; यह तो हर एक मैं है| हम ही अपने विकल्पों द्वारा स्वयं को निर्धारित करते हैं ( की हम कहाँ है )। सिर्फ इंसानो मैं ही आत्मा -जागरूकता होती है इस बात से फर्क नहीं प



ईश्वर का न्याय

कुछ शिष्य अपने गुरु जी के साथ एक जंगल से गुजर रहे थे। रास्ते में एक बेर का वृक्ष दिखाई दिया । सभी शिष्यों ने सुनहरे बेर खाने की इच्छा प्रकट की । लेकिन बेर बहुत ऊंचाई पर लगे थे काँटों के कारण पेड़ पर चढ़ना भी कठिन था ।एक शिष्य ने गुरु जी से पूछा, “ गुरु जी, यह ईश्वर का कैसा न्याय ? बेर जैसा छोटा



11 मार्च 2015
09 मार्च 2015
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