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कैसे हो जाति और धर्म का नाश?

मैंने एक छोटी सी कहानी पढ़ी है । एक किसान था । उसके चार बेटे थे । समय आने पर उसने अपनी जमीन को चार बेटों में बाँट दिया । उसने अपने चार बेटों को एक बराबर जमीं प्रदान की थी । सोचा था चारो बेटे शांति से रहेंगे। एक आदमी बहुधा जैसा सोचता है , वैसा होता नहीं है। चारो बेटे एक स



जाति या मानसिकता?

जाती या मानसिकता © Vimal Kishore; September 2020 जाति या मानसिकता ? सबसे पहले तो मैं ये साफ कर देना चाहता हूँ कि इस लेखको पढ़ने से पहले जातिगत मानसिकता, वर्गीय विचारधारा या कोई भी जातिसूचक शब्द, अपने मस्तिष्क से अलग निकाल कर रखदें, क्योंकि मेरा इस लेख को लिखने काअभिप्रयाय ही इस भावना से प्रेरित है क



आगामी बिहार विधान सभा चुनाव और जातिवाद

आगामी बिहार विधान सभा चुनाव और जातिवाद।बिहार मे जातिवाद का वर्चस्व के लिए जिम्मेदार लोग लालू यादव को बताते हैं! और कुछ लोग का मानना है की लालू के बाद जातिवाद बिहार से खत्म हो गया लेकिन मेरा मानना है की ये कहने वाले ही सबसे बड़ा जातिवादी हैं।जातिवाद एक ऐसी वायरस है जिसमे सही और गलत का पहचानना आसान



मधुमाला चट्टोपाध्याय : सेंटिनल जनजाति ने जब पहली बार तीर- धनुष छोड़ ख़ुशी से किया एक बाहरी का स्वागत - Madhumala Chattopadhyay

मधुमाला चट्टोपाध्याय (Madhumala Chattopadhyay), सेंटिनल जनजाति की ज़मीन पर कदम रखना मतलब मौत को सीधा न्यौता , ऐसी जनजाति से दोस्ती का रिश्ता कायम करने वाली पहली महिला Madhum



जातियां और आज का भारत

आज के भारत में जातियां अस्तित्वहीन हो चुकी है। परन्तु राजनीति बांटने और वोट बैंक बनाने के लिये आज भी इसका भरपूर प्रचार कर रही हैं। इसे रोका जाना चाहिये। भारत सरकार को अब सरकारी फार्मों आदी से जाति का कॉलम हटा देना चाहिये। इसके स्थान पर केवल वर्ग जैसे - साम



जातिगत विभाजन

ऐसा प्रतीत होता है कि सवर्णो को सरकार ग्रांटेड के तौर पर ले रही है. जब माननीय उच्चतम न्यायलय ने अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के दुर्प्रयोग पर चिंता जाहिर करते हुए भारत के नागरिको के हित में अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उचित और समयानुकूल संशोधन किया था तब भ



जात

फक्र उनको है बता जात अपनी, शर्मिंदा हम है देख औकात उनकी.किया कीजियेगा अपनी इस जात का, मिलेगा तुम्हे भी कफ़न जो मिलेगा बे-जात को. (आलिम)



विश्व टाइगर दिवस

'विश्व बाघ दिवस' प्रत्येक वर्ष २९ जुलाई को सम्पू



“गीतिका” पेट भूख कब जाति देखती रोटी रगर विकार हरो॥

छंद लावणी मात्रा भार- ३०. (चौपाई १४). १६ ३० पर यति पदांत – आर समान्त- अरो“गीतिका”प्रति मन में भोली श्रद्धा हो ऐसा शुद्ध विचार भरो मानव का कहीं दिल न टूटे कुछ ऐसा व्यवहार करोजगह जगह ममता की गांछें डाली सुंदर फूल खिले समय समय पर इक दूजे को पीड़ाहर उपकार धरो॥ मत कर अब अ



जातिगत आरक्षण

सामान्य वर्ग की व्यथा पर कुछ पंक्तिया . मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिए..1.मेरी माँ का सपना है बेटा सरकारी अफसर बने,पिता दिन-रात मेहनत करके उस सपने को बुने, मेरे मात-पिता के सपनो को यू ना जलाइये, मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्ष



समता के मुँह पर तमाचा (ब्राह्मण रसोईया होने का ढोंग किया..., दर्ज हुई FIR)

जाति (caste) और उसमें भी क्रमिकऊँच-नीच के वर्ण !!! एक ईश्वर की संतान होने के बावजूद, भारतीय समाज में कुछ विशेषजाति के लोग तो विशेष काम ही कर सकते है अथवा कुछ विशेष कामों पर कुछ विशेष जातिका ही हक है अथवा कुछ काम विशेष विशेष जाति के द्वारा ही किए जाने चाहिए और दूसरेनही



लेख- किस दिशा में जा रहा समाज

इस सभ्यता को हुआ क्या है। कहीं हिंसात्मक माहौल है, कहीं बर्बरता की सीमा लांघा जा रहा है। क्या यहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था है। जिस समाज की सभ्यता और संस्कृति के रग-रग में आपसी भाईचारा और वसुुधैव कुटुम्बकम की भावना समाहित है। अगर उस समाज में बर्बरता और हिंसात्मक परिवेश अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। फिर यह



समस्याओं की जड़

क्या इस देश की तरक्की में सबसे बड़ी रूकावट जातिगत आरक्षण है ? है तो क्यों ? और नहीं तो क्यों ?



मोदी जी अब हमे एक ही वचन चाहिये

मोदी जी अब हमे एक ही वचन चाहिये अब उ.प्र. भी आरक्षण मुक्त होना चाहिये... ना कोई दलित ना कोई बनिया ना ही ब्राह्मण सारी जातिगत भेदभाव को मिटाईये अब उ.प्र. भी आरक्षण मुक्त होना चाहिये... शिक्षा पर सभी का समान हक होना चाहिये सामान्य भरे 500 तो अन्य के 100 नही होने चाहिये अब उ



राजनीति में दूर तक काम नहीं आता जातिगत जनाधार

जाति और राजनीति के हिसाब-किताब को देखें तो साफ हो जाता है कि पिछला दलित-पिछड़ों का उभार कोई लालू- नीतीश - मुलायम जैसे नेताओं का करिश्मा नहीं था, बल्कि वह जाति और राजनीति के रिश्तों की सहज उपज था। इन नेताओं ने उसी उभार की फसल काटी । जैसे जातिमें पैदा होने के लिए कुछ करना नहीं होता है। वैसे ही जाति की



मैं वापिस आऊंगा - सूरज बड़त्या

मैं वापिस आऊंगा - सूरज बड़त्या जब समूची कायनातऔर पूरी सयानात की फ़ौजखाकी निक्कर बदल पेंट पहन आपकी खिलाफत को उठ-बैठ करती-फिरती होअफगानी-फ़रमानी फिजाओं के जंगल मेंभेडिये मनु-माफिक दहाड़ी-हुंकार भरे....आदमखोर आत्माएं, इंसानी शक्लों में सरे-राह, क़त्ल-गाह खोद रहे होंसुनहले सपनों की केसरिया-दरियाबाजू खोल बुला



Social, economic and caste Census 2011

Social, economic and caste Census 2011





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