जाए

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बोझ

लघुकथाबोझक्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या बच्चे , सब के सब आधुनिकता के घोड़े पर सवार फैशन की दौड़ में भाग रहे थे और वह किसी उजबक की तरह ताक रहा था । गाँव से आया वह पढा लिखा आदमी, भूल से , एक भव्य माल में घुस आया था और अब ठगा-सा खड़ा था।उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी जो एक स्टील के बेंच पर बैठा था। उसके पास



ये माटी में मिल जाएगी=

ये माटी में मिल जाएगी,मिल जाएगी रे बन्दे कंचन काया कंचन काया,उस मालिक ने सब जीवो में तुझको सरेष्ठ बनाया है.मोह माया में फस कर तूने जीवन व्यर्थ गवाया है,सात कर्मो के खातिर तूने पाई है बन्दे कंचन काया,ये माटी में मिल जाएगी.....हर पल तेरी सांसे घटती जीवन एक जलमेला है,जगत जाल में आन फसा तू खुद को ऐसा बो



इतिहास ज्वलंत हो जाए

इतिहास ज्वलंत हो जाएदेश का इतिहास ज्वलंत हो जाए,आतंकवाद का जब अंत हो जाए।मनाएं हम सब मिल कर खुशियां,फिर तो हर ऋतु बसंत हो जाए।



"गज़ल" हाथ कोई हाथ में आ जाएगा मान लो जी साथियाँ भा जाएगा

बह्र 2122, 2122 212, काफ़िया, आ स्वर, रदीफ़- जाएगा"गज़ल" हाथ कोई हाथ में आ जाएगा मान लो जी साथियाँ भा जाएगालो लगा लो प्यार की है मेंहदी करतली में साहिबा छा जाएगा।।मत कहो की आईना देखा नहींनूर तिल का रंग बरपा जाएगा।।होठ पर कंपन उठे यदि जोर कीखिलखिला दो लालिमा भा जाएगा।।अधखुले है लब अभी तक आप केखोल दो मु



‘गज़ल” भीड़ का मजमा हुआ क्या कारवां हो जाएगा।।

‘गज़ल” वक्त को मिलने गया शय आसमां हो जाएगा छल गया उस जगह जाकर क्या खुदा हो जाएगाआप की नाराजगी है जो शहर भाती नहींफेर कर भागे नयन क्या आईना हो जाएगा॥ भूल थी अपनी जगह राहें गईं अपनी जगहआदमी है आदमी क्या हौसला हो जाएगा।।छल कपट अपना नहीं तो हम भला करते ही क्यूँदुख रहा है दिल



कहीं दाग दे न जाए क्यूँ कर हिला दिया, गजल-गीतिका

"गीतिका-गज़ल"चाय की थी चाहत गुलशन खिला दिया सैर को निकले थे जबरन पिला दियाउड़ती हुई गुबार दिखी दो गिलास मेंतीजी खड़ी खली थी शाकी मिला दिया।।ताजगी भर झूमती रही तपी तपेलीसूखी थी पत्तियाँ रसमय शिला दिया।।रे मीठी नजाकत नमकीन हो गई तूँचटकार हुई प्याली चुस्की जिला दिया।।उबलती रही



लघुकथा- सखी रे मोरा नैहर छूटा जाए

लघुकथा- सखी रे, मोरा नैहर छूटा जाए फूल लोढ़ने की डलिया हर सुबह, बसंती के हाथों में उछल- ककूदकर अपने आप ही आ जाती है मानों उसके नित्य के दैनिक कर्म में यह एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर समाहित हो गई है। उसकी दादी की पूजा में ताजे फूलों का भगवान के शर पर चढ़ना पूरे परिवार के लिए एक



"गज़ल, सनम गुमराह हो जाए

वज़्न- 1222 1222 1222 1222, काफ़िया- आह, रदीफ़- हो जाए "गज़ल" न जाने किस गली में कब सनम गुमराह हो जाए बहुत है राह में खुश्बू महक हमराह हो जाए दिवानों की अजब दुनियां बना लेते ठिकाने भी महफिलें खुद नहीं सजती पहल चरगाह हो जाए।। ठिकानों की हकीकत को भला रहगीर क्या जाने सरकती रात गुजरी है पहर परवाह हो



चलो कुछ लिखा जाए

हालांकि मैं कोई प्रोफेशनल लेखक या कवि तो नहीं, पर आपकी तरह लिखने का शौक स्कूल के समय से रखता हूँ। और आज भी कभी कभी बस यूं ही लिख लिया करता हूँ। करीब 10 - 12 साल पहले मैंने लिखना शुरू किया था, शुरुआत में कवितायें, शायरी, छोटे मोटे लेख इत्यादि लिखा करता था, पर मेरा दायरा सीमित था। मैं लिखता, और मेरे



सफ़र आसान हो जाए

गुमनाम राहो पर एक नयी पहचान हो जाए चलो कुछ दूर साथ तो, सफ़र आसान हो जाए|| होड़ मची है मिटाने को इंसानियत के निशान रुक जाओ इससे पहले, ज़हां शमशान हो जाए|| वक़्त है, थाम लो, रिश्तो की बागडोर आज ऐसा ना हो कि कल, भाई मेहमान हो जाए|| इंसान हो इंसानियत के हक अदा कर दो





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