आराध्य पिता जी

यह कविता मेरे आराध्य पिता जी को समर्पित:-देखो दिवाली फिर से कुछ, यादें लाने वाली है।पर तेरी यादों से पापा, लगती खाली-खाली है।।याद आता है पापा मुझ को साथ में दीप जलाना।कैसे भूलूँ पापा मैं वो, फुलझड़ियां साथ छुटाना।।दीपावली में पापा आप, पटाखे खूब लाते थे।सबको देते बांट पिता जी, हम सब खूब दगाते थे।।तेरे



बुद्ध की बात मानों और अपना दीपक स्वयं बनों....

अपना दीपक स्वयं बनोअपना दीपक स्वयं बनों…. कथन तो एकदम सरल है। पर सारगर्भित है। सोचिए जरा 'अपना दीपक स्वयं बनों ' कहने का तात्पर्य क्या है..? इस बात को अच्छी तरह से समझने के लिए चिंतन व मनन की आवश्यकता है। दीपक से रोशनी मिलती है, दीपक से अँधेरे का नाश होता है, दीपक से हमारा जीवन पथ प्रकाशित होता है,



हिंदी अध्यापक संघ मुंबई विभाग द्वारा महात्मा गाँधी जयंती के अवसर पर आयोजित वेब संगोष्ठी

महाराष्ट्र राज्य कनिष्ठ महाविद्यालय हिंदी अध्यापक संघ मुंबई विभाग द्वारामहात्मा गाँधीजी की जयंती के उपलक्ष्य में वेबसंगोष्ठी का आयोजन" महाराष्ट्र राज्य कनिष्ठ महाविद्यालय हिंदी अध्यापक संघ मुंबई विभाग द्वारा 'महात्मा गाँधीजी जयंती व शास्त्री जयंती के अवसर पर वेबसंगोष्ठी का आयोजन दिनांक 2 अक्टूब



बेटी की जाति नही।

बेटी की जाति नही।सारे जहाँ से अच्छा हिदुस्तान हमारा यह लाईन सुनने में भले ही सुंदर लगती हो। यह लाईन भी दिल को झकझोर देती है कि हमारी संस्कृति सबसे सर्वोपरि है। हमारे यहाँ बेटी की जाति नही होती यह समाज कहता है। लेकिन जैसे ही हमारे समाज में बेटी की जीभ काट दी जाती है, रीढ़ तोड़ दी जाती है, रेपकरके छोड़



चींटी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि में परमात्मा अनेक जीवों की रचना की है , छोटे से छोटे एवं बड़े से बड़े जीवो की रचना करके परमात्मा ने इस सुंदर सृष्टि को सजाया है | परमात्मा की कोई रचना व्यर्थ नहीं की जा सकती है | कभी कभी मनुष्य को यह लगता है कि परमात्मा ने आखिर इतने जीवों की रचना क्यों की | इस सृष्टि में जितने भी जीव हैं अप



किरायेदार

लघुकथाकिरायेदार" भैया ये छह पाईप हैं जो पास की दूकान पर ले चलने हैं , ले चलोगे ? " मैंने ई - रिक्शे वाले को रोककर कहा ।" जी, ले चलेंगे । "" बताओ किराया क्या लोगे ? " " सत्तर रुपए लगेंगे ।"" भैया , पचास लो । सत्तर का काम तो नहीं है । "" ठीक है , पचास दे दीजिएगा ।"" तो फिर लाद लो । "वो अपने काम पर



पथिक

(1)वो घर से निकला पीने को, मानो अंतिम पल जीने को।उसे अंतिम सत्य का बोध हुआ। मानो अंतिम घर से मोह हुआ।सोते बच्चों को जी भर देखा, सोती बीबी के गालों को चूमा,माँ-बाप को छूपकर देखा, चुपके सोते चरणों को पूजा।कुछ पैसे



जीवन का शाश्वत सत्य

हम सबने मानव जीवन पाया कुछ अच्छा कर दिखलाने को सब धर्म एक है ,एक ही शिक्षा फिर हम सब हैं इतने बेगाने क्यों जो दूसरों का है दुःख समझते दुःख रहता उनके पास नहीं औरों को हंसाने वाले रहते कभी उदास नहीं आचरण हमारा ही हम सबको हर ऊँचाई तक पहुंचाता है अगर यह दुराचरण बन जाये तो गर्त तक ले जाता है कष्ट उठाने स



हासिल

शीर्षक :- हासिलकभी – कभी बिन माँगें बहुत कुछ मिल जाता हैऔर कभी माँगा हुआ दरवाज़े पे दस्तक दे लौट जाता हैशायद इसी को ज़िन्दगी कहते हैंसब्र का दामन थाम कर यहाँ हर कोई यूं ही जिये जाता है …मिले न मिले ये मुकद्दर उसकाफिर भी कोशिश करना फ़र्ज़ है सबकाआगे उसकी रज़ा कि किसको क्या हासिल हो पाता है …कभी – कभी सब्र



जीवन दायिनी बारिश

खुशियों की बौछार,आनंद की फुहार लाती है ये बारिश;इंसान हो या पशु पक्षी, सभी में उत्साह का संचार करती ;पेड़ पौधों की मुस्कराहट,पर्वतों के झरने आबाद करती;पर्वतों पर फैली हरितिमा ,सब कुछ लाती है ये बारिश।चातक की लंबे समय से सूखे ,कंठ की प्यास बुझाती;मोर के नृत्य और कोयल क



जिंदगी को जिओ पर संजीदगी से....

जिंदगी जिओ पर संजीदगी से…….आजकल हम सब देखते हैं कि ज्यादातर लोगों में उत्साह और जोश की कमी दिखाई देती है। जिंदगी को लेकर काफी चिंतित, हताश, निराश और नकारात्मकता से भरे हुए होते हैं। ऐसे लोंगों में जीवन इच्छा की कमी सिर्फ जीवन में एक दो बार मिली असफलता के कारण आ जाती है। फिर ये हाथ पर हाथ रखकर बैठ जा



हक न सही जीने की आजादी दो।

हक न सही जीने की आजादी दो।देश की कोहनूर है बेटियाँ, इन्हें चुराया नही जाता।घर की शान है बेटियाँ बचाया और पढ़ाया जाता।वक्त आने पर बेटी किसी और के लिए सजाई जाती।एक और दुनियाँ बसाने के लिए दुल्हन बनाई जाती ।चीख़-चित्कार के झमेलों में क्यो फसाई जाती है बेटीयाँ?नूर और हूर होने के बावजूद क्यो छेड़ी जाती है ब



अयोध्या में भव्य श्री राम मन्दिर निर्माण

अयोध्या में भव्य राम मन्दिर निर्माण डॉ शोभा भारद्वाज “सत्ता श्री राम की ,डंका श्री राम की अयोध्या के सिंहासन पर विराजी खड़ाऊँ का” लगभग 500 वर्ष के संघर्ष के बाद अयोध्या में भव्य राम मन्दिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन होने जा रहा है | रा



जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर



तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……

तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……आए दिन हमें लोंगों की शिकायतें सुनने को मिलती है….... लोग प्रायः दुःखी होते हैं। वे उन चीजों के लिए दुःखी होते हैं जो कभी उनकी थी ही नहीं या यूँ कहें कि जिस पर उसका अधिकार नहीं है, जो उसके वश में नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मनुष्य की आवश्यकतायें असीम हैं….… क्योंकि



उपदेश सूत्र

*श्रीमते रामानुजाय नमः**श्रीगोदम्बाय नमः**चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां* *नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन् ।**रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति* *नोपसन्नान् कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान्*पहनने को क्या रास्तों में चिथड़े नहीं हैं? रहने के लिए क्या पहाड़ो की गुफाएँ बंद कर दी गयी हैं? अरे भाई !



हीरो

हर व्यक्ति अपनी जीवन का हीरो स्वयं होता है जीवन में कठिनाइयां न हो तो इंसान कि परख नहीं हो सकती अगर हम मुश्किलों से डर जाए और घबरा कर भाग्य को दोष देने लगें तो इससे उत्थान कैसे संभव है रावण के बिना राम राम न होते बिना कंस के आतंक के कृष्ण कृष्ण न होते



यादें

कुछ मीठी,कुछ खट्टी,कुछ कड़वी,कुछ रंगीन,कुछ बचपन की,कुछ जवानी की,कुछ संगीन।ये ही तो हैं वो यादें,जो भूले ना भुलायी जा सकी;कुछ यादें पूरी याद रही,याद रह गयी अधूरी बाकी।कुछ यादें तड़पाती है,कुछ प्रफुल्लित कर जाती है;यादें तो यादें हैं ,जो



मानव जीवन क्या है...

जीवन क्या है..? या मृत्यु क्या है..? क्या कभी आपने इसे समझने की चेष्टा की है..? नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ी। मनुष्य ऐसा ही है.. तो क्या सोच गलत है...जी बिल्कुल नहीं, ये तो मनुष्यगत स्वभाव है। जरा उनके बारे में सोचिए जिन्होंने हमें ज्ञान की बाते



शहर रौशन है तो गांवों के लोगो ने क्या जुर्म कर दिया!

शहर रौशन है तो गांवों के लोगो ने क्या जुर्म कर दिया!मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं हैं- रोटी,क पड़ा,मकान, हवा,पानी,ओैर रौशनी इनमें से एक भी न मिले तो इंसान का जीना दूबर हो जाता है. अगर यह बात देश में आने-जाने वाली हर सरकार पिछले तेहत्तर चौहत्तर सालों में भी समझ जाती तो शायद आज हमारे देश के गांवों की



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