मन मे कुछ और

मन मे कुछ और पहली हीनज़र मे दिया उसने धोखा।हम भी नकम थे उसीके गली मे,रख दियापान का खोखा।जब भीनिकलती वो अपनी गली से,नजरेलड़ाके वो, नज़रेचुराती वो।कभीइतराकर कभी मुस्कराकर,हमे वोजलाती, हमे वोजलाती।जाती कहाँथी? हमे न बताती,हम भी उसीकी यादों मे जलने लगे...पहली हीनज़र मे दिया



ग़ज़ल, किनारों को भिगा पाता कहाँ से नजारों को सजा जाता कहाँ से

जय नव दुर्गा ^^ जय - जय माँ आदि शक्ति -, वज़्न-- 1222 1222 122, अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— आया (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ --- कहाँ से....... ॐ जय माँ शारदा.....! 1 मुहब्बत अब तिजारत बन गई है 2. मै तन्हा था मगर इतना नहीं था "गज़ल"किनारों को भिगा पाता कहाँ सेनजारों को सजा जाता कहाँ सेबंद थ



“गीतिका” अजब आलसी हो जगाते कहाँ॥

मापनी- १२२ १२२ १२२ १२, समांत-आते, पदांत- कहाँ“गीतिका”बजाते मुरलिया सुनाते कहाँ निभाते कहाँ हो बताते कहाँ सलोने मुरारी गज़ब रागिनी गिराते कहाँ हो उठाते कहाँ॥ कभी तो कन्हाई समा बांधते कहाँ सम लगाते बिठाते कहाँ॥ सुनो मत जगाओ पहर रात कोभरोषा सुबह की दिलाते कहाँ॥भरे नींद नयना न खुलने दिया अजब आलसी हो जगात



"गीतिका" आज कहाँ गुम हुई री गुंजा झलक दिखलाती नहीं गलियारों में।।

"गीतिका"काश कोई मेरे साथ होता तो घूम आता बागों बहारों मेंबैठ कैसे गुजरे वक्त स्तब्ध हूँ झूम आता यादों इशारों में पसर जाता कंधे टेक देता बिछी है कुर्सी कहता हमारी हैराह कोई भी चलता नजर घूमती रहती खुशियाँ नजारों में॥प्यार करता उन दरख्तों को जो खुद ही अपनी पतझड़ी बुलाते हैं आ



कहाँ सुखद विश्राम मिला, मन नेह लगा ली है, गीतिका

“गीतिका”खुलकर नाचो गाओ सइयाँ, मिली खुशाली है अपने मन की तान लगाओ, खिली दिवाली है दीपक दीपक प्यार जताना, लौ बुझे न बातीचाहत का परिवार पुराना, खुली पवाली है॥कहीं कहीं बरसात हो रही, सकरे आँगन मेंहँसकर मिलना जुलना जीवन, कहाँ दलाली है॥होना नहीं निराश आस से, सुंदर अपना घर नीम छ



वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के

वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के, वो पल कहाँ राहत के !अब इंतेज़ार है और ख़्वाहिश है, वो निशान कहाँ हसरत के !!कभी सबको साथ लेकर चलने की आदत थी दोस्तो !अब ख़बर नहीं कहाँ है, वो फसाने लड़कपन के !!कभी चाहत पे दुनिया का हर



अब इतना दम कहाँ!

झुक गए हैं कंधे मेरे, अपनों का बोझ उठाते,सपनों का बोझ उठाऊं, अब इतना दम कहाँ!कण कण जोड़कर घरोंदा ये बनाया मैंने,तन-तन मोड़कर इसको सजाया मैंने।रुक गया हूँ, झुक गया हूँ, बहनों का बोझ उठाते,गहनों का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!परिवार की आशाओं में खुद को पिराया मैंने,बनकर छत उनकी सदा, खुद को भिगाया मैंने।अ



"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक है?"

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक है?" अति उत्तम, अति गंभीर व चिंतनशील विषय है "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक"। वाणी, प्रकृतिप्रदत्त एक ऐसा अनमोल खजाना है जिससे मानव सहित हर प्राणी अपने मन की भवनाओं को व्यक्त करता है। जन्म से ही इसका प्रादुर्भाव रोने से शुरू होता है औ



देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है...

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियहर पहर, हर घड़ी रहता है जागताबिना रुके बिना थके रहता है भागताकुछ नही रखना है इसे अपने पाससागर से, नदी से, तालाबो से माँगतादिन रात सब कुछ लूटाकर, बादलदाग काला दामन पर सहता यहाँ है||देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है...हर दिन की रोशनी रात का अंधेराजिसकी वजह से है सुबह का सवेराअगर र



कहाँ है मेक इन इण्डिया

हमारे देश के नेता लोग मेक इन  इण्ड़िया की बात करते है लेकिन ये बहुत दूर-दूर तक दिख हीनहीं रही है   रहीहै चाइना की भरमार है यहाँ तक देश के नेता भी चाइना का प्रयोग करते हैं कुछ दिन पहले योग दिवस पर मैटी भी चाइना की थी हर ओर चाइना ही चाइना क्यों नहो सस्ता जो है फिर बात किस चीज की कर रहे हो मेड़ इन इण्ड





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