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"गज़ल" निकला था सीप से कहीं मोती उठा लिया मैने भी आज दीप से ज्योती उठा लिया

बह्र- 221 2121 1221 212 यूँ जिंदगी की राह में मजबूर हो गए , काफ़िया- मोती, ओती स्वर, रदीफ़- उठा लिया"गज़ल" निकला था सीप से कहीं मोती उठा लियामैने भी आज दीप से ज्योती उठा लियाखोया हुआ था दिल ये किसी की तलाश मेंमहफिल थी द्वंद की तो चुनौती उठा लिया।।जलने लगी थीं बातियाँ लेकर मशाल कोमगरूर शाम जान सझौती उठा



विद्यार्थियों में गिरते जीवन मूल्य

कहते हैं जो विद्यार्थी शिक्षक का सम्मान नहीं करते उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं होता यह बात अब आई गई सी लगती है । आज विद्यार्थियों में गिरते मूल्यों का एक मुख्य कारण उनके स्वयं के अभिभावक है । ऐसा क्यों …? प्रताड़ित आज विद्यार्थी नहीं समस्त शिक्षक हैं जो देश का भविष्य निर्माण करते हैं इस विषय पर लिखने



कहीं दाग दे न जाए क्यूँ कर हिला दिया, गजल-गीतिका

"गीतिका-गज़ल"चाय की थी चाहत गुलशन खिला दिया सैर को निकले थे जबरन पिला दियाउड़ती हुई गुबार दिखी दो गिलास मेंतीजी खड़ी खली थी शाकी मिला दिया।।ताजगी भर झूमती रही तपी तपेलीसूखी थी पत्तियाँ रसमय शिला दिया।।रे मीठी नजाकत नमकीन हो गई तूँचटकार हुई प्याली चुस्की जिला दिया।।उबलती रही



कहीं भी कभी भी

मैं न यशोदा न देवकी मैं न राधा न रुक्मिणी न मीरा नहीं मैं सुदामा न कृष्ण न राम न अहिल्या न उर्मिला न सावित्री .......... मैं कर्ण भी नहीं नहीं किसी की सारथी न पितामह न एकलव्य न बुद्ध नहीं हूँ प्रहलाद ना गंगा न भगीरथ पर इनके स्पर्श से बनी मैं कुछ तो हूँ यदि नहीं - तो फिर क्यूँ लहराता है बोलता हुआ मौन





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