कई

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मैं तेरे साथ जी न सका ,अकेला मर तो सकता हूँ

मैं तेरे साथ जी नहीं सका, अकेलामर तो सकता हूँ डॉ शोभा भारद्वाज रिसेटेलमेंट कालोनी के छोटेप्लाट में बने चार मंजिला घर में हा –हाकार मचा था उस घर के जवान बेटे ने फांसीलगा ली थी घर का कमाऊ बेटा तीन भाई पाँच बहनों का भाई अंधे पिता ,बीमार माँ कासहारा जिसने भी सुना हैरान रह गया फांसी के बाद लम्बी गर्दन



कई दफ़ा

कई दफ़ाकाँधे पर हाथरखा करता थावो चुपके से आकर।हर तस्वीरमुकम्मल कर जाता था।उसने ही दिया थाएक सादा कैनवस,अटका हूँ बरसों से।कितने ही बरस बीत गए,अबकी आया ही नहीं।कैनवस, कलर्स, ब्रश,ईज़ल, पालेट सब उसके,ये तस्वीर मुकम्मल कर देतातो किसकी थी?खुशियाँ, मुस्कानेंवाह-वाह सब किसके थे?नहीं चाहिए नई पेंटिंगतो ये रंग





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