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.... जरा याद करो कुर्बानी

🔴 संजय चाणक्य '' ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी !!जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी !!''जश्न-ए-आजादी की 70 वी वर्षगाठ़ पर अपने प्राणों की आहुति देकर मां भारती को मुक्त कराकर इबादत लिखने वाले अमर शहीदों को सलाम! इन योद्वाओं को जन्म देने वाली जगत जनन



दक्खिन का दर्द

संजय चाणक्य " तेरा मिजाज तो अनपढ़ के हाथों का खत है! नजर तो आता है मतलब कहां निकलता है!!’’ मेरी नानी बचपन में कहती थी कि दक्खिन की ओर मुह करके खाना मत खाओं,दक्खिन की ओर पांव करके मत सोओं। गांव में बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि गांव के दक्खिन टोला में मत जाना। हमेशा सोचता था



संसार की सर्वश्रेष्ठ माँ तुम्हें शत शत नमन

"मा मुझे आपकी याद सताती है, मेरे पास आ जाओं ! थक गया हू मुझे अपनें आंचल में छुपा लो !! हाथ अपना फेरकर मेरे बालों में ! एक बार फिर से बचपन की लोरिया सुना दो !!’’ 27 जून बहुतेरो के लिए महज एक तारीख है। तमाम भाई-बन्धुओ के लिए यह तारीख खुशियों से भरा यादगार दिन है, इतिहास रचने वा



श्रीराम के बासी नदी को एक भागीरथ की दरकार

" बचाकर रखना बासी को जरूरत कल भी बहुत होगी।यकीनन आने वाली पीढ़ी इतनी पाक भी नही होगी।।" भगवान राम के इच्छा से नारायणी से निकलकर कुशीनगर जनपद के विभिन्न श्रेत्रो से होकर तकरीबन साठ किलो मीटर की यात्रा तय करने के बाद पुन: नारायणी से समाहित हो जाने वाली "बासी नदी "अपने अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत है



गरीब भारत रिच इण्डिया

"वक्त लिख रहा कहानी इक नए मजमून की !जिसकी सुर्खियों को जरूरत है हमारे खून की !!"अगर हम आपसे कहे कि आजाद हिन्दुस्तान के दो नाम है पहला गरीब भारत और दुसरा रिच इण्डिया तो शायद आप मुझे सिरफिरा कहेगें। या फिर अवसादग्रस्त । हो सकता है आप अपनी जगह पर सही हो। क्याोंकि आप वही



“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहा

मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहाहर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहाशब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहींखो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गईझुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा



"गीतिका"यह कैसा आया पहरा हैघर-घर में आँसू पसरा है

१६-८-१८ राष्ट्र के अनन्य भक्त लोकतंत्र के जीवंत प्रतिमूर्ति माँ भारती के महानतम सपूत माँ वीणा धारिणी के वरदपुत्र सर्व समाज के अभिवावक परम सम्माननीय पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न व पद्मविभूषण स्वर्गीय श्रीमान अतल बिहारी बाजपेयी जी कोसादर नमन भावपूर्ण श्रद्धांजलि स्वरूप समर्



कविता

क्यों रोते हो पथिक रहो चुप कहाँ गई तेरी दृढ निश्चय कहाँ गयी ये छुप



कविता---बिन साजन के सावन कैसा

बारिश की बूंदों से जलतीहीय में मेरे आज सुलगतीपीपल के पत्तो की फडफडजैसे दिल की धडकन धडधडचूल्हे पर चढ़ गयी कढाई दूरहुई दिल की तन्हाईलेकिन सबकुछ लागे ऐसा बिनसाजन के सावन कैसा. चलती है सौंधी पुरबाई हुएइकट्ठे लोग लुगाईउनके वो और वो हैं उनकी



ग़ज़ल (ये कैसा परिवार )

 गज़ल (ये कैसा परिवार) | जय विजय



कैसा होगा सफ़र

आफिस का अंतिम दिन था, छोड़ना था शहर बस यही सोचता हूँ, कि कैसा होगा सफ़र... उम्मीदे थी बहुत सारी, निकलना था दूरसुबह से ही जाने क्यो, छाया था सुरूरबैठे-२ हो गयी देखो सुबह से सहर            कैसा होगा सफ़र......शाम कल की थी, तब से थे तैयारसाथ सब ले लिया, जिस पर था अधिकारचल दिए अकेले ही पर नयी थी डगर   



कैसा छंद

कैसा छंद बना देती हैं बरसातें बौछारों वाली, निगल-निगल जाती हैं बैरिन नभ की छवियाँ तारों वाली!गोल-गोल रचती जाती हैं बिंदु-बिंदु के वृत्त बना कर, हरी हरी-सी कर देता है भूमि, श्याम को घना-घना कर।मैं उसको पृथिवी से देखूँ वह मुझको देखे अंबर से, खंभे बना-बना डाले हैं खड़े हुए हैं आठ पहर से।सूरज अनदेखा लगत





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