“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहा

मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहाहर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहाशब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहींखो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गईझुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा



"गीतिका"यह कैसा आया पहरा हैघर-घर में आँसू पसरा है

१६-८-१८ राष्ट्र के अनन्य भक्त लोकतंत्र के जीवंत प्रतिमूर्ति माँ भारती के महानतम सपूत माँ वीणा धारिणी के वरदपुत्र सर्व समाज के अभिवावक परम सम्माननीय पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न व पद्मविभूषण स्वर्गीय श्रीमान अतल बिहारी बाजपेयी जी कोसादर नमन भावपूर्ण श्रद्धांजलि स्वरूप समर्



कविता

क्यों रोते हो पथिक रहो चुप कहाँ गई तेरी दृढ निश्चय कहाँ गयी ये छुप



कविता---बिन साजन के सावन कैसा

बारिश की बूंदों से जलतीहीय में मेरे आज सुलगतीपीपल के पत्तो की फडफडजैसे दिल की धडकन धडधडचूल्हे पर चढ़ गयी कढाई दूरहुई दिल की तन्हाईलेकिन सबकुछ लागे ऐसा बिनसाजन के सावन कैसा. चलती है सौंधी पुरबाई हुएइकट्ठे लोग लुगाईउनके वो और वो हैं उनकी



ग़ज़ल (ये कैसा परिवार )

 गज़ल (ये कैसा परिवार) | जय विजय



कैसा होगा सफ़र

आफिस का अंतिम दिन था, छोड़ना था शहर बस यही सोचता हूँ, कि कैसा होगा सफ़र... उम्मीदे थी बहुत सारी, निकलना था दूरसुबह से ही जाने क्यो, छाया था सुरूरबैठे-२ हो गयी देखो सुबह से सहर            कैसा होगा सफ़र......शाम कल की थी, तब से थे तैयारसाथ सब ले लिया, जिस पर था अधिकारचल दिए अकेले ही पर नयी थी डगर   



कैसा छंद

कैसा छंद बना देती हैं बरसातें बौछारों वाली, निगल-निगल जाती हैं बैरिन नभ की छवियाँ तारों वाली!गोल-गोल रचती जाती हैं बिंदु-बिंदु के वृत्त बना कर, हरी हरी-सी कर देता है भूमि, श्याम को घना-घना कर।मैं उसको पृथिवी से देखूँ वह मुझको देखे अंबर से, खंभे बना-बना डाले हैं खड़े हुए हैं आठ पहर से।सूरज अनदेखा लगत





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