इंदौर में मेट्रो रेल परियोजना का उद्घाटन ...

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और क्या मँगोगे ?

और क्या मँगोगे ?महावत से हाथी , तालाब से कमल, किसान से हल,मजदूर से साईकिल, आदिवासियों से तीर कमान, दार्जलिंग से चाय पत्ती, मानव से हाथ, गाँव से लालटेन, आसमान से चाँद तारे रंग चुराए प्रकृति से , यह राजनेता भी कितने अजीब हैं कहते हैं करते नहीं हर चुनाव मे एक नई मुसीबत मांग लेते हैं पूरा नहीं करते।1



हिन्दी कविता- हिन्दी प्रसिद्ध कविताएं

हिन्दी साहित्य में कई ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने वक़्त, जिंदगी , इश्क़ और न जाने कितनों विषयों को अपनी कलम से परिभाषित किया है। इन लेखकों की सोच प्रकाश गति से भी तेज है । आज हम ऐसे ही लेखकों की प्रसिद्ध कविताएं आपके लिए लाए है



यादों का पागलखाना

जब भी तेरी वफाओं का वह ज़माना याद आता है,सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।कसमों की जंजीर जहां पर, वादों से बनी दीवारें हैंझूठ किया है खंज़र से तेरे नाम की उन पर दरारें है।टूट चुका सपनों का बिस्तर, अफ़सोसों की चादर हैतकियों को गीला करती अश्क़ों की जहां फुहारें हैं।जलती शमा में कैद वहां, परवान



कांग्रेस की बड़ी रणनीति का खुलासा, इसलिए सिंधिया की जगह कमलनाथ को बनाया मुख्यमंत्री

मध्य प्रदेश में सियासत का रंग बदले हुए हम सब ने देखा है पिछले 15 सालों से मध्य प्रदेश के तख़्त पर बैठी भारतीय जनता पार्टी को अपना तख़्त छोड़ना पड़ा और इसी के साथ कांग्रेस का वनवास ख़त्म हो गया। वहीँ सत्ता बदलने के बाद जहां लोगों में आशा की नई उम्मीद जाएगी है तो कांग्रेस पर भी बड़ी ज़िम्मेदारी भी आन पढ़ी है।



कहीं भाजपा का ‘‘कमल’’(भगवा) एजेंडा’’ कांग्रेस के ‘‘नाथ’’ ने चुरा तो नहीं लिया है?

मध्यप्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में ‘‘कमल’’ को अनाथ न होने देने वाले हमारे पडोसी जिले छिंदवाडा के कमलनाथ द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली गई जिसके लिये उन्हे हार्दिक बधाईयाँ, वंदन व अभिनंदन। सम्पन्न शपथ ग्रहण समारोह में वास्तव में ऐसा लगा ही नहीं कि वह किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण स



“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल।

“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल। भीतर डूबी नाल है, हरा पान अनुकूल॥ हरा पान अनुकूल, मूल कीचड़ सुख लेता। खिल जाता दु:ख भूल, तूल कब रंग चहेता॥ कह गौतम कविराय, दंभ मत करना रोहित। हँसता खिलकर खूब, कमल करता मन मोहित॥महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मराबी , श्री कमल भान सिंह - लोकसभा सदस्य

निर्वाचन क्षेत्र -सरगुजा (ST) (छत्तीसगढ़)दल का नाम -भारतीय जनता पार्टी ( भा.ज.पा.)ईमेल -kamalbhans[DOT]marabi[AT]sansad[DOT]nic[DOT]inजन्म की तारीख -01/07/1963उच्चतम योग्यता -स्‍नातकोत्तरशैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता -एम.ए. (इतिहास) शासकीय विश्‍वविद्यालय, अंबिकापुर से शिक्षा ग्रहण की।व्यवसाय -क



पाटले, श्रीमती कमला - लोकसभा सदस्य

निर्वाचन क्षेत्र -जांजगीर-चंपा (SC) (छत्तीसगढ़)दल का नाम -भारतीय जनता पार्टी ( भा.ज.पा.)ईमेल -kd[DOT]patle[AT]sansad[DOT]nic[DOT]inजन्म की तारीख -05/05/1966उच्चतम योग्यता -अंडर ग्रेजुएटशैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता -अवर स्‍नातकव्यवसाय -कृषकस्थायी पता -वार्ड सं. 08, जांजगीर, जिला-जांजगीर,



कमला दास (कमला सुरय्या), एक बेबाक लेखिका

"आसानहै एक मर्द की तलाश जो तुम्हें प्यार करे,बस, तुमईमानदार रहो कि एक औरत के रूप में तुम चाहती क्या हो ।उसे सब सौंपदो,वह सब जोतुम्हें औरत बनाती है ।बड़े बालोंकी ख़ुशबू,स्तनों केबीच की कस्तूरी,और तुम्हारीवो सब स्त्री भूख ।" कमला दास ने जब ये कविता लिखी थी तो उन्होंन



मोरे पिया बड़े हरजाई रे!

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे,रात लगी मोहे सर्दी, बेदर्दी सो गए ओढ़ रजाई रे।झटकी रजाई, चुटकी बजाई, सुध-बुध तक न आई रे!पकड़ी कलाई, हृदय लगाई, पर खड़ी-खड़ी तरसाई रे!अंगुली दबाई, अंगुली घुमाई, हलचल फिरहुँ न आई रे!टस से मस



मैं मटमैला माटी सा

मैं मटमैला माटी सा , माटी की मेरी काया,माटी से माटी बना, माटी में ही समाया।समय आया, आकाश समेटे घाटी-माटी पिघलाया,अगन, पवन, पानी में घोलकर, तन यह मेरा बनाया।।जनम हुआ माटी से मेरा, माटी पर ही लिटाया,माटी चखी, माटी ही सखी, माटी में ही नहा



दर्पण

बोले टूटकर बिखरा दर्पण , कितना किया कितनों को अर्पण,बेरंगों में रंग बिखेरा, गुनहगारों को किया समर्पण।देखा जैसा, उसको वैसा, उसका रूप दिखाया,रूप-कुरूप बने छैल-छवीले, सबको मैंने सिखाया,घर आया, दीवार सजाया, पर विधना की माया,पड़ूँ फर्श पर टुकड़े होकर, किस्मत में ये लिखाया।च



मित्र का चित्र

सुरमई आँखों को सजाएँ, काज़ल की दो लकीरें,मैंने इनमें बनती देखी कितनी ही तसवीरें,तसवीरों के रंग अनेकों, भांति-भांति मुस्काएं,कुछ सजने लगी दीवारों पर, कुछ बनने लगी तक़दीरें।कुछ में फैला रंग केसरिया, कुछ में उढ़ती चटक चुनरिया,कुछ के रंग सफ़ेद सुहाने, कुछ में नागिन लचक कमरिया



काश, मेरी भी माँ होती!

काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।प्रेम जताता, प्यार लुटाता,चरण दबाता, हृदय लगाता,जब कहती मुझे बेटा अपना, जीवन शायद सफल हो जाता, काश, मेरी भी माँ होती! मैं उसे अपनी माँ बुलाता।मैं अनाथ बिन माँ के भटका, किसको अपनी मात् बताता,जब डर लगता इस दुनियाँ का, किस



अब इतना दम कहाँ!

झुक गए हैं कंधे मेरे, अपनों का बोझ उठाते,सपनों का बोझ उठाऊं, अब इतना दम कहाँ!कण कण जोड़कर घरोंदा ये बनाया मैंने,तन-तन मोड़कर इसको सजाया मैंने।रुक गया हूँ, झुक गया हूँ, बहनों का बोझ उठाते,गहनों का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!परिवार की आशाओं में खुद को पिराया मैंने,बनकर छत उनकी सदा, खुद को भिगाया मैंने।अ



ऐ मेरे दिल की दीवारों

ऐ मेरे दिल की दीवारों, रूप अनूप तुम्हारा करूँ!मेरे रूप की धूप अनेकों, कौन सा रूप तुम्हारा करूँ?क्या श्वेत करूँ, करे शीतल मनवा, उथल पुथल चितचोर बड़ा है,करूँ चाँदनी रजत लेपकर, पूनम का जैसे चाँद खड़ा है।करूँ पीताम्बर नील नगर में, जैसे चढ़ता



दास्तान-ए-कलम (मेरी कलम आज रोई थी)

मेरी कलम आज फिर रोई थी,तकदीर को कोसती हुई, मंजर-ए-मज़ार सोचती हुई,दफ़न किये दिल में राज़, ख़यालों को नोंचती हुई।जगा दिया उस रूह को जो एक अरसे से सोई थी,मेरे अल्फाज़ मेरी जुबां हैं, मेरी कलम आज रोई थी।।पलकों की इस दवात में अश्कों की स्याही लेकर,वीरान दिल में कैद मेरी यादों



पथिक - एस. कमलवंशी

पथिक तेरा रास्ता कहाँ, मंजिल कहाँ तेरी बावरे,टेढ़े-मेढ़े जग-जाल में, फिरता कहाँ है सांवरे,कहाँ रही सुबहा तेरी, कहाँ है तेरी साँझ रे!पथिक तेरा रास्ता कहाँ, मंजिल कहाँ तेरी बावरे।टिमटिम चादर ओढ़कर, सोया तू पैर पसार रे,जिस स्वप्न में रैना तेरी, क्या होगा वह साकार रे,साकार का आकार भर, तू उठ गया पौ फटने पर,



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