स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये !!

एक वर्ष और स्वतंत्रता का.. आकर चला गया.. महँगाई..भ्रष्टाचार और अनगिनत रेप के बीच, इस स्वतंत्र धरती के.. खुले आकाश में.. दम घुँट रहा है.. बस शरीर जीवित है, कोई सरकार पर आरोप लगा रहा है.. सरकार विपक्ष पर.. विपक्ष सरकार की टांग खींच रहा है.. और जनता भूखी मर रही है, जिन वस्तुओं की जरुरत नहीं है.. वो सस्



माँ तुझे ढ़ूंढता रहा अपनों में

जन्म दिन पर एक बालक की अपनी माँ से प्रार्थना है कि वह अपने उस स्नेह को उसकी स्मृति से हटा ले ,जिसकी तलाश में उसे तिरस्कृत एवं अपमानित होना पड़ता है। ------------------------------------------------माँ तुझे ढ़ूंढता रहा अपनों में***********



" मैं कवि हूँ सरयू तट का"

" मैं कवि हूँ सरयू तटका"---------------------------मैंकवि हूँसरयू तट कासमयचक्र के उलट पलट कामानवमर्यादा की खातिरसिर्फ अयोध्या खडी हुई ।चक्र -कुचक्र चला कुछ ऐसाविश्व की ऑखें गडी हुई।जबकि सच है मेरी अयोध्याजाने हाल ;हर घट पनघट का।। पला-ब



निगाहें ढूँढ़ लेती हैं

--निगाहें ढूँढ़ लेती हैं हमारे दिल की बदनीयत , निगाहें ढूढ़ लेती हैं,जो ढूँढों रूह को मन से, निगाहें ढूढ़ लेती हैं.भरी महफ़िल हो कितनी भी, हों कितने भी हँसी चेहरेमगर बेबाक शम्मां को , निगाहें ढूँढ़ लेती हैं. ..कोई भी उम्र ढक सकती नहीं, माजी की तस्वीरेंतहों में झुर्रियों के भी, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं



महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी कुछ लोग कभी मरते नहीं ऐसा कोई दिल नहीं जिसमे गाँधी जी धड़कते नहीं वो एक पवित्र आत्मा थे जो डंडे खाने पर भी थकते नहीं थे



सागर के दर्शन जैसा

तुम कहते वो सुन लेता,तुम सुनते वो कह लेता।बस जाता प्रभु दिल मे तेरे,गर तू कोई वजह देता।पर तूने कुछ कहा नही,तेरा मन भागे इतर कहीं।मिलने को हरक्षण वो तत्पर,पर तुमने ही सुना नहीं।तुम उधर हाथ फैलाते पल को,आपदा तेरे वर लेता।तुम अगर आस जगाते क्षण वो,विपदा सारे हर लेता।पर तूने क



सुनो मेघदूत!

सुनो मेघदूत!सुनो मेघदूत!अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ, अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से, गूँथा गया गगन, ग़ैरत का गुनाहगार है अब, राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!हिज्र की दिलदारियाँ, ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, अश्क में भीगा गुल-ए-तमन्ना, फ़स्ल-ए-बहार में, धड़कते दिल की आरज़ू, नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से अरमान, मुरादों



रिश्ते

यूं रिश्तों में समझौते का पेवंद लगा कर उसे कब तक जोड़ा जाए क्यों ना ज़बरदस्ती वाले रिश्तों की गांठों को आज़ाद किया जाए घुटन में रहने से तो बेहतर है आज़ाद फ़िज़ा में सांस ली जाए क़समों , वादों में उलझी हुई दुनिया से अब क्यों ना चलो किनारा किया जाए अश्मीरा 8/8/19 11:30 am



एक से पचास

एक दो तीन चार पाँच छे सात,गिनती ये मेरी प्रभु सुनो जग्गनाथ।आठ नौ दस ग्यारह बारह तेरह,तेरा हो हाथ छूटे जन्मों का घेरा।चौदह पंद्रह सोलह सत्रह अठारह उन्नीस,हार भी ना मेरा प्रभु ना हीं मेरी जीत।बीस इक्कीस बाइस तेईस चौबीस पच्चीस,हरो दुख सारे प्रभु तू हीं मन मीत।छब्बीस सताईस अ



सफलता

बस कुछ ही दूर थी सफलता, दिखाई दे रही थी स्पष्ट, मेरा प्रिय मित्र मन, प्रफुल्लित था, तेज़ प्रकाश में, दृश्य मनोरम था, श्वास अपनी गति से चल रहा था, क्षणिक कुछ हलचल हुई, पैर डगमगाया, सामने अँधेरा छा गया, सँभलने की कोशिश की, किन्तु गिरने से ना रोक पाया अपने आप को, ना जाने कौन था, जो धकेल कर आगे चला गया,



गीत/ कश्मीर हमारा है.

(कश्मीर से धारा 370 हटाने का संकल्प संसद में पेश होने के बाद उम्मीद जगी है कि अलगाववादी ताकतें खत्म होंगी। कश्मीर में अन्य भारतीय भी बस सकेंगे।) कश्मीर हमारा था, अब तो कश्मीर हमारा है।जिसमें हो विजयीभाव भला, वो कब क्यूँ हारा है।।बहुत दिनों तक बंदी था, यह स्वर्ग हुआ आजाद।नये दौर के इस भारत को लोग क



शहादत की रूह

सुबह की ग़ज़ल --शाम के नाम आज़ाद होने के बाद से भारत के शहीदों की शहादत सबसे अधिक कश्मीर से जुड़े इलाकों में हुयी है. उन शहीदों की रूहें आज तक घूम घूम कर पूरे भारत के लोगों से गुहार कर रही हैं कि तिरंगे का केसरिया रंग कश्मीर के केसर से मिलाओ. शहीदों की यादें सब को छू कर गुज़रती हैं...बड़ी सुनसान राहें हैं



भीषण गर्जना

अत्यंत दुर्बल परिस्तिथि में..एक साहसीय भीषण गर्जना,चारो ओर सन्नाटा..आपस में तांकते महा विभोर, दुःख.. कठिनाई.. तनाव.. समस्या..सब खड़े मौन,विस्मित मन से सोच रहे,अब हो गया इनका विरोध,कैसे करेंगे परेशान अब,सुन कर उसकी गर्जना,पीछे खड़ा.. सहमा हुआ डर..डर रहा था आगे आने को,सोच



#इंसाफ़

मैं नन्ही सी जां थी लेकिन फिर भी तरस ना उसको आया अपनी भूक मिटाने क्यों उसने बचपन को खाया चंचल सा जीवन मेरा क्यों उसने पलभर में बलि चढ़ाया घबराती हूँ देख कर अब मैं ये बदसूरत दुनिया की मोह माया कितनी सांसें टूट गई है #इंसाफ़ किसी ने अब तक कहाँ है पाया हर दम सच का गला घोंट कर दरिंदों ने दुनिया का दिल दहल



पिता हूँ

बहुत चाहा कि मैं भी हो जाऊं ,नम्र, विनम्र बिलकुल तुम्हारी मां की तरह ।पर ना जाने कहां से आ जाती हैपिता जन्य कठोरता , मुझमें ,अपने आप से ।में अब भी चाहता हूं किअब भी तुम,सड़क पार करो मेरी उंगली पकड़कर ।मेरे कंधों पर चढोऔर दुनिया देखो।कितना अव्यवहारिक हो जाता हूँ मैं बिना स्वीकार किये कि दुनिया कितनी बद



अस्तित्व

सितारों, आज कहां छुपे हो?गुंफित से फिर नहीं दिखे होचमक दिखी न दिखा वो नूरकैसे भैया चकनाचूर?~~~~~नहीं दिखेंगे अब से तुमकोक्या मिलेगा हमसे सबकोतिमिर गया न गया वो अंधेरासूरज से ही होत सवेरा !~~~~~~करो न अपने दिल को छोटाछोटे से बढ बनते मोटासूरज भी इक तारा हैतुमसे नहीं वो न्यार



टाइम क्या हुआ है भाई

समय के प्याले में,जीवन परोसा जा रहा है,अतिथियों का जमघट लगा है,रौशनी झिलमिला रही है,अरे, बुरी किस्मत जी भी आयी है,लगता है, कुछ बिन बुलाये,अतिथि भी आये है,आये नहीं, जिनकी प्रतीक्षा है,स्वयं प्यालो को,विशेष अतिथि के रूप में,कई लोगो का निमंत्रण था,रात के दस बज चुके है,आया नहीं अभी कोई उनमे से,बाकि अतिथ



हूं मैं एक अबूझ पहेली

भीड़ से घिरी लेकिनबिल्कुल अकेली हूं मैंहां, एक अबूझ पहेली हूं मैंकहने को सब अपने मेरेरहे सदा मुझको हैं घेरेपर समझे कोई न मन मेराखामोशियो ने मुझको घेराढूंढूं मैं अपना स्थान...जिसका नहीं किसी को ज्ञानक्या अस्तित्व है घर में मेरा?क्या है अपनी मेरी पहचान?अपने दर्द में बिल्कुल अकेलीहूं मैं एक अबूझ पहेली



क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर...

दिनकर की धूप पाकर भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर। चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा निगलता है पेड़ दिनभर, मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु उगलता है पेड़ दिनभर। नीले शून्य में बादलों को दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, आते-जाते थके-हारे परि



तुम्हारी आँखें--

तुम्हारी आँखें-- (यदि दान करो तो !)किसी ने देखा माधुर्य तुम्हारी आँखों में, कोई बोला झरनों का स्रोत तुम्हारी आँखों में..कोई अपलक निहारता रहा अनंत आकाशतुम्हारी आँखों में,कोई खोजता रहा सम्पूर्ण प्रकाश तुम्हारी आँखों में...कोई बिसरा गया तुम्हारी आँखों में कोई भरमा गया तुम्हारी आँखों में...किसी के लिए



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