जीवन

अभी दो तीन पूर्व हमारी एक मित्र के देवर जी का स्वर्गवास हो गया... असमय...शायद कोरोना के कारण... सोचने को विवश हो गए कि एक महामारी ने सभी को हरा दिया...ऐसे में जीवन को क्या समझें...? हम सभी जानते हैं जीवन मरणशील है... जो जन्माहै... एक न एक दिन उसे जाना ही होगा... इसीलिए जीवन सत्य भी है और असत्य भी...



जीवन भाव भी अभाव भी

अभी दो तीन पूर्व हमारी एक मित्र के देवर जी का स्वर्गवास हो गया... असमय...शायद कोरोना के कारण... सोचने को विवश हो गए कि एक महामारी ने सभी को हरा दिया...ऐसे में जीवन को क्या समझें...? हम सभी जानते हैं जीवन मरणशील है... जो जन्माहै... एक न एक दिन उसे जाना ही होगा... इसीलिए जीवन सत्य भी है और असत्य भी...



कुछ कविताएँ



भरी भीड़ में मन बेचारा

आज अमावस्या तिथि है...हम सभी ने अपने पितृगणों को विदा किया है पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ...अमावस्या का सारा कार्यक्रम पूर्ण करके कुछ पल विश्राम के लिए बैठे तो मन में कुछविचार घुमड़ने लगे... मन के भाव प्रस्तुत हैं इन पंक्तियों के साथ...भरी भीड़ में मन बेचाराखड़ा हुआ कुछ सहमा कुछसकुचाया साद्विविधाओं क



सिंदूर

"सिंदुर''ब्रह्मरंध नियंत्रण सिंदूर कापारा करता है।सुहागन का जीवनतनाव मुक्त करता है।।अनिद्रा मुक्त कर श्नायु तंत्र कोचैतन्य रखता है।।🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩परंपरा, धर्म जब ताखे पर रख डालाब्रह्मरंध्र का क्या दे फिर मित्र हवालानींद गई-सुख-चैन गया- झेलें तुर्राचित्त चंचल- स्वप्नों की हलचल 🌊🌊🌊🌊🌊🌊



"सोमनाथ मंदिर "

"सोमनाथ मंदिर "सोमनाथ मंदिर पे महमूद गजनवी का ,आक्रमण समझाने आया !सं १०२६ ई.के उस पुराना काले दिवस का इतिहास बताने आया | वैभवशाली ज्योतिर्लिंग की कीर्ति का सोमनाथ वारहवां प्रतीक | ईसा पूर्व अस्तित्व में आया जिसे सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रेय बनवाया | बार बार आक्रमण सहकर सन्देश दे जाता धैर्य और



खुदको बदल पाओगी

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा। आज जान हो कल अंजान हो जाओगी। मेरे घर के हर कमरे की मान थी, अब मेहमान कहलाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या खुद को बदल पाओगी। आज अम्बर धरती झील नदिया सब पूछते है जहाँ कल तक दोनो का नाम दिखाया करती थी, क्या अब उनकी भी खबर रख पाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या रिश्त



हिंदी दिवस पर बाल गीत

🌹"बाल गीत हिंदी दिवस पर"🌹🌹👯👯👯👯👯👯👯👯👯👯आज "हिंदी दिवस" सप्ताह में ''बाल गीत'' हम गायेंगेअपने बच्चों को हिंदी से प्यार करना आज सिखायेंगेनन्हे-मुन्हें बच्चों बहुत लाढ लढाया, मेधावान् बनायेंगेअपनी भाषा हिंदी के गुण-सभी बच्चों को बतलायेंगेहिंदी में पढ़ना-लिखना और बातें करना- सिखलायेंगेअकाडमी मे



हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

अभी 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस था और आज हिन्दी दिवस है... हमने अपने सदस्यों सेआग्रह किया क्यों न इस अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाए... तो आज उसीगोष्ठी के साथ आपके सामने उपस्थित हैं... यदि हम ज़ूम पर या किसी भी तरह से ऑनलाइनगोष्ठी करते हैं तो वहाँ कुछ समस्याओं का हमने अनुभव किया है... जिनमें स



व्यंग्य की धार

एक :सुनो !!व्यंग्य के धागे मेंमत लपेटना काँच का पाउडरतेज़ माँझा झटके में काट देगा गरदनसमझने से पहले ही प्राण त्याग देगा लक्ष्यधागे को रखो मोटामध्य में बाँधो तमाम गाँठेगाँठों से छिली त्वचा पर अंकित संकेततमाम उम्र रहेंगे प्रासंगिकरगड़ की जलन अधिक स्थायी होती है अचानक आई मृत्यु की पीड़ा से दो :पतंग के साथ



कोई रोता है।

( 1)क्यों? मुझको ऐसा लगता है। दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? मैं नही जानता। पर,मानो अपना लगता है।कहीं दूर कोई रोता है। मुझसे मेरा मन कहता है। ( 2)अक्सर अपनी तन्हाई में, ध्



कोई रोता है।

क्यों मुझको ऐसा लगता है?, दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? ,मैं नही जानता, पर मुझको ऐसा लगता है,दूर कोई अपना रोता है। क्योंमुझको ऐसा लगता है?दूर कहीं कोई रोता है। 2पर्वत की हरी-भरी वादियाँ



जीवन क्या है

जीवन क्या है मात्र चित्रों की एक अदला बदली...किसी अनदेखे चित्रकार द्वारा बनाया गया एक अद्भुत चित्र...जिसे देकर एक रूप / उकेर दी हैं हाव भाव और मुद्राएँ और भर दिए हैं विविध रंग / उमंगों और उत्साहों के सुखों और दुखों के / रागों और विरागों के कर्तव्य और अकर्तव्य के / प्रेम और घृणा के अनेकों पूर्ण अपूर्



टपकी बुँद पसिने की

टपकी बुँद पसीने कीमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंतपिश है उमस भरी- ठंढ़ी छाँव ढ़ूंढ़ वे रहीं हैंअपनी हीं तश्वीरों को देख मदहोश हो रही हैमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंडॉ. कवि कुमार निर्मलDrKavi Kumar Nirmal



कैसे वक़्त ने पलटा खाया

कैसे वक़्त ने पलटा खायालोगो की नज़र में कल तक जो डॉक्टर भगवान थाआज वो डाकु हो गयाहर नुक्कड़ हर चौराहे पर चर्चा आम हैंडॉक्टर नही शैतान हैंलोगो की लाज हया शर्म सब मर गईकैसे वक़्त ने पलटा खायाजब खुद बीमार ना हुए तब तकडॉक्टर का महत्व ना समझ आयानुक्कड़ छुटा चौराहा छुटाछुटी फोकट की बात अस्पताल में डॉक्टर ही दि



पुष्प का सौरभ ही दे दो

पुष्प बनकर क्या करूँगी, पुष्प का सौरभ ही दे दो |दीप बनकर क्या करूँगी, दीप का आलोक दे दो ||हर नयन में देखना चाहूँ अभय मैं हर भवन में बाँटना चाहूँ हृदय मैं बंध सके ना वृन्त डाल पात से जो थक सके ना धूप वारि वात से जो भ्रमर बनकर क्या करूँगी, भ्रमर का गुंजार दे दो ||रचना सुनने के लिए कृपया वीडियो देखने क



मैं शीश झुकाऊँ मानव को

मैं शीश झुकाऊँ मानव कोइस जीवन को मैं केवल सपना क्यों समझूँ,हरभोर उषा की किरण जगाती है मुझको…हरशाम निशा की बाहों में मुस्काता हैचंदा, मस्ती छाती मुझको||रचना सुनने के लिए देखें वीडियो... कात्यायनी...https://youtu.be/txYk946TuoI



तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना

कल मिलने आइ वो,मेरा पसंदीदा पकवान लाई वो।हम दोनो बहुत सारी बातें किये,उसकी और मेरे नयन ने भी मुलाक़ातें किए।अचानक से पूछी मुझसे.ये बताओ, मुझमे और इश्क़ में क्या अंतर हैं?मैंने कहाँ, तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना,तु ख़्वाब है और वो है सपना।अब वो नाराज़ हो गईं,रोते-रोते मेरे हाई कँधो पर सो गईं



तू कोमल कली

तु वो बाग़ की कोमल कली हैतुझे तोड़ा अधर्मी वो बली हैजिसे तूने तन मन से माना हैउसने ही तुझे ये पापी दाग़ में साना हैमैं माली हूँ बाग़ से टूटे कली कातु कर भरोसा मेरे साँस कीतेरा छोड़ अब किसका होने वाली हूँतुझे डर किस बात कीदेख मुझे हज़ारों ग़म है फिर भी मतवाली हूँतु छंद है मेरे पंक्तियों की मैं नशा



स्त्री अभिलाषा

स्त्री अभिलाषा चाह नहीं मैं क्रूर व्यक्ति,अनपढ़ संग थोपी जाऊं । चाह नहीं पौधे की तरह, जब चाहे जहां रोपी जाऊं ।। चाह नहीं शादी की है, जो दहेज प्रथा में मर जाऊं । चाह नहीं अपने अधिकारों, से वंचित रह जाऊं ।। हम अवला को कुछ और नहीं,



आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x