कविता



Archana Ki Rachna: Preview " मेरी ज़िन्दगी का रावण "

अपनी ज़िन्दगी के रावणअब मुझे जलाने हैंमान मर्यादा लोक लाजके बंधन अब मुझेभुलाने हैंमैं प्यारी और दुलारी थीजब तक अपनीउपेक्षा सेहती रहीतुम्हारे बेटा बेटी के दुर्भाव मेंमैं अपने अधिकार छोड़ती रहीतुम्हारी इस मानसिक सोचसे मुखौटे अब हटाने हैंअपनी ज़िन्दगी के रावणअब मुझे जलाने हैंतु



मन रे !अपना कहाँ ठिकाना है!!!

मन रे,अपना कहाँ ठिकाना है?ना संसारी, ना बैरागी, जल सम बहते जाना है,बादल जैसे



अर्थों को सार्थकता दे दें

अर्थों को सार्थकता दे दें शब्दों के उदास होने पर अर्थ स्वयं पगला जातेहैं |आओ शब्दों को बहला दें, अर्थों को सार्थकता दे दें ||दिल का दीपक यदि जल जाए, जीवन भर प्रकाश फैलाए और दिये की जलती लौ में दर्द कहीं फिर नज़र न आए |स्नेह तनिक सा बढ़ जाए तो दर्द कहीं पर छिप जातेहैं आओ बाती को उकसा दें, प्रेममयी आभा



पूनम का चाँद

मात्रा- -- 15 🌕 पूनम का चाँद 🌕 """""""""""""""""""" पूनम का चाँद है निकला , जिससे उठे वेग हृदय में । प्रेमी याद करें प्रेम को, जोगी रहे प्रभु प्रणय में ।।यह दिन खेले खेल अनुपम। जड़ चेतन करें सममोहन ।। घने बादल घिर- घिर आए । प्रेम माधुर रस बरसाएँ



मिलना

कोई तकदीर से मिलते हैं तो कोई दुआ से कोई चाहत से मिलते हैं तो कोई तकरार से कोई कोशिश से मिलते हैं तो कोई मजबूरी से ज़िन्दगी की राहों में मिलना तो तै हैं चाहे वो कैसे भी हो. ...



जब शरद आए

ताल-तलैया खिलें कमल-कमलिनीमुदित मन किलोल करें हंस-हंसिनी!कुसुम-कुसुम मधुलोभी मधुकर मँडराए,सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए!!!गेंदा-गुलाब फूलें, चंपा-चमेली,मस्त पवन वृक्षों संग,करती अठखेली!वनदेवी रूप नए, क्षण-क्षण दिखलाए,सुमनों से सजे सृष्



आई, दिवाली आई !

आई दिवाली फिर से आई,शुरू हो गई साफ सफाई,आई दिवाली आई !साफ सफाई सीमित घर तक,रस्तों पर कचरे का जमघट,बाजारों की फीकी रौनक,मिली नहीं है अब तक बोनस,कैसे बने मिठाई !आई दिवाली आई !हुआ दिवाली महँगा सौदा,पनप रहा ईर्ष्या का पौधा,पहले सा ना वह अपनापन,हुआ दिखावे का अब प्रचलन,खत्म



आओ बैठे आज फिर साथ

आओ बैठे आज फिर साथज़िंदगी की किताब के कुछ पन्ने फिर पलटेंकुछ अफ़साने तुम कहोकुछ क़िस्से हम सुनायेंकुछ लम्हे तुम जियो कुछ पल हम दोहराएँकुछ भूली हुई यादें,तुम ताज़ा करो कुछ स्मृतियाँ हम संजोयें कुछ क़समें तुम तोड़ो कुछ वादों से हम मुकरेंकुछ दूरियाँ तुम मिटाओकुछ फ़ासले हम तय करेंकुछ नज़दीक तुम आओ कुछ क



Archana Ki Rachna: Preview "मनमर्ज़ियाँ"

चलो थोड़ी मनमर्ज़ियाँ करते हैं पंख लगा कही उड़ आते हैंयूँ तो ज़रूरतें रास्ता रोके रखेंगी हमेशापर उन ज़रूरतों को पीछे छोड़थोड़ा चादर के बाहर पैर फैलाते हैंपंख लगा कही उड़ आते हैंये जो शर्मों हया का बंधनबेड़ियाँ बन रोक लेता हैमेरी परवाज़ों कोचलो उसे सागर में कही डूबा आते हैंपंख लगा



दर्द का रिश्ता

दर्द का रिश्ता दिल से है,और दिल का रिश्ता है तुमसे !बरसों से भूला बिसरा,इक चेहरा मिलता है तुमसे !यूँ तो पीड़ाओं में मुझको,मुस्काने की आदत है ।काँटों से होकर फूलों को,चुन लाने की आदत है ।पर मन की देहरी गुलमोहर,शायद खिलता है तुमसे !बरसों से भूला बिसरा,इक चेहरा मिलता है तुमसे !धूमिल सा उन तारों में जब,म



अभी मुझे खिलते जाना है

अभी मुझे खिलते जाना है नहींअभी है पूर्ण साधना, अभी मुझे बढ़ते जाना है |जगमें नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खिलते जाना है ||मैं प्रथमकिरण के रथ पर चढ़ निकली थी इस निर्जन पथ पर ग्रहनक्षत्रों पर छोड़ रही अपने पदचिह्नों को अविचल |नहींप्रश्न दो चार दिवस का, मुझको बड़ी दूर जाना है जगमें नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खि



प्याज

ख्याल होगा। प्याज के दाम दोबारा बढ़े थे। पांच रुपए में एक प्याज लेने पर आंखों से आंसू झरे थे। तभी निम्न लिखित रचना कल्पना में आयी थी। पढ़ें।एक कवि नेसम्पादक को अकेला पायाइधर-उधर देखाकिसी को ईर्द-गिर्द न पाझट कक्ष मेें घुस आयासम्पादक ने सर उठायाअवांछित तत्व को सामने देखबुरा सा मुंह बनायाकंधे से लटके



खो कर ही इस जीवन में कुछ पाना है ...

मूल मन्त्र इस श्रृष्टि का ये जाना हैखो कर ही इस जीवन में कुछपाना हैनव कोंपल उसपल पेड़ों पर आते हैंपात पुरातन जड़से जब झड़ जाते हैं जैविक घटकोंमें हैं ऐसे जीवाणू मिट कर खुद जोदो बन कर मुस्काते हैं दंश नहीं मानो,खोना अवसर समझो यही शाश्वतसत्य



कोमल कठोर कृष्ण

🕉कोमल कठोर कृष्ण 🕉 -------------------------पृथा राज्य में पैदा लेकर, कुन्ती पृथा कहलाई।'ष्ण' प्रत्यर्पण लगाकर उसमें, कौन्तेय पार्थ कहलाएँ ।।पार्थ सारथी बन प्रभु वर, महाभारत रचवाएँ। किसकी होती जग में गाथा, जन जन को बतलाएँ।।वृन्दावन का त्याग कर , मथ



कर्बला

🙏🏻 कर्बला 🙏🏻 """"""""""""" वाह! से जो शुरु हुई , आह! पर खत्म होती; ऐसी कर्बला की कहानी। सुने व्यंजना की जुबानी।।हुसैन नाम से सभी वाकिफ।फातिमा,अली इब्न के वालिद।। हसन,हुसैन थे अपने सगे भाई।हुसैन ने भाई से ही धोखा खाई।।खलीफा बनने की चाहत में ,वह हुआ बड़ा मगरुर ।हुसैन से छल क



घर

लडकिया चिडिया होती हैं, पर पंख नही होते लडकियों के। मायके भी होते हैं, ससुराल भी होते हैं; पर घर नहीं होते लडकियों के। माँ-बाप कहते हैं बेटियां तो पराई हैं, ससुराल वाले कहते है कि ये पराये घर से आई हैं। भगवान! अब तु ही बता- ये बेटियां किस घर के लिए तुने बनाई हैं। <!-



घर

लड़किया चिड़िया होती हैं, पर पंख नही होते लडकियों के। मायके भी होते हैं, ससुराल भी होते हैं; पर घर नहीं होते लडकियों के। माँ-बाप कहते हैं बेटियां तो पराई हैं, ससुराल वाले कहते है कि ये पराये घर से आई हैं। भगवान! अब तु ही बता- ये बेटियां किस घर के लिए तुने बनाई हैं। <!--/data/user/0/com.samsung.andr



पुष्प बनकर क्या करूँगी

सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत है मेरी ही एक पुरानी रचना....पुष्प बनकर क्या करूँगी, पुष्पका सौरभ मुझे दो |दीप बनकर क्या करूँगी, दीप का आलोक दे दो ||हर नयन में देखना चाहूँ अभय मैं,हर भवन में बाँटना चाहूँ हृदय मैं |बंध सके ना वृन्त डाल पात से जो,थक सके ना धूप वारि वात से जो |भ्रमर बनकर क्या करू



राम और रावण युद्ध

युद्ध देव दानव का युगों से चलता आया है"कुरुक्षेत्र" बार - बार रक्तिम होता आया हैसंधर्ष यह "मन" का है, ग्रंथों में बाँचा जाता हैमृत्यु काल में मन में वही भाव समक्ष आता हैमन खोज अनुकूल देह भ्रूण में समा जाता हैसंस्कार क्षय कर पूर्ण- दिव्यात्मा कहलाता हैनाशवान इह जगत् से मुक्त हो 'मोक्ष' पाता हैराम



आप किस दिन पैदा हुए है, इससे जानिए अपने व्यक्तित्व

आपके व्यक्तित्व पर होता है आपके जन्म दिन का प्रभावजिस दिन आपका जन्म हुआ, वह दिन काफी दिलचस्प है। शायद ही आप जानते हों कि आपके जन्म तारीख की ही तरह आपके पैदा होने के दिन (सोमवार से रविवार) से आपके बारे में कई सारी जानकारियां सामने आती हैं। यहां हम बात कर रहे हैं सप्ताह के



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