कविता

कविता से सम्बंधित लेख निम्नलिखित है :-

दुनिया नहीं कुछ मुझे देने वाली

नमस्कार,स्वागत है आप सभी का यूट्यूब चैनल "मेरे मन की" पर|"मेरे मन की" में हम आपके लिए लाये हैं कवितायेँ , ग़ज़लें, कहानियां और शायरी|आज हम लेकर आये है कवियत्री रेखा जी का सुन्दर गीत "दुनिया नहीं कुछ मुझे देने वाली"|आप अपनी रचनाओं का यहाँ प्रसारण करा सकते हैं और रचनाओं



कवि नीरज जी को समर्पित

आज एक सुरज और ढल गया चाँद के पास से टूट सितारा गया फलक पे चमकते रहेंगे शब्दों के मोती कोई ग़ालिब , कोई मोमिन , आज फिर जिन्दगी कि जंग हार गया दिल कि नाव का डुब आज



मेरा अन्तर इतना विशाल

मेरा अन्तर इतनाविशाल समुद्र से गहरा/ आकाश से ऊँचा / धरती सा विस्तृत जितना चाहे भरलो इसको / रहता है फिर भी रिक्त ही अनगिन भावों काघर है ये मेरा अन्तर कभी बस जाती हैंइसमें आकर अनगिनती आकाँक्षाएँ और आशाएँजिनसे मिलता हैमुझे विश्वास और साहस / आगे बढ़ने का क्योंकि नहीं हैकोई सीम



मौन का लक्ष्य

कोईअस्तित्व न हो शब्दों का, यदि हो न वहाँ मौन का लक्ष्य |कोईअर्थ न हो मौन का,यदि निश्चित नहो वहाँ कोई ध्येय |मौनका लक्ष्य है प्रेम,मौन मौन कालक्ष्य है दया मौनका लक्ष्य है आनन्द,और मौन मौन काहै लक्ष्य संगीत भी |मौन, ऐसा गीत जो कभीगाया नहीं गया,फिरभी मुखरित हो गया |मौन, ऐसा



वो मेरे लिए ख़ुदा है

आओ सबका करे भला जो मुझ तक आ पहुंचा है वो मेरे लिए ख़ुदा है मैं ख़ुदा के किसी काम आया और क्या चाहिए भला आओ सबका करे भला मेरे दिल मे भी जख्म है चलते है जो गमो कि हवा के झोके नास



भटकती है वह यूँ ही कस्तूरी मृग सी

वजूद स्त्रियों का खण्ड -खण्डबिखरा-बिखरा सा। मायके के देश से ,ससुराल के परदेश में एक सरहद से दूसरी सरहद तक। कितनी किरचें कितनी छीलन बचती है वजूद को समेटने में। छिले हृदय में रिसती है धीरे -धीरे वजूद बचाती। ढूंढती,और समेटती। जलती हैं धीरे-धीरे बिना अग्नि - धुएं केराख हो ज



टीस

यह उन दिनों की बात है ,जब उम्र कुछ ऐसी थी की ज़िन्दगी के बड़े से बड़े फैसले कैन्टीन मे चाय और समोसो के साथ बनते और बिगड़ जाते थे.यह उन दिनों की बात है जब ज़िन्दगी, इनटरवल के पह



गिरकर सम्भलना ,संभल के तू चलना

गिरकर संभलना,संभल के तू चलना ,कभी न रुकना ,बढ़ते ही रहना ,तो क्या हुआ, गर राह है मुश्किलों का,जो वक्त की झंझावातों से लड़ ,अपने हार को स्वीकार कर चलता रहा ,जीत भी हुआ है, उसी मनुष्य का ा पथ पर चलते हुए ,छोड़ जाना तू पाँवों के निशान ,उसी निशान को पथ रेखा बना ,फ



ज़िन्दगी तुझे देखा तो

हाथ से रेत फिसलती रही वक़्त के साथ दुनिया बदलती रही जिन्दगी तुझे देखा तो तबियत बिमार कि बहलती रही हाथ से रेत फिसलती रही मौसम को भी



मेरे दिल क्यूँ मचलता है

मेरे दिल क्यूँ मचलता है तुझे तन्हा ही चलना हैआग अपने लगाते हैं तो फिर जलना ही जलना है हिम से खुद को ढके देखो वो पर्वत मुस्कुराता हैहवाएं गर्म हों उसको तो फिर गलना ही गलना है ख़ता मैंने करी है तो सज़ा भी मैं ही पाऊंगासूरते हाल हो कोई हाथ मलना ही मलना है वक्त ने तय किया जिस चीज़ को वो हुई हरदमसांझ आ ग



तुम

मेरी ख़ामोशी की आवाज़,मुस्कराहट का अंदाज़, बंद पलकों का ख्वाब, और हर ख़ुशी का राज़, हो तुम एक सपने सा है साथ तुम्हारा, एक हकीकत है प्यार तुम्हारा, होठो पे हँसी, आँखों में नमी है तुमसे हर बात की दास्तान है तुमसे, और कहुँ कैसे कितना प्यार है तुमसे



टेलीफोन हितेषी या जंजाल

मुंह अँधेरे ही भजन की जगह,फोन की घंटी घनघना उठी,घंटी सुन फुर्ती आ गई,नही तो,उठाने वाले की शामत आ गई,ड्राईंग रूम की शोभा बढाने वाला,कचड़े का सामान बन गया,जरूरत अगर हैं इसकी,तो बदले में कार्डलेस रख गया,उठते ही चार्जिंग पर लगाते,तत्पश्चात मात-पिता को पानी पिलाते,दैनान्दनी से निवृत हो,पहले मैसेज पढ़ते,बा



हे ईश्वर मालिक हे दाता, हे जगत् नियंता दिन बन्धु!

हे ईश्वर मालिक हे दाता, हे जगत् नियंता दिन बन्धु!हे परमेश्वर प्रभु हे भगवन्, हे प्रतिपपालक हे दया सिन्धु!!सच्चिदानंद घट घट वासी, हे सुखराशि करुणावतार!हे विघ्न हर्न मंगल मूर्त, हे शक्ति रूप हे गुणागार!!सभ्यता यशश्वी हो जाए, मानवता का फैले प्रकाश!सब दिव्य दृष्टि के पोषक हो, कर दो कुदृष्टि का सर्व् नाश



मेरे मन की

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मेरे मन की

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सदा,बिखरी रहे हँसी। ....

हँसमुखी चेहरे पर ये कोलगेट की मुस्कान,बिखरी रहे ये हँसी,दमकता रहे हमेशा चेहरा,दामन तेरा खुशियों से भरा रहे,सपनों की दुनियां आबाद बनी रहे,हँसती हुई आँखें कभी नम न पड़े,कालजयी जमाना कभी आँख मिचौली न खेले,छलाबी दुनियां से ठग मत जाना,खुशियों की यादों के सहारे,दुखों को पार लगा लेना,कभी ऐसा भी पल आये जीवन



शहीद की विधवा

शहीद की विधवा✒️वीर रस, जन गण सुहाने गा रहे हैंपंक्तियों में गुनगुनाते जा रहे हैं,तारकों की नींद को विघ्नित करे जोगीत, वे कोरे नयन दो गा रहे हैं।ज़िंदगी की राह में रौशन रही वोमाँग में सिंदूर, सर चूनर बनी थी,रात के अंधेर में बेबस हुई अबजिंदगी की नींव है उजड़ी हुई सी।जोग, ना परितज्य वो भी जानती है,पर निर



मे तेरा हु सिर्फ तेरा

मैं तेरा हु सिर्फ तेरा एतबार कर मेरा चिराग़ बनके जला हु तो ये रौशनी रहेगी उमर भर एतबार कर मेरा मै तेरा हु सिर्फ तेरा मुझको अपने दिल मे बसा लो कब तलक



जीना नहीं आता

भरे कमरे में हम अकेले हैक्या बात करें कुछ समझ नहीं आतालोगों की ख़ुशी और झिज्ञासा देख करकभी कभी लगता है कि शायद हमें जीना ही नहीं आता



जो ये श्वेत,आवारा , बादल -कविता

जो ये श्वेत,आवारा , बादल - रंग -श्याम रंग ना आता –कौन सृष्टि के पीत वसन को- रंग के हरा कर पाता ? ना सौंपती इसे जल संपदा – कहाँ सुख से नदिया सोती ? इसी जल को अमृत घट सा भर- नभ से कौन छलकाता ?किसके रंग- रंगते कृष्ण सलोने घनश्याम कहाने खातिर ?इस सुधा रस बिन क



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