कविता

राह प्रभु की

कितना सरल है,सच?कितना कठिन है,सच कहना।कितना सरल है,प्रेम?कितना कठिन है,प्यार करना।कितनी सरल है,दोस्ती,कितना मुश्किल है,दोस्त बने रहना।कितनी मुश्किल है,दुश्मनी?कितना सरल है,दुश्मनी निभाना।कितना कठिन है,पर निंदा,कितना सरल है,औरों पे हँसना।कितना कठिन है,अहम भाव,कितना सरल है,



Maa: Happy Mother’s Day

http://www.kagajkalam.com/maa-happy-mothers-day/यह कविता मातृ दिवस के बारे में लिखी है . कुछ मेरे हास्य रस स्मिर्ति पर आधारित है



रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर , आस-पास के ही किसी छत से उड़कर ,आल्हा -ताला की कसम मेरे इरादे में कोई बेईमानी नहीं थी ,मैं कोई शिकारी नहीं एक जमीन्दार की लड़की थी ,एक काल से दूसरा काल बिता ,कई अनेक वर्षों तक सबको भरपेट दाना मिला ,ब



तुम मिले कोहिनूर से

भीगे एकांत में बरबस -पुकार लेती हूँ तुम्हे सौंप अपनी वेदना - सब भार दे देती हूँ तुम्हे ! जब -तब हो जाती हूँ विचलित कहीं खो ना दूँ तुम्हेक्या रहेगा जिन्दगी मेंजो हार देती हूँ तुम्हे ! सब से छुपा कर मन में बसाया है तुम्हे जब भी जी चाहे तब निहार लेती हूँ तुम्हे बिखर ना जाए कहीं रखना इस



कितनी बाबरी सी लड़की है वो

कितनी बाबली सी लड़की है वो , उसके दरवज्जे का चिराग हवा बुझा कर चली जाती है ,और वह जुगनू को सीसे में कैद कर देती है ,फूलों का रंग तितलियाँ चुरा ले जाती है ,और वह भँवरे से लड़ बैठती है ,आखिर कौन उसको समझाए



बातें कुछ अनकही सी...........: अवसाद

"अवसाद" एक ऐसा शब्द जिससे हम सब वाकिफ़ हैं।बस वाकिफ़ नहीं है तो उसके होने से।एक बच्चा जब अपनी माँ-बाप की इच्छाओं के तले दबता है तो न ही इच्छाएँ रह जाती हैं ना ही बचपना।क्योंकि बचपना दुबक जाता है इन बड़ी मंज़िलों के भार तले जो उसे कुछ खास रास नहीं आते।मंज़िल उसे भी पसंद है पर र



'अपरिभाषित ज़िन्दगी'

क्या कहूँ, कि ज़िन्दगी क्या होती है कैसे यह कभी हँसती और कभी कैसे रो लेती है हर पल बहती यह अनिल प्रवाह सी होती है या कभी फूलों की गोद में लिपटीखुशियों के महक का गुलदस्ता देती हैऔर कभी यह दुख के काँटो का संसार भी हैहै बसन्त सा



सांसों का बोझ

वक़्त जितना सीखा रही है ,उतनी तो मेरी साँसें भी नहीं है देह का अंग-अंग टुटा पड़ा है ,रूह फिर भी जिस्म में समाया हुआ है ,मेरे साँसों पर अगर मेरी मर्जी होती ,तो कबका मैं इसका गला घोंट देती ,मगर जीने की रस्म है जो मुझे निभाना पर रहा है ,मेरा मीत जो है गीत



राष्ट्र का नेता कैसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?जो रहें लिप्त घोटालों में,जिनके चित बसे सवालों में,जिह्वा नित रसे बवालों में,दंगा झगड़ों का क्रेता हो?क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?राष्ट्र का नेता कैसा हो?जन गण का जिसको ध्यान नहीं,दुख दीनों का संज्ञान नहीं,निज थाती का अभिज्ञान नहीं,अज्ञान हृदय में सेता हो,क्या राष्ट्र का नेता



Kranti Ki Mashal Kavy sangrah by kavi Hansraj Bhartiya क्रान्ति की मशाल साझा कविता संग्रह की पुस्तक समीक्षा

क्रान्ति की मशाल : क्रांतिकारी परिवर्तन की अभिव्यक्तिहंसराज भारतीय हिन्दी साहित्य में एक उभरता हुआ नाम है। उनकी रचनाये निरन्तर अनेको पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। जिनमे कुछ पत्रिकाओं के नाम इस प्रकार है - अमृत पथ, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, राजधर्म, समय के



पर्वत और रेत

एक भीड़ चल रही थी पर्वत की ओर , अपना काफिला सजा मंजिल की ओर ,ये बदकिस्मती थी मेरी या खुशनसीबी ,उसी भीड़ में मेरी काया भी चल रही थी ,कितना ऊँचा ललाट था उस पर्वत का ,एक कम्पन सा उठा मेरे फूलते साँस में ,पाँव थककर वहीं ठिठक सा गया ,तभ



मुक्तक

जाने कैसा घुटन भरा अँधेरा है , सकल कारवां विपदाओं ने घेरा है | पथ दर्शक सब दरबारी चारण हुये , किससे पूछें कितनी दूर सवेरा है | 2 मैंने उगता छिपता सूरज देखा है ,क्षितिज नहीं कुछ भी बस भ्रम की रेखा है | तुम शासन के प्रगति आंकड़े



कविता खुशबू का झोंका

कविता खुशबू का झोंका---------------------------- कविता खुशबू का झोंका, कविता है रिमझिम सावन कविता है प्रेम की खुशबू, कविता है रण में गर्जन कविता श्वासों की गति है, कविता है दिल की धड़कन हॅंसना रोना मुस्काना, कवितामय सबका जीवन कविता प्रेयसी से मिलन है, कविता अधरों पर चुंबन कविता महकाती सबको, कविता



समंदर के उस पार

ये वही जगह है जहाँ पहली दफा मैं उससे मिली थी , हर शाम की तरह उस शाम भी मैं अपनी तन्हाई यहाँ काटने आई थी ,मुझे समंदर से बातें करने की आदत थी ,और मैं अपनी हर एक बात लहरों को बताया करती थी ,अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे समंदर के उस पा



शायरी

लोगों ने कहा , बहुत किताबी बनती हो , हकीकत में जीना क्यों नहीं सीखती है ? उन्हें क्या पता , मुझ जैसों की कहानी से ही तो किताबें बनती है ा



विज्ञापन

कविताविज्ञापनविजय कुमार तिवारीजागते ही खोजती है अखबार,झुँझलाती है-कि जल्दी क्यों नहीं दे जाता अखबार। अखबार में खोजती है-नौकरियों के विज्ञापन। पतली-पतली अंगुलियों से,एक -एक शब्द को छूती हुई,हर पंक्ति पर दृष्टि जमाये,पहुँच जाती है अंतिम शब्द तक। गहरा निःश्वांस छोड़ती है



हर एक साँस मैं तुम्हे लौटा दूँगी

सबकी नज़रों में सबकुछ था मेरे पास , लेकिन सच कहूँ तो खोने को कुछ भी नहीं था मेरे पास ,एक रेगिस्तान सी जमीन थी ,जिसपर पौधा तो था लेकिन सब काँटेदार ,धूप की गर्दिश में मुझे मेरी ही जमीन तपती थी ,कुछ छाले थे ह्रदय पर ,जो रेत की छुअन



नन्ही परी

जिंदगी की खिड़की पे सुबह हुई,खुशियों की एक किरण हमें जगाने आई है।ख्वाबों के फूल खिलते हैं यहां,इस बागबान को मोहब्बत से सजाने आई है।यादों को भुला देते हैं हम वक्त के साथ चलते हुएअब हर लम्हें को यादगार बनाने आई है।जिंदगी में कोई कमीं महसूस ना हुई हमें,अब सच्ची खुशियों का राज बताने आई है।हारी-थकी हुई थी



शुक्रिया

ऐ ! मेरे मधुमेह !तुमने दी मेरी ज़िन्दगी बदल, खाने, पीने और रहने में जब दी तुमने दख़ल । मैं जी रही थी बेख़बर ,स्वास्थ्य की थी न कदर। जब तुमने ताकीद दी, शुरू अपनी परवाह की ।जीने का आया कुछ सलीका, अपनाया योग का भी तरीका। अब खुद को भी देती समय, जीवन



चलता रहा मैं

उम्मीदों के साए में पलता रहा मैं,अपने जख्मों पर मरहम मलता रहा मैं,जिंदगी गोल राहों पर घुमाती रही मुझे,और चाहत का हाथ थामकर चलता रहा मैं।हर चाहत के लिए पतंगे सा जलता रहा मैं,मुट्ठी भर जीत के लिए मचलता रहा मैं,हीरे-सी तेज चमक लेकर भी आंखों में ,हर श्याम को सूरज सा ढलता रहा मैं।दर्द को खामोशी से कुचलता



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