कविता



तुम कौन हो?

🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚बाल रूप में तुम प्रभु,एक जैसे हीं लगते हो।गुरुकुल में तुम अलग-अलग से हीं दिखते हो।।कभी "बरसाने" में रास रचातेकभी लंका दहन करवाते हो।कभी सुदामा के कच्चे चावल खाते,कभी भीलनी के जूठे बैर खाते हो।।शांत समाधि में कभी दिखते,कभी ''त्रिनेत्रधारी'' बनते हो।कभी दानव का वध तुम करते,कभी भस्मास



करो या मरो

बाहुबली रणक्षेत्र की ओर कूच करते हैंरण जीत कर आते या मर कर अमर होते हैंजो शोषित सह कर आर्तनाद् करते हैंत्रुटिपुर्ण कुपरंपरा चला ये निरीहसम बनसमाज का सर्वथा अहित हीं करते हैंडॉ. कवि कुमार निर्मल



मर्ज़

मर्ज़ कोई ले गया चुराकर ऐसा मैं बीमार हुआ। शुमार नहीं था किस्मत में जोक्यों उसका दीदार हुआ।। 💔



नारी

❤❤💚💜💙💛💙❤❤💜💚❤प्रकृति पुरुष से है या फिर नारी से है!पिधला हिमखंड हीं बन जाता 'वारी' है!!पुरुष तैलिय दाहक तरल, नारी दाह्य कोमल बाती है! शक्ति संपात कर ज्योत प्रज्वलित वह करती है!! "अर्धनारीश्वर" की यही अमर गाथ, कहानी है! ऋषियों-देवों की यही सास्वत अमृत वाणी है!!💙💚💛 💜💗💜 💛💚💙ड



तिल गुड़ खाइए मीठा - मीठा बोलिए - मकर संक्राति

हल्दी और कुमकुम का टीकालगाकर हो शुभारंभ.तिल और गुड़ की मिठास वाणी में जाए घुल.सुगंधित सुमन से सुवासित हो मनमंदिर.अनंत आकाश में अपना अस्तित्व दर्ज कराए रंगबिरंगी पतंग.धनु राशि से मकर में जब हो सूर्य का आगमन तब मानते सभी मिल जुलकर मैत्री और स



हाय पैसा तूने क्या किया

हाय पैसे तूने क्या किया ? हाय पैसे तूने क्या किया,मनुष्य को मनुष्य न रहने दिया,सारे बंधन और रिश्ते तूने,यों ही तोड़ा,मर्यादा तूने क्यों तोड़ा,हाय पैसा तूने क्या किया।मानव जन को तूने,कौन-सी खायी में ढकेला,सारी संवेदना की पड़ताल कर,मनुष्य



सरस्वती वंदना

हम मानुष जड़मति तू मां हमारी भारती आशीष से अपने प्रज्ञा संतति का संवारती तिमिर अज्ञान का दूर करो मां वागीश्वरी आत्मा संगीत की निहित तुझमें रागेश्वरी वाणी तू ही तू ही चक्षु मां वीणा-पुस्तक-धारिणी तू ही चित्त बुद्धि तू ही कृपा करो जगतारिणी विराजो जिह्वा पे धात्री हे देवी श्वेतपद्मासना क्षमा करो अपराधों



नन्नी सी जान देश की शान by neetesh Shakya

अग्नि मे तपकर, सोने की पहिचान होती है।नन्नी सी जान, देश की शान होती है।यही ज्योति सबके घर की उजाला होती है।नन्नी सी गुड़िया दिल की तारा होती है।।यही सम्मान यही दिल की जान होती है।नन्नी सी जान देश की शान होती है।।1।।ये ना समझ नादान, इनक



कलिका अवतार

अवतारअवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।मन की परतों को खोल,छुप बैठा वहीं कहीं है।एषणा बुरी नहीं है।बुरी नहीं है।।अनाधिकृत घनसंचय है अपराध,विवेकपूर्ण वितरणसही है।सत्य जहाँ अढिग है,धर्म वहीं है।।साधना सेवा त्याग कासुपथ सही है।।अवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



अवतार



रात अलबेली

स्वप्न सहेली,ये रात अलबेली।सँग तारों के,करती अठखेली।शबनम जैसे,मोती बरसाती।भोर होते जो,लगते पहेली।स्याह कभी,कभी चाँदनी।खिले गगन ताल,बनकर कुमुदिनी।नवयौवना सी,नटखट चंचल।मृगनयनी सी,सहज सुंदर।हरती क्लांत हर तन के,करती शांत ज्वार मन के।ये रात अलबेली,स्वप्न सहेली।स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



जग

लद्द-फद्द हो,जग को देते हीं रहते हैं!क्या जग भीइनको भी उतना हीं देता है?जड़ से पत्तों तकऔषधीय गुण रहता है!हम मृदु वाणी त्याग कटु वचन का संबल लेते हैं!!फलों का स्वाद तुष्ट करता है!हम जीवन को ध्रिणा से भरते हैं!!लद्द-फद्द हो,जग को देते हीं रहते हैं!क्या जग भीइनको भी उतना हीं देता है?डॉ. कवि कुमार नि



रॉक गार्डन पर कविता

रॉक गार्डन पर कविता- फ़र्क बस नज़रिये का था.टूटी हुई चीज़ समझकर बेज़ान मान लिया गया.इक शख़्स ने जोड़ जोड़कर मुझे खूबसूरत बागीचा बना लिया.शिल्पा रोंघे



अराध्य

"इति" और "अंत"समाहृत जीवन पर्यंतमैं कोई हूँ नहीं- संतहै यही-"वाक्य आप्त"सद् गति करुँगा प्राप्तयह है मेरे ''मन की बात''चक्र 'नौ' है, नहीं हैं 'सात'दिन हो या फिर हो- रातकरना उसी एक बस बात"मानव" मेरी एक है जातसत्-संग यही, आज बाँटडॉ. कवि कुमार निर्मल



जीवन यात्रा

ललचाती,सकुचाती,सीखाती,भरमाती,इठलाती,अंततः,सुस्ताती चीर निंद्रा!!जीवन यात्रा।अंदाज अलग,भागमभाग,चैन औ सुकूं की,अंततः,नींद उड़ाती!!जीवन यात्रा।अनुभव बांटे,भविष्य को बांचती,वर्तमान भुलाती,अंततः,मन भटकाती!!जीवन यात्रा।कहकहे लगाती कभी,मन कचोटती कभी,हंसाती कभी, रुलाती,अंततः,मिट्टी मिश्रित होती!!जीवन यात्रा।



मेरा अपना

सुबह हो या फिर शाम होलबों पे बस तेरा नाम होहर काम में हम साथ होसपनों के तुम राजदार होलोगबाग तुझे भले महाकौल कहें,तुम बस एक मेरे श्याम होडॉ. कवि कुमार निर्मल



मौन के रुप अनेक

एक ही मौन के देखो कितने रूप.कभी ध्यान है,कभी निद्रा है मौन,कभी उपासना है मौन,कभी भोरतो कभी रात का काला सन्नाटा है मौन,ना पूरा "हां" ना पूरा "ना"है मौन.ना पूरा है ना अधूरा हैसचमुच एक रहस्य ही है मौन.शिल्पा रोंघे



मृत्यु

वज्रपात सी घात लगी है..साँसों के इस बंधन को..मृत्यु खड़ी बाँट जोह रही...बेबस तन आलिंगन को..खिले नयन यम दर्श को..अधरों पर बिखरी मुस्कान..लेकर गठरी कर्मों की..तन छोड़ रहा ये पहचान..कुंठित,कुत्सित तन ये..हो जाएगा पल में खाक..गंगा दर्शन को तरसेगा..बंद मटकी में बन राख..हृदय विदिर्ण हो उठेगा..देखकर सब ये हा



ना कोई अपना हुआ

यूं तो दीवाने कई पर ना कोई अपना हुआ सोचते ही रह गए बस पूरा ना सपना हुआ ढूंढते ही रह गए हैं ना खुदा मुझको मिला उम्र गुज़री जाए है बेकार जप जपना हुआ कोई पढता भी नहीं चाहे रहूं मैं सामने बेवजह अखबार में देख लो छपना हुआ अजनबी सा अब वो पेश आ रहा है दोस्तों बेकार ही अपना तो उसके साथ में खपना हुआ सोचते थे



असली लगाव

असली लगाव हो तो रस्ते बन ही जाते हैं मिट्टी से मिल मुरझाए पौधे तन ही जाते हैं सब दूर हमसे हो रहे फिर भी ना सोच क्या हम उनको समझ अपना लगाए मन ही जाते है किसको कहां परवाह कि वो दिल में बसाएगा अब तो अच्छे लगे हैं जो लुटाए धन ही जाते हैं सही क्या है गलत क्या है यहां जो भी बताएंगे सयाने स्वार्थी लोगों मे



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