गरीबी के आलम में,

गरीबी के आलम में,सेवा में,सौ बीगा जमीन के बाद हम गरीब थे| आज सौ गज जमीनमें बनी कोठी, अमीर होने का न्यौता देती हैं|जब पैसो की तंगी थी तब गहनों मालाओ से औरत सजी थी, आज रोल गोल्ड कोअमीरी कहते हैं| जब पीतल की थाली में खाना खाते थे तो गरीब कहे जाते थे| आजप्लास्टिक के बर्तन में खाकर अपने आप को धनी समझ रह



मेरे देश का किसान

किसी ने उसे हिंदु बताया,किसी ने कहा वो मुसलमान था,खुद को मौत की सजा सुनाई जिसने,वो मेरे देश का किसान था।जिसकी उम्मीदाें से कहीं नीचा आसमान था,मुरझाकर भी उसका हौंसला बलवान था,जब वक्त ने भी हिम्मत और आस छोड़ दी,उस वक्त भी वो अपने हालातों का सुल्तान था।किस्मत उसकी हारी हुई बाजी का फरमान था,बिना मांस की



ओला बौछार

ओला बौछार काले घने बादल जब अपनी जवानी मे आते हैं आसमान मे।जमीन मे मोर पपीहा खूब इतराते हैं, नृत्य करते हैं आसमान को निहार कर, कल वह भी बौरा गए ओला वृष्टि को देख कर। कल शहरी लोग पहले खूब इतराए ओलो को देख कर फिर पछते सड़क मे जब निकले ऑफिस से कार पर। किसान खुश था पानी की धार को देखकर वह भी पछताया गेंहू



सच रो रहा

सच रो रहाशिक्षित प्रशिक्षितधरना और जेल मे।नेता अभिनेतासंसद और बुलट ट्रेन मे।एमेड बीएडतले पकोड़ा खेतवा की मेड़ मे।योगी संत महत्मासेलफ़ी लेवे गंगा की धार मे।बोले जो हककी बात वह भी जिला कारागार मे।बोले जो झूठमूठ वह बैठे सरकारी जैगुआर मे।कर ज़ोर जबरदसतीन्याय को खा जाएंगे।की अगर हककी बात तो लाठी डंडा खा जाएं



चुनाव चिन्ह जूता।

चुनाव चिन्हजूता।लोकलाज सबत्याग, जूता निशानबनाया।झाड़ू से सफाईकर, बाद मे जूतादीना।पढ़ लिख करमति बौराई, कौन इन्हेसमझाए?लोक सभा चुनावसे पहले जूता निशान बनाए।हरि बैल,खेत-किसान, खत का निशान मिटाया।वीर सपूतोकी फाँसी वाली रस्सी को ठुकराया।उन वीरांगनाओको भूल गए जिसने खट्टे दाँत किये।दिल्ली कोबना के चमचम, पूरे



किसान

दिन भर सूरज से बाते करता , खुद भूखा रहता हे फिर भी कर्मरत - हे वह निरंतर दिन भर तपता ,सूरज की गर्मी में देखता - क्या दम सूरज में की दे दे वो शाम को दो दाने वो ान के भर दे शायद वो पेट उनका भी जो - बैठे हे एकटक बाट ज़ोह किसी अपने की (ये ऐसी केसी ह



"गीत" लहराती फसलें खेतों की, झूमें गाँव किसान बरगद पीपल खलिहानों में, गाते साँझ बिहान......लहराती फसलें .....

आधार छंद - सरसी (अर्द्ध सम मात्रिक) शिल्प विधान सरसी छंद- चौपाई + दोहे का सम चरण मिलकर बनता है। मात्रिक भार- 16, 11 = 27 चौपाई के आरम्भ में द्विकल+त्रिकल +त्रिकल वर्जित है। अंत में गुरु /वाचिक अनिवार्य। दोहे के सम चरणान्त में 21 अनिवार्य है"गीत" लहराती फसलें खेतों की, झूमें गाँव किसानबरगद पीपल खलिहा



किसानों पर कर्जमाफी के लिए राहुल गाँधी के बड़े बोल

राहुल गाँधी ने कहा कि हमारी सरकार आती है तो हम शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को बेहतर करेंगे। हम आपके पैसों को उद्योगपतियों को नहीं दूंगा। मैं झूठे वादा नहीं करता हूं। मोदीजी जहां जाते हैं, तीन चार झूठे वाले कर जाते हैं, लेकिन हम ऐसे नहीं है। हम वादा नहीं करते हैं चुनाव के बाद 10 दिन के अंदर किसान का कर्



मोदी के न्यू इंडिया में तड़पते किसान,बिलखते मजदूर

भारत कृषि प्रधान देश है हमलोगों ने बचपन से अब तक पढ़ा और सुना है जो हक़ीक़त भी है! कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है और अब भी है।जिस देश में 57% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पे निर्भर हो उस देश में किसानों का किया हाल है. वो जग ज़ाहिर है क्योंकि उनके साथ ना मीडिया है ना सरकार औ



“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा



कुमारस्वामी ने 15 दिन में किसानों की कर्ज माफी का वादा किया

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने आज कहा कि उनकी सरकार की प्राथमिकता किसानों को बचाना है। उन्होंने 15 दिन के अंदर किसानों की कर्ज माफी की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने का वादा किया और इस बात पर जोर दिया कि अब वह ‘‘ पीछे हटने वाले नहीं ’’ ह



किसान के पैरों में छाले

सरकारी फ़ाइल में रहती है एक रेखा जिनके बीच खींची गयी है क्या आपने देखा ..?सम्वेदनाविहीन सत्ता के केंद्र को अपनी आवाज़ सुनाने चलते हैं पैदल किसान 180 किलोमीटरचलते-चलते घिस जाती हैं चप्पलें डामर की सड़क बन जाती है हीटर। सत्ता के गलियारों तक आते-आते घिसकर टूट जाती हैं चप्पलें घर्षण से तलवों में फूट पड़त



अभिव्यक्ति मेरी: किसी के बाप का कर्जा किसानों पर नहीं बाकी,

किसां जो रोटियां देता, जमाने भर को खाने की।उसी के अन्न पर पलकर, करो बातें जमाने की।किसी के बाप का कर्जा किसानों पर नहीं बाकी,तुम्हारी पीढियां कर्जे में है, हर एक दाने की ।। लहू से सींचकर खेतों को, जो जीवन उगाता है,जरा सी रोशनी देदो, उसे भी आशियाने की।।खुदाओं की तरह, मेरी



सामाजिक समरसता

29 जून 2017 का एक चित्र मुझे परेशान किये था। राजकोट में प्रधानमंत्री का 9 किलोमीटर लम्बा रोड शो लोग अनुमानित ख़र्च 70 करोड़ रुपये तक बता रहे हैं। 9 जुलाई 2017 का दूसरा



दिल की भड़ास

आज इतने कम समय में दूसरी बार मन किया कि सामाजिक माध्यम अर्थात सोशल मीडिया के महान लेखकों से उनके लेखों के बारे में आज पूछ ही लूँ । ये जितने भी महान #लेखक_लेखिकाएं जिन्हे सिर्फ इस #फेसबुक पर ही समाज के आर्थिक रूप से निचले तबके की इतनी ज्यादा चिंता सताती है कि वे लोगो के ल



कनहा पशु आश्रय निर्माण कर आवारा पशुओं को सुरक्षित वातावरण देने में देरी क्यों?

प्रत्येक नगरपालिका परिषद में पशु आश्रय स्थल का निर्माण अनिवार्य कर दिया जाए और वायो गैस प्लान्ट से ऊर्जा उत्पादन करने के साथ देसी खाद को भी बढ़ावा मिलेगा।आवारा पशुओं से होने वाली क्षति भी नहीं होगी।



भूखे को भूख , खाए को खाजा ...

भूखों को भूख सहने की आदत धीरे - धीरे *भूखे को भूख, खाए को खाजा...!!भूखे को भूख सहने की आदत धीरे - धीरे पड़ ही जाती है। वहीं पांत में बैठ  जी भर कर जीमने के बाद स्वादिष्ट मिठाइयों का अपना ही मजा है। शायद सरकारें कुछ ऐसा ही सोचती है। इसीलिए तेल वाले सिरों पर और ज्यादा तेल चुपड़ते जाने का सिलसिला लगाता



किसान की घड़ी की कहानी

एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसेतो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे भावनात्मक रूप सेजुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस पाना चाहता था.उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास किया, कभी कमरे मेंखोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में ….पर तामामकोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने निश्चयकिया



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