किताब

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बहाने जिंदगी

माना हम चिट्ठियों के दौर में नहीं मिलें, डाकिए की राह तकी नहीं हमने। हम मिले मुट्ठियों के दौर में। जिसमें रूमाल कम, फोन ज्यादा रहता था। माना हम किताब लेने देने के बहाने नहीं मिलें, जिसे पढ़ते, पलटते सीने पर रख, बहुत से ख्वाब लिए उसके साथ सो जाया करते। हम मिले मेसेज, मेसेंजर, वाट्स अप, एफ बी, इंस्टा



नई पुस्तक - कुछ मीटर पर ज़िन्दगी #ज़हन

नए जज़्बात - नई किताब: 'कुछ मीटर पर ज़िन्दगी' ...उम्मीद करता हूं कि पहले की रचनाओं की तरह इसे भी आपका भरपूर प्यार मिलेगा। ई-संस्करण, एमेज़ॉन पर उपलब्ध -https://amzn.to/3bXsGCW#ज़हन #mohitness #mohit_trendster #book #kuchmeterparzindagihttps://mohitness.blogspot.com/2020/05/kuch-meter-par-zindagi-book.ht



2020 में लाल किताब के इन उपायों से दूर होगी हर समस्या, मिलेगी मनचाही सफलता

2019 खत्म होने को है और नया साल यानि 2020आने को है। आपके तमाम कष्ट दूर हों और नया साल अच्छा बीते इसके लिए लाल किताब में बताए गए कुछ विशेष उपाय करें। 19वीं शताब्दी की इस किताब में आपकी हर समस्या का सामाधान है। यदि आप नियमपूर्वक इनका पालन



अपने-अपने क्षितिज - लघुकथा संकलन

4 stories in the anthology, Book Launch: 8 January, 2017 - World Book Fair Delhi :)अपने-अपने क्षितिज - लघुकथा संकलन (वनिका पब्लिकेशन्स)56 लघुकथाकारों की चार-्चार लघुकथाओं का संकलन।मुखावरण - चित्रकार कुंवर रविंद्र जीविश्व पुस्तक मेले में 8 जनवरी 2017 को 11:30 बजे वनिका पब्लिकेशन्स के स्टैंड पर इस पुस



मेटामोर्फोसिस

किसी भी देश के द्वारा चुनी गई आर्थिक नीतियाँ केवल वहाँ के नागरिकों की सामाजिक और आर्थिक ज़िंदगियों पर ही असर नहीं डालतीं बल्कि उन ज़िंदगियों की पारिवारिक और नैतिक बुनियादें भी तय करतीं हैं। ग्रेगोर साम्सा नाम का एक आदमी एक दिन सुबह-सुबह नींद से जागता है और अपने आप को एक बहुत बड़े कीड़े में बदल चुका हुआ



मेरी जिंदगी…………………एक कहानी

मेरा नाम …………. छोड़ो भी, मेरे नाम मे क्या रखा है. कहते है लोगो को एक नाम इसीलिए दिए जाते है की वो रहे या ना रहे उन्हे हमेशा पहचाना जा सके, लेकिन फिर भी मै चाहता हूँ, की मेरा नाम एक गुमनाम शक्सियत हो. अब मै आप सभी को रूबरू करने जा रहा हूँ अपने इस अधूरे जिंदगी के सफ़र के बारे मे. मै शुरुआत करना चाहूँग



भविष्य की किताब बनाम किताब का भविष्य

किताबें कुछ कहना चाहती हैं. तुम्हारे पास रहना चाहती हैं. लिखा था सफ़दर हाशमी ने. और सच ही तो लिखा था. न जाने कितने लंबे समय से किताबें हमारी दोस्त हैं. उनके रंग-रूप बदले, हाथ से लिखी जाने वाली किताबों की जगह छापे खाने से निकली किताबों ने ले ली, लेकिन उनसे हमारा रिश्ता नहीं बदला. बल्कि और मज़बूत





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