लघु



मयंक का हठयोग

मयंक का हठयोग ************************ जीवन की यह कैसी विडंबना है कि वह जिस विदुषी महिला मित्र में अपनी माँ की छाया ढ़ूंढता रहा, उसी देवी को उसके उस पवित्र स्नेह पर एक दिन न जाने क्यों संदेह हो गया.. ************************ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर सुबह का दृश्य कितना आनंदित करने वाला रहा..



लघुकथा -बदलती निगाहें

कहानी-बदलती निगाहेंवक्त के साथ लोग भी बदल जाते है,लेकिन स्मिता से मुझें ऐसी उम्मीद नहीं थी. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये वही स्मिता है, जिस



लघुकथा- अल्पायु

अपने स्कूल के आम के पेड़ के नजदीक खड़ा थी तन्वी, ये वही पेड़ था जिस पर वो आम तोड़ने जा चढ़ी थी। नन्ही तन्वी जो बमुश्किल १० साल की थी.जैसे तैसे चढ़ तो गई लेकिन उतरना जैसे टेढ़ी खीर बन गया।पेड़ के नजदीक से गुजर



रामनाम सत्य..!

रामनाम सत्य ..!!!***************( लघु कथा )रामनाम सत्य .. रामनाम सत्य.. क्या कोई शवयात्रा है ? सड़क पर तो ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा था.. फिर क्यों भरी दुपहरी में यह व्यक्ति ऐसे बुदबुदा रहा था .! क्या यह उसका अंतर्नाद है अथवा विरक्त मन की आवाज ..ठीक से समझ नहीं



#सपनों_का_गुल्लक

नानी के यहाँ से जब लौटा था तो नाना जी ने 50/-नानी जी ने 50/-मामा जी और मासी ने 100/- -100/- रुपये दिए थे स्कूल की छुट्टी लगे हुए भी लग भग २० दिन से अधिक हो रहे है वो पैसे भी गुल्लक में रोज़ डालता हूँ और आज पापा ने 50/- रुपये और दे दिए राजू गुल्लक में पैसे डालते हुए अपने गुल्लक से बत्या रहा था। अब इन



लड़की

वह ठसाठस भरी बस में तिल-तिल बढ़ता हुआ आखिर उस सीट तक पहुँच ही गया जिसके किनारे की साइड में एक पन्द्रह वर्षीय खूबसूरत लड़की बैठी थी। चंद पल वह स्थिर खड़ा रहा फिर आहिस्ता से अपना दाहिना हाथ सीट की पुश्त पर रख कर लड़की के बाएं कंधे को उंगलियों से स्पर्श किया। लड़की



यातना गृह

यातना गृह..!*********** मीरजापुर के एक रईस व्यक्ति के " करनी के फल " पर लिखा संस्मरण***************************** यह पुरानी हवेली उसके लिये यातना गृह से कम नहीं है..मानों किसी बड़े गुनाह के लिये आजीवन कारावास की कठोर सजा मिली हो .. ऐसा दंड कि ताउम्र इस बदरंग हवेली के चहारदीवारी के पीछे उस वृ



#भगवान_की_लाठी

मोहन के घर से हर शाम उसकी बीवी की बहुत ज़ोर ज़ोर रोने बिलखने की आवाज़ आया करती थी । मोहन रोज़ शराब पि कर आता और घर में ख़ूब तमाशा करता। उसे बस बहाना चाहिए अपनी बीवी पर हाथ उठाने का,आज भी वो नशे में धुत घर में दाखिल होते ही अपनी बीवी पर बरस पड़ा " उमा , उमा कहा हो ज़रा मेरे लिए पानी ले आना, और लड़खड़ाते हुए ह



बहु ही क्यों बेटी क्यों नहीं?

शादी के पुरे तीन साल बाद भी शोभा हमेशा ही अपनी सासु माँ के ताने, और जली कटी बातों का शिकार होती रही है, सास भी बस हर वक़्त मौके की तलाश में रहती है अगर बहु की कोई ग़लती ना मिले तो उसका अपने रूम में रहना भी उन्हें खटकने लगता है, आज भी सारा काम काज निपटाने के बाद जब शोभा



#भाप_की_चोरी

"बहुत भूक लगी है कल से कुछ खाया नहीं,""ख़ुदा का शुक्र है बस स्टैंड के पियाऊ में ठंडा पानी मिल जाता है , अब जीने के लिए खाना ना सही पानी पर गुज़ारा हो जाता है।" अनाथ 11 वर्षीय राजू छोटे छोटे अपने ही जैसे अनाथ दोस्तों के बिच बैठ बहुत उदास लहजे में कह रहा था।"अब तो कोई होटल में भी काम नहीं देता , जब से च



आनंद

अजमेर की सैर के लिए मैं सहपरिवार नागपुर के रेलवे स्टेशन पर ट्रैन के इंतज़ार में बैठी थी अभी ट्रैन आने में कुछ समय बाकि था के उसी प्लाट फॉर्म पर एक लड़का लग भाग २२-२३ साल मतलब मेरा ही हम उम्र अपनी माँ का हाथ थामे हुए हमारे बेंच के बिलकुल बाज़ू वाले बेंच पर आ बैठे, थोड़ी ही



अब पछताये क्या होत, जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत

अच्छा लग रहा है न आज ऐसे सड़क के किनारे बैठे हुए, इस इंतजार में कि क्या हुआ जो बहु ने निकाल दिया घर से,बेटा तो हमारा है न ,वो हमें लेने जरूर आएगा ।अरे याद करो भाग्यवान आज से 40 साल पहले की बात को मेरे लाख मना करने के बावजूद तुमने मेरी विधवा माँ पर न जाने क्या क्या इल्ज़ाम लगा कर घर से निकाला था। कितनी



Sketches from Life: बड़ा भाई

पापा ने अपने और बच्चों के कपड़े निकाले, जूतों पर ब्रश मारा, बस्ते तैयार करवाए. उधर किचन से आवाज़ आई- नाश्ता ले जाओ.टोनी और बोनी ने अपने अपने परांठे गोल कर के हाथ में पकड़े और एक एक कप दूध के साथ गटक गए. फिर जूते कसे और भारी भारी बस्ते टांग लिए. अंदर से आवाज़ आई,- चाबी संभाल ल



Sketches from Life: जीवन धारा

गुड़िया का नाम श्वेता जरूर था पर रंग थोड़ा सांवला ही था. तीन साल की श्वेता सारे कमरों में उछलती कूदती रहती थी. उसकी दोस्ती महतो से ज्यादा थी जो उसे किचन से कुछ ना कुछ खाने के लिए देता या फिर रोती तो दूध की बोतल तैयार कर के दे देता था. शाम की



लघुकथा

लघुकथासारादिन तो वह अपने-आप को किसी न किसी बात में व्यस्त रखता था; पुराने टूटे हुए खिलौनोंमें, पेंसिल के छोटे से टुकड़े में, एक मैले से आधे कंचे में या एक फटी हुई फुटबालमें. लेकिन शाम होते वह अधीर हो जाता था. लगभगहर दिन सूर्यास्त के बाद वह छत पार आ जाता था और घर से थोड़ी दूर आती-जाती रेलगाड़ियोंको देखत



आँगन का पेड़

घरके आँगन में लगा यह पेड़ मुझ से भी पुराना है. मेरेदादा जी ने जब यह घर बनवाया था, तभी उन्होंने इसे यहाँ आँगन मेंलगाया था. मेरा तो इससे जन्म का ही साथ है. यहमेरा एक अभिन्न मित्र-सारहा है. इसकीछाँव में मैं खेला हूँ, सुस्तायाहू, सोया हूँ. इसकी संगत में मैंने जीवन की ऊंच-नीचदेखी है. मेरे हर सुख-दुःखका स



लघुकथा

लघुकथाजब उन्होंने उसकी पहलीअजन्मी बेटी की हत्या करनी चाही तो उसने हल्का सा विरोध किया था. वैसे तो वह स्वयंभी अभी माँ न बनना चाहती थी. उसकी आयु ही कितनी थी-दो माह बाद वह बीस की होने वालीथी. उन्होंने उसे समझाने का नाटक किया था और वह तुरंत समझ गयी थी. लेकिन उसके विरोध ने उन्हेंक्रोधित कर दिया था. किसी



निमंत्रण

‘क्या तुम्हें पूरा विश्वासहै कि यह निमंत्रण इस ग्रह के निवासियों के लिये है? मुझे तो लगता है कि किसी भीग्रह के वासी पृथ्वी-वासियों को अपने यहाँ नहीं बुलाना चाहेंगे!’‘क्यों? क्या खराबी है इनजीवों में?’‘तुम्हें पूछना चाहिए कि क्याखराबी नहीं है इनमें!’एलियंस का अन्तरिक्ष-यान अभीभी पृथ्वी से कई लाख मील



एक लघु कथा

‘यह तीसरी लड़की है जो तुमनेपैदाकी है. इस बार तो कम से कम एक लड़का जन्मती,’ उसकीआवाज़ बेहद सख्त थी.एक कठोर, गंदीअंगुली शिशु को टटोलने लगी; यहाँ, वहां. भय की नन्ही तरंग शिशु के नन्हें हृदय में उठी और उसेआतंकित करती हुई कहीं भीतर ही समा गई. अपने-आपसे संतुष्ट अंगुली हंस दी. सब जानते हुए भी, अपने मेंसिकुड़



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