लोकतंत्र

अरविंद केजरीवाल का बयान! संविधान व लोकतंत्र विरोधी कौन?

‘‘दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल’’ के मामले में उपराज्यपाल एवं दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र के विवाद पर उच्चतम न्यायालय का बहुप्रतिक्षित निर्णय आ गया है। उक्त निर्णय पर आई दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की त्वरित प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री पद पर बैठे हुये व्यक्ति के लिये न केवल अत्यधिक अमर्यादित



स्वतंत्रता के 70 सालों के पश्चात भी क्या यही ‘‘परिपक्व’’ लोकतंत्र है?

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गये हैं। चुनाव पूर्व का ‘‘ओपीनियन पोल’’ तुरन्त चुनाव बाद का ‘‘एक्जिट पोल’’ व अब ‘‘वास्तविक परिणाम’’ आपके सामने है। मैं यहाँ पर परिणामों का विश्लेषण नहीं कर रहा हूूंँ। ये सब ‘‘पोल’’ अनुमान के कितने नजदीक थे, सही थे, या आश्चर्य जनक थे, इस संबंध में भी कोई विशेष मूर्धन्य़



स्वतंत्रता के 70 सालों के पश्चात भी क्या यही ‘‘परिपक्व’’ लोकतंत्र है?

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गये हैं। चुनाव पूर्व का ‘‘ओपीनियन पोल’’ तुरन्त चुनाव बाद का ‘‘एक्जिट पोल’’ व अब ‘‘वास्तविक परिणाम’’ आपके सामने है। मैं यहाँ पर पर



नेता के गुण

हमारा नेता कैसा हो पर अगर लोगो की चाहत है कि वो सख्त फैसले लेने वाला होना चाहिए तो मेरा मानना है कि सख्त फैसले नहीं बल्कि समझदारी से फैसले लेने वाला होना चाहिए. हम सख्त फैसले किस के खिलाफ चाहते है? अपने खिलाफ या अपने विरोधियों के खिलाफ? अगर कोई नेता



लेख--- लोकतंत्र के प्रहरियों को तोड़ना होगा, परम्परागत राजनीति की रवायत

लोकतांत्रिक व्यवस्था को विस्तार और परिभाषित करने की आज की व्यवस्था में कोई आवश्यकता नहीं हैं। अगर लोकतंत्र सात दशक आज़ादी की आबोहवा में पंख फड़फड़ाने के बाद भी वर्तमान दौर में जातिवाद, परिवारवाद, और तमाम सामाजिक कुरीतियों की साया से आज़ाद नहीं हो सका, तो उसके लिए जिम्मेवार लालफीताशाही भी हैं, क्योंकि अग



चमकदार इंडिया की ग़रीब दास्ताँ

राजनीति और जनता का प्रत्यक्ष मिलन अब मात्र चुनावी हल-चल के वक़्त दिखता है, जब उसके प्रत्याशी जनता रूपी मत को अपना भगवान और उसके साथ तमाम वे रिश्ते- नाते रचने की कोशिश करती है, जिसके जोड़ का धागा बहुत ही नाज़ुक होता है, और उसको बनाया भी इसलिए जाता है, कि क्षणिक उपयोग ह



मेरी पहचान... मेरा झंडा....

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04 सितम्बर 2015

#व्यंग-लोकतंत्र से राजनीति का बढ़ता व्यापार?

क्या लोकतंत्र अलोकतन्त्र हो गया है सैकड़ों पंजीकृत राजनैतिक दल, जितने दल उतने विचारधारा क्या आज़ादी के बाद बांटो और राज करो के तहत इस सोच को देश की राजनीती में जगह दी गई थी या व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए पक्ष और विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में असरदार रहें इसकी वकालत थी? क्यों लोकतंत्र के नाम



69वें भारतीय स्वतन्त्रता दिवस-2015 की हार्दिक शुभकामनायें

Yesterday’s Reflection:स्वतन्त्रता दिवस हम सभी के मन में उमंग और जोश भर देता है। साल के कुछ चुनिंदा दिनों को छोड़ कर हम देशभक्ति या देशप्रेम को एक तरफ रख देते हैं। भारतीयता की भावना सभी में बराबर होती है लेकिन हममे से कुछ एक ऐसे भी हैं जो मानवधिकार या अम्बेडकरवाद की बात करते हैं उनको देश द्रोही या सम



नवगीत: संसद की दीवार पर

संजीव *संसद की दीवार पर दलबन्दी की धूल राजनीति की पौध पर अहंकार के शूल *राष्ट्रीय सरकार की है सचमुच दरकार स्वार्थ नदी में लोभ की नाव बिना पतवारहिचकोले कहती विवश नाव दूर है कूल लोकतंत्र की हिलाते हाय! पहरुए चूल *गोली खा, सिर कटाकर तोड़े थे कानून क्या सोचा था लोक का तंत्र करेगा खून?जनप्रतिनिधि करते रहे



भारत रत्न डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के जन्मदिवस पर विशेष-2015

सामाजिक एकता, सामाजिक समानता और भ्रातृत्व के पक्षधर, ज्ञान के प्रतीक, भारतीय लोकतन्त्र के प्रणेता, दलितों के मसीहा, भारत में बुद्ध धर्म के पुनरुद्धार करने वाले प्रबुद्ध विचारक, शिक्षाशास्त्री और समकालीन दार्शनिक भारत रत्न डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के जन्मदिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई। बाबा साहेब का जीव





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