महफ़िल

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महफ़िल

महफ़िल ए दुनियां से चले जाय दूर कही, इस जहाँ में यू बिन तेरे कुछ रखा नहीं. चाह में तेरी गुज़ार दी यूँही एक उम्र हमने ,तेरी चाहत ने हमे कही का रखा ही नहीं. तफ़रीए दुनियां लिख दिए अफ़साने अपने, अफ़साने लिखने



जुबा चुप क्यो?

जुबा चुप क्यो?आपकी खामोश जुबा ने ,महफ़िल की नज़रों में चोर बना दिया|ताकते रहे आपकी नज़रों को, कभी तो इधर उठेगी, कुछ कहेंगी|ता उम्र साथ देने का वादा करती रही, खुशियों के फूल भरती रही|खुशियों के फूलो को संभाला बहुत, आपकी एक मुस्कान के लिए|साथ जीने मरने के वादे करते रहे तुमसे, रोज प्यार पाने के लिए |लड़ते





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